वह सुबह यरदन नदी के किनारे की ठंडी हवा में एक अजीब सी गर्मी लिए हुए थी। अभी सूरज पूरी तरह से नहीं निकला था, बस क्षितिज पर एक धुंधली सुनहरी रेखा फैल रही थी। याकूब एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे बैठा, पत्थरों से छोटे-छोटे कंकड़ नदी की ओर फेंक रहा था। हर कंकड़ पानी को चीरता, एक गोलाकार लहर बनाता, और फिर शांत पानी में विलीन हो जाता। उसके मन की स्थिति कुछ वैसी ही थी – हलचल, और फिर वापस उसी गहरे स्तब्ध धैर्य में डूब जाना।
कई रातों से उसकी नींद उचटी हुई थी। यरूशलेम की उन गलियों की यादें, जहाँ उसने अपने चाचा की दुकान में काम किया था, उसे सताती रहतीं। वहाँ सिर्फ माल का हिसाब-किताब नहीं होता था। वहाँ सौदेबाजी होती, झूठ बोला जाता, ग्राहकों को धोखा दिया जाता। पहले तो यह सब एक ‘व्यवसाय की ज़रूरत’ लगती थी। फिर धीरे-धीरे यह उसके स्वभाव का हिस्सा बन गया। झूठ बोलना उतना ही सहज हो गया जितना सांस लेना। लालच उसकी नस-नस में समा गया, एक ऐसी जंजीर बन गया जिसका वजन वह हर पल महसूस करता, पर उतार नहीं पाता था। वह स्वतंत्र था, पर उसकी आत्मा एक गहरे कुएं में कैद थी।
तभी उसकी मुलाकात प्रिस्किल्ला और अकुला नामक उस जोड़े से हुई, जो तम्बू बनाने का काम करते थे। उनके चेहरे पर एक अलग ही प्रकाश था। एक शांति, जो उसकी समझ से परे थी। वे उस मसीह के बारे में बात करते, जिसने मृत्यु को जीत लिया था। एक दिन अकुला ने उससे पूछा, “याकूब, क्या तुम्हें कभी ऐसा लगता है कि तुम्हारे अंदर का आदमी और बाहर का आदमी एक दूसरे से लड़ रहे हैं? जो तुम करते हो, वह नहीं करना चाहते। जो तुम करना चाहते हो, वह कर नहीं पाते।”
याकूब की सांस रुक सी गई। ऐसा लगा जैसे अकुला ने उसके मन की खिड़की से झांककर सब कुछ देख लिया हो। वही उलझन, वही युद्ध। उसने धीरे से सिर हिला दिया।
“यह पाप का शासन है,” अकुला ने कहा, उनकी आवाज़ में सहानुभूति थी, दोष नहीं। “यह एक ऐसे गुलाम की तरह है, जो तुम्हें मजदूरी देता है, पर वह मजदूरी है मृत्यु की। लेकिन मसीह में एक रास्ता है। जब हम उन पर विश्वास करते हैं, तो हम उनकी मृत्यु और उनके पुनरुत्थान से जुड़ जाते हैं। बपतिस्मा इसी का चिह्न है। पानी में डूबना… यह उस पुराने आदमी का, पाप के प्रति मरना है। और पानी से निकलना… यह एक नए जीवन में, उनके जैसे जीने के लिए जी उठना है। अब तुम पाप के दास नहीं रहे। तुम परमेश्वर के लिए जीते हो।”
वे शब्द याकूब के मन में गूंजते रहे, जैसे दूर पहाड़ियों में गूंजती कोई घंटी। आज वह इसीलिए यहाँ था। नदी का पानी धीरे-धीरे बह रहा था, ठंडा और साफ। प्रिस्किल्ला और अकुला पानी में खड़े थे, और उनके साथ कुछ और विश्वासी। हवा में एक अलौकिक उत्साह था।
याकूब उठा। उसके पैर नरम घास पर चले। जैसे-जैसे वह पानी के निकट बढ़ा, उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। यह डर नहीं था। यह वह भय था, जो किसी बड़े, पवित्र क्षण के सामने होता है। उसने अपनी चादर एक ओर रखी।
पानी उसके टखनों को छुआ – एक तीखी ठंडक, जिससे उसकी सारी उनींदी इंद्रियां जाग गईं। फिर घुटने, कमर, छाती। अकुला ने उसका हाथ पकड़ा। “याकूब, क्या तुम प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हो? क्या तुम उनके साथ मरने और उनके साथ जी उठने के लिए तैयार हो?”
