पवित्र बाइबल

विश्वास और कर्म की कहानी

गर्मियों की एक दोपहर थी। सूरज ऐसे तप रहा था मानो आकाश की छत टिन की हो। गाँव के छोटे से चर्च के अंदर हवा जमीन पर बैठी हुई लगती थी, एक स्थिर, भारी गर्मी का आगार। पंखा ऊपर, छत से बंधा हुआ, अपनी एक सी आवाज़ में आह भरता घूम रहा था। याकूब पादरी, जिनके हाथ में बाइबिल की पुरानी प्रत थी, मंच पर बैठे एक टूटी-सी कुर्सी पर अपनी पीठ सीधी किए हुए थे। उनके सामने बिरले ही लोग थे – कुछ बुजुर्ग महिलाएं जो नियमित थीं, एक-दो किसान जिनकी फसल सूख चुकी थी और उन्हें शायद सांत्वना चाहिए थी, और एक नई आकृति – एक शहर का आदमी, साफ-सुथरे कपड़े, चेहरे पर एक अलग तरह की चमक, जो गाँव की धूल में भी नहीं छिप रही थी।

दरवाजे पर एक आहट हुई। सबकी निगाहें उधर गईं। कमला, गाँव की ही विधवा, जिसके तीन बच्चे थे और जो चर्च के बरामदे में झाड़ू लगाकर कभी-कभार कुछ पैसे पाती थी, खड़ी थी। उसके कपड़े फटे थे, पैरों में चप्पल नहीं थी, और चेहरे पर वही थकान थी जो उसकी नियति बन चुकी थी। उसने अंदर आने की इजाज़त मांगने के लिए दरवाजे का सहारा लिया हुआ था। पादरी याकूब ने देखा। उनकी आँखों में एक क्षण की चमक आई, वह चमक जो एक शिक्षक को तब मिलती है जब उसे अपना उदाहरण सामने दिख जाता है।

“अंदर आ जाओ बेटी,” उन्होंने कहा, और अपनी जगह से उठकर इशारा किया, “वहाँ पीछे बैठ जाओ।”

लेकिन उससे पहले कि कमला आगे बढ़ती, वह शहरी सज्जन, जिनका नाम पता चला था श्री ओबेरॉय, उठ खड़े हुए। “पादरी जी, यह…यह स्थान तो पवित्र है। क्या यह उचित है?” उनकी आवाज़ में नफरत नहीं थी, बस एक ठंडी, दूरी भरी असहजता थी, जैसे कोई कीचड़ को देखकर अपने जूते सँभाल ले।

चर्च में सन्नाटा छा गया। पंखे की आवाज़ अचानक तेज हो गई। याकूब पादरी ने धीरे से अपनी बाइबिल मेज पर रखी। उनकी नजर श्री ओबेरॉय पर टिक गई, फिर कमला के चेहरे पर गई, जो शर्म से सिर झुकाए खड़ी थी, फिर उन सभी पर जो बैठे थे।

“श्री ओबेरॉय,” उनकी आवाज़ बहुत नरम थी, लेकिन उस नरमाई में एक लोहे की छड़ जैसा दम था, “क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में यह स्थान किससे पवित्र होता है?”

ओबेरॉय ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी कुर्सी पर वापस बैठ गए, मानो यह बहस उनके स्तर की न हो।

याकूब ने आगे बढ़कर कमला का हाथ पकड़ा और उसे अपने पास वाली एक बेंच पर बैठा दिया। फिर वह मंच पर लौटे। उन्होंने बाइबिल नहीं उठाई। उन्होंने उन लोगों के चेहरों को देखा, जैसे उनकी आत्माओं को पढ़ रहे हों।

“मेरे भाइयों और बहनों,” उन्होंने शुरू किया, “हम अक्सर अपने विश्वास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। हम कहते हैं कि हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं। यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन क्या केवल कह देने भर से काम चल जाता है?” उन्होंने एक ओर इशारा किया, जहाँ कमला बैठी थी। “मान लो आज कोई भिखारी, कोई गरीब, फटेहाल कपड़ों में इस दरवाजे पर आता है और कहता है कि उसे खाना चाहिए, उसके बच्चे बीमार हैं। और हम में से कोई उससे कह दे, ‘जाओ, शांति से रहो, ठंडे-गर्म से अपने तन को बचाओ, भरपेट भोजन पाओ।’ पर उसके हाथ में एक रोटी का टुकड़ा तक न रखे। तो क्या हमारे शब्दों का कोई मूल्य रह जाएगा?”

