पवित्र बाइबल

खोया हुआ मिलने की खुशी

वह दिन ढलने को था। सूरज पश्चिम की पहाड़ियों पर लटक रहा था, एक गहरे नारंगी रंग का गोला, जैसे कोई पका हुआ आम। हवा में गायों के लौटने की आहट और धूल की महक थी। यीशु उस खुले मैदान में बैठे थे, जहाँ रास्ता गाँव की ओर मुड़ता था। उनके चारों ओर लोगों का झुंड लगा था – कुछ उत्सुक, कुछ संदेह से भरे, कुछ बस शांति की तलाश में। फरीसी और शास्त्री दूर खड़े थे, उनके चेहरे पर एक तीखी, नापने वाली नज़र थी। वे यह सहन नहीं कर पा रहे थे कि यह व्यक्ति ‘पापियों’ के साथ बैठकर भोजन करता है।

यीशु ने चारों ओर नज़र दौड़ाई। उनकी आँखों में कोमलता थी, लेकिन गहराई में एक ऐसा बल था जो सीधे हृदय तक पहुँचता था। उन्होंने एक गहरी साँस ली और बोलना शुरू किया, उनकी आवाज़ शाम की शांति में घुलती हुई।

“तुम में से किसी के पास सौ भेड़ें हों,” उन्होंने कहा, “और उनमें से एक खो जाए, तो क्या वह निन्यानबे को जंगल में छोड़कर, उस खोई हुई भेड़ को ढूँढने नहीं जाएगा, जब तक कि उसे न मिल जाए?” उनके शब्दों ने एक चित्र खींचा – हरियाली से भरी पहाड़ियाँ, झरने की कलकल, भेड़ों की मिमियाहट। एक चरवाहा, उसका चेहरा चिंता से तन गया है, उसकी लाठी जमीन को टटोल रही है। वह काँटेदार झाड़ियों के पीछे झाँकता है, गहरी खाइयों में नज़र डालता है। उसकी पीठ पसीने से तर है, होंठ सूखे हैं, लेकिन उसकी आँखों में एक ही जुनून है – वह एक। वह लौटकर नहीं आएगा चाहे रात कितनी भी ठंडी क्यों न हो, चाहे खतरा कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब तक उसकी बिछड़ी हुई भेड़ उसकी बाँहों में सुरक्षित नहीं हो जाती।

“और जब वह उसे पा ले,” यीशु की आवाज़ मधुर हो उठी, “तो वह उसे अपने कंधों पर उठा लेता है, इतना आनंदित होता है। और घर पहुँचकर वह अपने मित्रों और पड़ोसियों को बुलाता है और कहता है, ‘मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरी वह भेड़ मिल गई जो खो गई थी।’” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तुमसे कहता हूँ, कि इसी तरह एक पश्चाताप करने वाले पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द होगा, बजाय उन निन्यानबे धर्मियों के, जिन्हें पश्चाताप की आवश्यकता नहीं है।”

लोग चुपचाप सुन रहे थे। कुछ किसान, जिनकी अपनी भेड़ें थीं, सिर हिला रहे थे। वे समझ गए थे। यह सिर्फ एक भेड़ के बारे में नहीं था। यह मूल्य के बारे में था। खोई हुई चीज़ की कीमत का।

यीशु ने फिर बात शुरू की, इस बार और नज़दीक से। “या क्या कोई स्त्री जिसके पास दस चाँदी के सिक्के हों, यदि एक सिक्का खो जाए, तो वह दीया जलाकर, घर बुहारकर, बहुत ध्यान से ढूँढ़ती नहीं रहेगी, जब तक कि उसे न मिल जाए?” अब दृश्य बदल गया। एक गरीब घर। मिट्टी का फर्श। एक खिड़की से आती हुई धुंधली रोशनी। वह औरत, उसकी साड़ी का पल्लू खोए हुए सिक्के की धूल में सने हुए फर्श पर लिपटा हुआ है। वह चारपाई के नीचे हाथ डालती है, मिट्टी के बर्तनों को हटाती है, हर कोना छान मारती है। उसकी साँसें तेज हैं। वह सिक्का उसकी ज़िंदगी का दसवां हिस्सा है। शायद उसकी आज़ादी का। आखिरकार, उसके हाथ में कुछ ठंडा और गोल चमकता है। उसके चेहरे पर राहत की एक लहर दौड़ जाती है।

“और जब मिल जाए,” यीशु बोले, “तो वह अपनी सहेलियों और पड़ोसनों को बुलाती है और कहती है, ‘मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि वह सिक्का मिल गया जो मैंने खोया था।’” उनकी नज़र उन फरीसियों पर पड़ी, जो अब भी दूर खड़े आलोचनात्मक नज़र से देख रहे थे। “इसी तरह, मैं तुमसे कहता हूँ, परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने एक पश्चाताप करने वाले पापी पर आनन्द होता है।”

हवा में शाम का ठंडापन घुलने लगा था। लेकिन यीशु अभी ख़त्म नहीं हुए थे। उनकी आँखों में एक और, गहरी कहानी तैर रही थी। यह कहानी सबसे ज़्यादा निजी थी, सबसे ज़्यादा दर्द से भरी, और सबसे ज़्यादा आशा से लबालब।

