तीस दिनों से अधिक समय बीत चुका था। दानिय्येल नदी के किनारे बैठा, उसकी आँखें पानी की धारा में टिकी हुई थीं, पर देख कुछ नहीं रहा था। उसका मन भारी था। यहूदा की धरती से दूर, इस बाबुल की महानगरी में भी, उसका हृदय हमेशा यरूशलेम की ओर ही धड़कता था। पर अब एक और बात थी—एक गहरा, अनकहा दबाव, जैसे हवा में कुछ जमा हो रहा हो। उसने तीन सप्ताह का उपवास रखा था। न तो उत्तम भोजन किया, न मांस, न दाखमधु। साधारण अन्न भी मुश्किल से ग्रहण किया। शरीर दुर्बल हो गया था, पर आत्मा एक अजीब सी सजगता में थी।
यह कोई साधारण प्रार्थना नहीं थी। कुछ समझ में आ रहा था, कुछ नहीं। स्वप्न आते, टूटे-टूकड़ों में, पर कोई स्पष्ट आकृति नहीं बनती। फिर वह दिन आया—चौबीसवें दिन का प्रातःकाल। हिद्देकेल नदी का जल शांत था। दानिय्येल अकेला था, किनारे पर खड़ा। तभी, आँखों के कोने से, उसे कुछ दिखाई दिया।
पहले तो लगा जैसे सूर्य की किरणों का भ्रम है। फिर आकृति स्पष्ट होने लगी। एक पुरुष, पर ऐसा पुरुष जैसा उसने कभी न देखा हो। उसका वस्त्र बत्तीसी सन का था, जो टखनों तक लहरा रहा था, और कमर शुद्ध सोने की पट्टिका से कसी हुई थी। शरीर पीतल जैसा चमकदार, मानो अग्नि में तपा हुआ हो। उसके चेहरे का तेज बिजली की चमक सा था, आँखें जलती हुई मशालें। बाँहें और पैर चमकते पीतल के स्तंभों जैसे, और जब वह बोला, तो उसकी आवाज़ बहुत से लोगों के शोर की तरह गूंजी—एक गर्जन जो हड्डियों में समा जाता है।
दानिय्येल की साँसें रुक गईं। पैरों की ताकत जवाब दे गई। वह जमीन पर गिर पड़ा, मुख के बल। मिट्टी की गंध उसकी नासिका में समा गई। फिर एक हल्का स्पर्श हुआ। कोई उसे छू रहा था। उसने हिम्मत करके आँखें उठाईं। वही तेजोमय पुरुष अब उसके सामने खड़ा था, पर उसकी चमक कुछ शांत हुई सी लगी।
“हे दानिय्येल, अत्यन्त प्रिय पुरुष,” उसकी आवाज़ अब कोमल थी, पर उसमें अथाह शक्ति का भान था। “मेरी बातों पर ध्यान दे। खड़ा हो जा, क्योंकि अब तुझे भेजा गया है।”
ऐसा कहते हुए उसने दानिय्येल को पकड़कर काँपते घुटनों के बल खड़ा कर दिया। दानिय्येल का मुख फिर भी धरती की ओर था, आँखें मूंदी हुईं। वह बोल नहीं पा रहा था। गला सूख गया था, जीभ तालू से चिपक सी गई थी।
तब फिर वह आवाज़ आई, “हे दानिय्येल, मत डर। तेरी प्रार्थनाएँ प्रथम दिन ही सुनी गई थीं जब तूने अपना मन समझने के लिए लगाया और अपने परमेश्वर के सामने दीन होकर उपवास किया। मैं तेरी प्रार्थनाओं के उत्तर लेकर आया हूँ।”
दानिय्येल ने होंठ हिलाए। आवाज़ एक धीमी फुसफुसाहट की तरह निकली, “मेरे प्रभु, इस दर्शन के कारण मेरे भीतर बल नहीं रहा। मेरी श्वास भीतर ही रुक गई है। मैं तेरे दास से क्या बात करूं? देख, मेरे भीतर अब शक्ति नहीं, और प्राण भी नहीं।”
उस तेजोमय व्यक्ति ने फिर उसे छुआ, जहाँ उसका हाथ लगा, वहाँ एक अद्भुत उष्णता फैल गई, जैसे ठंडे शरीर में जीवन का संचार हो रहा हो। “हे अत्यन्त प्रिय पुरुष,” उसने कहा, “डर मत। शांति हो तुझे। हियाव बाँध। हाँ, हियाव बाँध।”