एक बूढ़ा किसान, जिसके हाथ मिट्टी से रचे-बसे थे, धीरे से सिर हिलाने लगा। उसकी आँखों में एक दर्द था, शायद अपनी लाचारी का।

“विश्वास,” याकूब ने कहा, “अगर उसके साथ कर्म न जुड़े, तो वह मरा हुआ है। बिल्कुल उस शव की तरह जिसमें प्राण न हों। देखो, शैतान भी परमेश्वर पर विश्वास करता है, और काँपता है। लेकिन उसका विश्वास किस काम का? उसने कभी आज्ञा नहीं मानी।”

उन्होंने एक लंबी सांस ली। “हम चर्च में आते हैं, अच्छे कपड़े पहनकर, सबके सामने सम्मानित बनकर। और जब कोई गरीब आदमी, मैले कपड़ों में आता है, तो हम उसे दूर कोने में बैठने को कहते हैं। ‘तुम यहाँ बैठो, मेरे पास वाली जगह खाली है, पर तुम्हारे लिए नहीं।’ क्या हमने उस पल अपने दिल में भेदभाव नहीं पाला? क्या हम न्यायी नहीं बन बैठे, बुरे विचारों के?”

श्री ओबेरॉय ने अपनी नजरें नीची कर लीं। वह बेंच पर बैठे-बैठे सिकुड़ रहे थे।

“परमेश्वर ने दीन-दुनिया को चुना है, इस संसार में धनी बनने के लिए, और उन्हें विश्वास का वारिस ठहराया है। पर तुमने तो उस गरीब का अपमान किया। क्या धनी लोग ही नहीं हैं जो तुम्हें दबाते हैं, और तुम्हें ही अदालतों में घसीटते हैं? क्या वही तुम्हारे उस महान नाम की निन्दा नहीं करते, जो तुम पर पुकारा गया है?”

चर्च में हवा रुक सी गई थी। याकूब की आवाज़ अब और गहरी हो गई थी, जैसे दूर से आती कोई घंटाघर की आवाज़।

“अगर तुम व्यवस्था की पूरी रीति पर चलते हो, पर एक ही बात में चूक जाते हो, तो तुम सब बातों का उल्लंघन करने के दोषी ठहरते हो। क्योंकि जिसने ‘व्यभिचार न करना’ कहा, उसने ‘हत्या न करना’ भी कहा। अगर तुम व्यभिचार नहीं करते, पर हत्या करते हो, तो तुम व्यवस्था के उल्लंघन करने वाले हो। इसलिए जैसे तुम स्वतंत्र होकर जियो, वैसे ही वह व्यवस्था के अनुसार जिसने दया की है, उसके लिए न्याय करो। क्योंकि न्याय के बिना दया, उपेक्षा है।”

उन्होंने रुककर कमला की ओर देखा। “तुम सब जानते हो इस बहन को। उसके पास देने के लिए कुछ नहीं है। पर क्या तुमने कभी सोचा कि जो एक रोटी का टुकड़ा वह अपने बच्चों में बाँटती है, वह परमेश्वर के सामने कितना मूल्यवान है? और हम, जिनके पास बहुत कुछ है, हम उसके लिए क्या करते हैं? केवल उपदेश? केवल खाली शब्द?”

वह मंच से नीचे उतरे और कमला के पास जाकर खड़े हो गए। “इसलिए मेरे प्रिय भाइयों, इस बात को अच्छी तरह समझ लो। विश्वास अगर कर्मों से नहीं जुड़ा, तो वह अपने आप में निष्फल है। कोई कह सकता है, ‘तुम्हारे पास विश्वास है, मेरे पास कर्म हैं।’ मुझे अपने कर्मों के द्वारा, बिना शब्दों के, अपना विश्वास दिखा देने दो। तुम शैतान पर विश्वास करते हो? बहुत अच्छा! लेकिन कर्मों के बिना तुम्हारा विश्वास मरा हुआ है।”

“हमारे पिता इब्राहीम को देखो। जब उन्होंने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, तो क्या वह केवल विश्वास से नहीं, बल्कि कर्मों से भी धर्मी ठहरा? स्पष्ट देख लो कि विश्वास ने उसके कर्मों के साथ मिलकर काम किया, और कर्मों से विश्वास सिद्ध हुआ। इस तरह पवित्र शास्त्र की बात पूरी हुई कि ‘इब्राहीम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिए धर्म गिना गया।’ और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया। इसलिए तुम देखते हो कि मनुष्य केवल विश्वास से नहीं, बल्कि कर्मों से भी धर्मी ठहरता है।”

याकूब पादरी की आवाज़ अब थक गई लग रही थी, लेकिन उसमें एक नरमी आ गई थी। “राहाब वेश्या का भी यही हाल था। क्या उसने दूतों को अपने घर में रखकर और दूसरे मार्ग से विदा करके, कर्मों से धर्मी नहीं ठहराया? क्योंकि जिस प्रकार शरीर आत्मा के बिना मरा हुआ है, उसी प्रकार विश्वास भी कर्मों के बिना मरा हुआ है।”

वह रुके। उनकी बात पूरी हो गई थी। चर्च में सन्नाटा अब भारी नहीं, बल्कि एक विचारशील शांति से भर गया था। श्री ओबेरॉय उठे, और बिना कुछ कहे, चर्च से बाहर निकल गए। लेकिन जाते-जाते उन्होंने कमला की ओर देखा, और एक असहज झुकाव उनके सिर में था।

दूसरे दिन की सुबह, जब कमला चर्च के ब

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