पवित्र बाइबल

निनवे का पश्चाताप और दया

वह सुबह नीनवे में किसी और सुबह की तरह ही शुरू हुई। पूर्वी आकाश में सूरज की पहली किरणें विशाल शहर की दीवारों पर पड़ीं, जो एक बड़े सांप की तरह क्षितिज पर लेटी हुई प्रतीत होती थीं। हवा में अभी भी रात की ठंडक थी, और बाजार के रास्तों में गंदे पानी और मसालों की गंध मिली-जुली थी। मछुआरे नदी से लौट रहे थे, और उनकी टोकरियों में चांदी-सी चमकती मछलियाँ छलक रही थीं। यह एक साधारण दिन होना चाहिए था।

लेकिन जब सूरज ऊपर उठा, तो शहर के मुख्य द्वार से एक अजीब सी हलचल शुरू हुई। लोग इकट्ठा होने लगे। कोई आदमी, धूल से सना हुआ, चेहरे पर एक अजीब सी गहरी चमक लिए, द्वार से अंदर आया। उसके कपड़े मोटे और साधारण थे, पर उसकी आँखों में ऐसी आग थी कि लोग स्वतः ही रास्ता देने लगे। वह चिल्ला नहीं रहा था, बस धीरे-धीरे चल रहा था, और जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, उसके मुँह से शब्द निकलने लगे। गूँजती, भारी आवाज़।

“अब से ठीक चालीस दिन बाद, नीनवे उलट दिया जाएगा!”

यह वाक्य हवा में लटक गया। एक मछुआरा, जिसने अपनी टोकरी जमीन पर रख दी थी, स्तब्ध खड़ा रहा। एक बूढ़ी औरत, जो दरवाजे के पास बैठकर जैतून छील रही थी, उसके हाथ रुक गए। वह आदमी रुका नहीं। वह शहर की गलियों में गहराई तक चला गया, वही वाक्य दोहराता हुआ, एक सजा की तरह, एक चेतावनी की तरह। उसकी आवाज़ में कोई क्रोध नहीं था, बस एक भयानक, अटल निश्चयता थी, जैसे पत्थर पर उकेरी गई लिपि।

पहले तो लोग हैरान रह गए। फिर डर की एक लहर दौड़ गई। यह कोई साधारण भविष्यवक्ता नहीं लग रहा था, कोई पागल भिखारी तो बिल्कुल नहीं। उसके शब्दों में एक अजीब सी सच्चाई का भार था। उस दिन बाजार में सौदे ठप्प रहे। चहल-पहल वाली गलियाँ एक अजीब सी खामोशी में डूब गईं। लोग छोटे-छोटे समूहों में जुटकर फुसफुसाने लगे। उस आदमी के बारे में बातें होने लगीं—कौन है वह? कहाँ से आया है? और सबसे बड़ा सवाल: क्या उसकी बात सचमुच सच हो सकती है?

खबर शहर के कोने-कोने में, ऊँचे महलों तक और गरीबों की झोंपड़ियों तक पहुँची। एक युवा मिट्टी के बर्तन बनाने वाले ने, जिसने उसे सुना था, अपना चाक रोक दिया। उसने अपनी पत्नी से कहा, “उसकी आँखें देखी हैं तुमने? जैसे उसने स्वयं विनाश देख लिया हो।” उसकी पत्नी, जो गूँधे हुए आटे को सान रही थी, बिना कुछ कहे सिर हिला दिया। उसकी आँखों में आँसू थे।

अगले दिन, कुछ अलग हुआ। वह आदमी फिर से आया, पर इस बार लोग तैयार थे। और डर, धीरे-धीरे, किसी और चीज़ में बदलने लगा। एक गहरी, कंपकंपाती हुई पीड़ा में। यह महज भय नहीं था; यह एक सामूहिक आत्मा का झुकना था। सबसे पहले तो बच्चों ने देखा। उनके माता-पिता रोने लगे थे, बिना किसी स्पष्ट कारण के। फिर एक व्यापारी ने, जो नमक का सौदागर था, अपने माल को गरीबों में बाँटना शुरू कर दिया। उसने कहा, “अगर चालीस दिन बाद सब कुछ नष्ट होना है, तो ये धन-दौलत किस काम की?”