“किसी व्यक्ति के दो पुत्र थे,” उन्होंने कहना शुरू किया, और उनकी आवाज़ में एक पिता का सा भारीपन आ गया। “छोटे ने अपने पिता से कहा, ‘पिताजी, सम्पत्ति में से मेरा हिस्सा मुझे दे दो।’ और पिता ने उन्हें उनकी सम्पत्ति बाँट दी।”

कहानी सामने आने लगी – एक समृद्ध खेत, हरे-भरे खेत, चरती हुई गायें। वह छोटा लड़का, उसकी आँखों में बेचैनी, दूर के शहरों की चमक। उसने सब कुछ नगद में बदल डाला, और कुछ ही दिनों में, वह एक दूर देश के रास्ते पर था, अपने पीछे धूल का एक बादल छोड़ता हुआ। शहर में, उसने अपना धन फूँक डाला – शानदार कपड़े, महंगी शराब, झूठी मित्रता वाली रातें। फिर एक सूखा पड़ा। पैसा चुक गया। मित्र गायब हो गए। वह एक ग़ैर-यहूदी के यहाँ सूअर चराने लगा – यहूदियों के लिए सबसे नीचा काम। वह भूख से इतना व्याकुल था कि सूअरों के चारे में डाले जाने वाले फली-सीढ़ों को खाने को दिल करता था। लेकिन कोई उसे देता नहीं था।

यीशु ने विस्तार से बताया, “तब वह होश में आया और बोला, ‘मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को रोटियाँ बहुत मिलती हैं, और मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ। मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगा और उससे कहूँगा – पिताजी, मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और तेरे सामने पाप किया है। अब मैं तेरा पुत्र कहलाने के योग्य नहीं रहा। मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।’”

फिर यीशु ने उस पिता का चित्र खींचा। वह रोज़ सड़क की ओर देखता। उम्मीद उसकी आदत बन गई थी। एक दिन, बहुत दूर, धूल में एक झुकी हुई, कमजोर सी आकृति दिखाई दी। लेकिन पिता की आँखें पहचान गईं। वह दौड़ा। उसकी उम्र भूल गई, उसका गौरव भूल गया। वह दौड़ता रहा, उसके लबादे के पल्लू हवा में लहरा रहे थे। उसने अपने बेटे के गले लगाया, उसके गंदे, सूअरों की बदबू से दूषित कपड़ों से परवाह किए बिना, और चूमा।

“पिता ने अपने दासों से कहा,” यीशु की आवाज़ भावनाओं से भर उठी, “‘शीघ्र लाओ, उत्तम वस्त्र लाकर इसे पहिनाओ, और इसके हाथ में अंगूठी और पाँव में जूती दो। और पलटा हुआ बछड़ा लाकर मारो, और खाएँ और आनन्द करें। क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, और जीवित हो गया; खो गया था, और मिल गया।’ और वे आनन्द करने लगे।”

लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती थी। बड़ा बेटा, जो खेत में काम कर रहा था, घर लौटा। संगीत और नाच的声音 सुनकर वह हैरान रह गया। एक नौकर ने उसे सब कुछ बताया। उसका चेहरा क्रोध और ईर्ष्या से काला पड़ गया। वह घर के अंदर नहीं गया। उसका पिता बाहर आया, उसे मनाने। लेकिन बड़े बेटे के शब्द कड़वे थे, “देख, इतने वर्षों से मैं तेरी सेवा करता आया हूँ, और मैंने कभी तेरी आज्ञा नहीं तोड़ी; तू ने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी नहीं दिया कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता। पर जब तेरा यह पुत्र आया, जिसने तेरी सम्पत्ति पतितों के साथ उड़ा दी, तो तू ने उसके लिए पलटा हुआ बछड़ा मार डाला।”

पिता की आवाज़ कोमल थी, लेकिन दृढ़। “हे पुत्र, तू सदा मेरे साथ है, और मेरी सब वस्तुएँ तेरी हैं। पर आनन्द और मगन होना इसलिए अच्छा था, कि तेरा भाई मर गया था और जीवित हो गया; खो गया था और मिल गया।”

यीशु ने कहानी यहीं समाप्त की। वे कुछ और नहीं बोले। शाम की लाली अब बैंगनी में बदल रही थी। पहली तारा टिमटिमा रहा था। लोग चुपचाप बैठे थे। किसी ने साँस भी नहीं ली। उनमें से कई की आँखों में आँसू थे। कुछ ने अपना सिर झुका लिया था। फरीसी चुपचाप खिसक गए थे, उनके चेहरे अब भी कठोर थे, लेकिन उनकी चाल में एक अनिश्चितता थी।

यीशु उठे। उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। बस, उस गाँव की ओर चल पड़े जहाँ ‘पापी’ और ‘खोए हुए’ उनका इंतज़ार कर रहे थे, एक ऐसा स्वागत जो किसी बड़े भाई के घर में नहीं, बल्कि एक पिता के घर में होता है – बिना शर्त, बिना हिसाब-किताब के, सिर्फ इसलिए कि वह लौट आया है।

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