उसकी आवाज़ स्पष्ट थी, हल्के नदी के शोर के बीच भी सुनाई दे रही थी। “हाँ,” याकूब ने कहा। और फिर वह शब्द उसके गले से निकला, जिसमें उसका सब कुछ समाया हुआ था – उसके पछतावे, उसकी आशा, उसका समर्पण। “मैं विश्वास करता हूँ।”
तभी अकुला ने उसे पीछे की ओर ढकेला। याकूब ने आकाश का वह टुकड़ा देखा, जो अब नीला होने लगा था। फिर पानी ने उसे अपनी गोद में ले लिया। ठंड ने उसे चारों ओर से घेर लिया। कानों में पानी का गुंजन, आँखें बंद, सांस रुकी हुई। यह डूबना नहीं था। यह दफन होना था। उस पुराने याकूब का, जो झूठ बोलता था, लालच करता था, अपने से और सबसे छुपा-छुपाकर जीता था। वह सब इसी पानी में दफन हो रहा था। मसीह की कब्र की याद आई। उसकी अपनी कोई पहचान नहीं रही, बस आत्मसमर्पण का यह क्षण।
फिर हाथों ने उसे ऊपर खींचा। वह तेजी से ऊपर आया, और जैसे ही उसका सिर पानी से बाहर निकला, उसने एक झटके से सांस ली। हवा उसके फेफड़ों में भरी – ताज़ा, मीठी, नई हवा। आँखें खुलीं। सूरज अब नदी के ऊपर था, और उसकी किरणें पानी की लहरों पर सुनहरे सिक्कों जैसे नाच रही थीं। उसके शरीर से पानी की धाराएं बह रही थीं। बाहर निकलते ही प्रिस्किल्ला ने उसे एक सूखी चादर में लपेट दिया। शरीर काँप रहा था, पर अंदर एक अग्नि सी जल उठी थी।
वह किनारे पर बैठ गया। सब कुछ वही था – वही पेड़, वही पहाड़ियाँ, वही नदी। पर सब कुछ बदला हुआ था। ऐसा लगा जैसे उसने आज तक साँस नहीं ली थी। वह भारीपन, वह जंजीरें… गायब थीं। उनकी जगह एक सुखद हल्कापन था। यह आनंद नहीं था, यह एक गहरी शांति थी, जैसे कोई लंबा युद्ध समाप्त हो गया हो।
वह समझ गया। बपतिस्मा कोई जादू नहीं था। यह शुरुआत थी। अब उसे अपने पुराने स्वभाव की आदतों, उन रास्तों से लड़ना था, जो उसे वापस उसी गंदे पानी में खींचना चाहते थे। पर अंतर यह था कि अब वह एक गुलाम नहीं था। अब वह चुन सकता था। अब वह उसके लिए जी सकता था, जिसने उसे इस नए जीवन के लिए मुक्त किया था। वह एक मरे हुए आदमी की तरह था, जो पाप के प्रति मर चुका था, पर परमेश्वर के प्रति जीवित था। मृत्यु का उस पर अब कोई अधिकार नहीं था।
दिन चढ़ आया था। याकूब ने अपने कपड़े पहने। वह जानता था कि लौटकर उसे उन्हीं गलियों में जाना है, उसी दुनिया में। पर वह व्यक्ति अब वह नहीं रहा, जो सुबह यहाँ आया था। वह पानी में दफन हुआ था, और अब एक नए नाम, एक नई पहचान के साथ जी उठा था। उसने एक आखिरी नज़र नदी पर डाली। पानी अब भी वैसे ही बह रहा था, लेकिन अब वह सिर्फ पानी नहीं रहा। वह एक कब्र भी थी, और एक जन्म-स्थान भी। और याकूब धीरे-धीरे, अपने नए पैरों पर, उस रास्ते पर चल पड़ा, जो अब सिर्फ उसका ही नहीं था।