और फिर यह बात फैल गई। लोगों ने उपवास रखना शुरू कर दिया। बूढ़े लोगों ने अपने अच्छे कपड़े उतारकें, खादर पहन ली, और राख में बैठ गए। यहाँ तक कि जानवरों तक को इस पश्चाताप में शामिल किया गया—बैलों और भेड़ों को भी भूखा रखा गया, उन पर टाट ओढ़ा दिया गया, जैसे कि वे भी इस दुःख को समझ सकते हों। पूरा शहर एक विचित्र, मौन धूनी में परिवर्तित हो गया। बाजार सुनसान पड़े थे, सिर्फ़ वही एक आवाज़ गूँजती रहती, दिन में तीन बार, उन चालीस दिनों की गिनती करती।

खबर महल में राजा तक पहुँची। राजा, जो सोने के सिंहासन पर बैठा अपने दरबारियों से घिरा रहता था, ने पहले तो इस ‘देहाती भविष्यवक्ता’ की बात को हँसी में उड़ा देना चाहा। पर जब उसने अपनी खिड़की से नीचे देखा, तो उसे शहर का नज़ारा एकदम बदला हुआ दिखाई दिया। वह कोलाहल, वह जीवंतता, वह व्यापार—सब गायब था। एक भयानक शांति छाई हुई थी। उसका हृदय डर से धड़क उठा। उसे अपने अपने पाप याद आए—अत्याचार, घमंड, उपेक्षा। उसने अपना राजपरिधान उतार फेंका, उसकी जगह एक साधारण, खुरदुरा कपड़ा ओढ़ लिया। वह सिंहासन से उतरकर धूल और राख में बैठ गया। उसने एक राजाज्ञा जारी की—पूरे नीनवे में, हर एक प्राणी, मनुष्य और पशु, उपवास करेगा। सभी लोग पश्चाताप करेंगे, अपनी बुरी राहों और हिंसा से फिरेंगे। “कौन जाने,” राजा के आदेश में लिखा था, “शायद ईश्वर दया करे, अपना निर्णय बदल दे, और अपने भयंकर क्रोध से पलट जाए, और हम नष्ट न होने पाएँ।”

यह ‘शायद’ ही सबसे महत्वपूर्ण शब्द था। यह न तो पूरा विश्वास था, न ही पूरा अविश्वास। यह एक अंधेरी गुफा की ओर बढ़ते हुए, दूर एक टिमटिमाती रोशनी पर आशा रखने जैसा था।

चालीस दिन बीतते गए। हर सुबह, वह आदमी—योना—शहर में आता, वही संदेश सुनाता, और चला जाता। पर अब उसके चेहरे के भाव बदलने लगे थे। पहले दिनों की कठोर निश्चयता में एक अजीब सी दरार दिखाई देने लगी थी। उसकी आँखों में कभी-कभी एक प्रश्न उभर आता, जब वह भूखे बच्चों या रोती हुई माताओं को देखता। पर वह अपना काम करता रहा।

चालीसवाँ दिन आया। पूरा शहर एक सामूहिक साँस रोके हुए था। आकाश की ओर देखता हुआ। हर कोई जानता था कि आज वह दिन है। पर सुबह हुई, दोपहर ढली, और शाम हो गई। आकाश साफ़ था। कोई आग नहीं बरसी, कोई भूकंप नहीं आया, कोई विदेशी सेना नहीं दिखाई दी। सिर्फ़ एक सामान्य, शांत नीनवे की शाम, जिसमें पहली बार चालीस दिनों में चिड़ियों का चहचहाना सुनाई दिया।

फिर एक धीमी, अनिश्चित आशा की लहर दौड़ी। लोग धीरे-धीरे अपने घरों से बाहर निकलने लगे। एक बूढ़ा व्यक्ति, जो राख में बैठा था, धीरे से उठा और एक पेड़ की हरी पत्ती को छुआ, जैसे उसे यकीन न हो रहा हो कि वह वास्तविक है। एक माँ ने अपने बच्चे को, जो दिनों से केवल पानी पीकर गुज़ारा कर रहा था, पहली रोटी का टुकड़ा दिया। राजा महल की छत पर खड़ा था, अभी भी अपने साधारण वस्त्रों में, और उसकी आँखों से आँसू बह निकले। दया हो गई थी। निर्णय बदल दिया गया था।

योना शहर के बाहर एक पहाड़ी पर बैठा था। उसने भी वह सब देखा—शांति, आशा का उदय, जीवन की वापसी। उसके मन में उथल-पुथल थी। उसका संदेश सच था, पर अब वह पूरा नहीं हुआ था। और इस ‘अधूरेपन’ में ही, उसे समझ आया कि ईश्वर की दया क्या होती है—वह बाँधने वाली नहीं, बल्कि मुक्त करने वाली है; वह सजा देने वाली नहीं, बल्कि मौका देने वाली है। नीनवे उलटा नहीं गया। बल्कि, वह जैसे नए सिरे से सीधा खड़ा हो गया। और उस रात, पहली बार चालीस दिनों में, शहर में कहीं एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

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