इन शब्दों के साथ ही दानिय्येल के भीतर एक साहस का संचार हुआ। उसने गहरी साँस ली, मानो लंबे समय से रुकी हुई श्वास अब मुक्त हुई हो। वह बोला, “अब प्रभु बोल, क्योंकि तूने मुझे बल दिया है।”
तेजोमय पुरुष का चेहरा गंभीर हो गया। “क्या तू जानता है कि मैं तेरे पास क्यों आया? तेरी प्रार्थना सुनने के पहले ही, स्वर्ग में तेरे वचनों का उत्तर तैयार था। परन्तु देख, फारस के राज्य का अधिपति मेरे सामने इक्कीस दिन तक खड़ा रहा। उसने मुझे रोके रखा। मैं अकेला नहीं था। मिखाएल, तुम्हारे प्रधानों में से एक, मेरी सहायता के लिए आया। इसलिए मैं अब यहाँ हूँ, उन राजाओं के सामने जो फारस के विरुद्ध हैं, भविष्य की बातें तुझे बताने।”
दानिय्येल ने सुना। हवा में अदृश्य युद्ध की गूँज सुनाई दे रही थी। यह केवल मनुष्यों का संघर्ष नहीं था; इसके पीछे आकाशीय शक्तियों का टकराव था—सत्य और असत्य का, प्रकाश और अंधकार का। उस तेजोमय दूत ने आगे कहा, “मैं तुझे सत्य बताऊंगा। फारस के बाद यूनान का राज्य उठेगा। फिर एक शक्तिशाली राजा आएगा, वह बड़े ऐश्वर्य से राज करेगा, और जो कुछ वह करेगा, वह उसकी इच्छा से होगा। पर उसके टूटने के बाद, उसका राज्य चार दिशाओं में बंट जाएगा…”
दानिय्येल सुनता रहा। शब्द उसके हृदय में उतर रहे थे, भविष्य के दृश्य उसकी आँखों के सामने खुल रहे थे। उसने दुख देखा, संघर्ष देखा, झूठ देखा, पर अंत में सत्य की विजय भी देखी। जब दूत ने बोलना बंद किया, तो दानिय्येल फिर जमीन पर मुख के बल गिर पड़ा। उसके पास कोई शब्द नहीं थे।
तेजोमय पुरुष ने फिर उसे छुआ। “तू शांत हो,” उसने कहा। “अपना मार्ग जा, और विश्राम कर। अभी और दिन हैं, और समय पूरा होने पर मैं फिर आऊंगा।”
इतना कहकर वह व्यक्ति धीरे-धीरे लुप्त होने लगा, जैसे सूर्य की किरणें बादलों में समा जाती हैं। दानिय्येल अकेला रह गया, नदी का कलकल स्वर फिर सुनाई देने लगा। पर वह बदल चुका था। शरीर में थकान थी, मानो पहाड़ों को हिलाया हो, पर मन में एक गहरी शांति थी। उसने धीरे-धीरे उठकर अपने वस्त्रों की धूल झाड़ी। सूर्य अस्ताचल की ओर था, आकाश में लाल और सुनहरी रेखाएं फैल रही थीं।
वह चला, कदम डगमगाते हुए, पर दृढ़ निश्चय से। वह जानता था कि उसकी प्रार्थनाएँ व्यर्थ नहीं गईं। वह जानता था कि उसकी आवाज़ सुनी गई है, और नदी के किनारे जो कुछ घटा, वह केवल एक आरंभ था। आकाशीय युद्ध जारी था, और उसे, दानिय्येल को, अब और गहराई से समझना था कि विश्वास की इस लड़ाई में उसकी भूमिका क्या है। रात के अंधेरे में जब वह अपने कमरे में लौटा, तो उसके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अद्भुत ज्योति थी—वह ज्योति जो केवल उन्हीं की आँखों में होती है, जिन्होंने स्वर्गदूत का साक्षात्कार किया हो।




