कुरिन्थुस की उन गलियों से गुज़रते हुए पौलुस के कदम थके हुए थे, पर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। हवा में समुद्र का नमकीन स्पर्श था, और बंदरगाह से आती जहाजों की आवाज़ें दूर से सुनाई दे रही थीं। शहर की इस भीड़ और कोलाहल के बीच, उसके मन में वे शब्द गूंज रहे थे जो उसे प्रभु से मिले थे – एक ऐसा ख़जाना जो मिट्टी के मटकों में रखा था। वह एक ऐसे समय में परमेश्वर के सेवक के रूप में काम कर रहा था जब लोग चमत्कार चाहते थे, शानदार भाषण चाहते थे, न कि एक थके हुए, कई बार पिटे हुए यहूदी को जो क्रूस का संदेश सुनाने आया था।
उस दिन सुबह, एक युवक ने उससे पूछा था, “पौलुस, तुम इतने कष्ट क्यों सह रहे हो? तुम्हारा परमेश्वर कहाँ है जब तुम जेल में होते हो, जब तुम भूखे रहते हो?” पौलुस ने उसकी ओर देखा, उसके चेहरे पर कोमलता थी। उसने जवाब दिया, “बेटा, परमेश्वर का समय अलग होता है। वह मेरे कष्टों में मेरे साथ है। जब मैं धैर्य से काम लेता हूँ, जब मैं परीक्षाओं में खरा उतरता हूँ, तब वही शक्ति मुझे संभालती है।” उसकी आवाज़ में एक गहरा विश्वास था, जैसे कोई पहाड़ बोल रहा हो।
फिर भी, रात के समय, जब वह अकेला होता, तो कभी-कभी डर की एक ठंडी छाया उसके मन को छू जाती। क्या लोग समझ पाएंगे? क्या वे देख पाएंगे कि यह दुःख उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि परमेश्वर की सामर्थ्य का प्रमाण है? उसे याद आया कि कैसे पिसिदिया के इलाके में उसे पत्थरवाह किया गया था। उस समय की पीड़ा अभी भी उसकी हड्डियों में दर्ज थी। पर उसी रात, एक सपने में, उसे एक आवाज़ सुनाई दी थी, “मेरा अनुग्रह तेरे लिए बहुत है।” और वह जानता था कि यह सच है।
उसने अपने मित्र तीमुथियुस को एक पत्र लिखना शुरू किया, उन भावनाओं को शब्द दिए जो उसके हृदय में उमड़-घुमड़ रहे थे। कलम चलते हुए उसे लगा जैसे वह अपनी आत्मा को पन्नों पर उंडेल रहा है। “हम बहुत सी बातों में अपने आप को परमेश्वर के सेवक ठहराते हैं,” उसने लिखा, “बड़े धैर्य से, क्लेशों में, आवश्यकताओं में, संकटों में।” हर शब्द के साथ, उसके जीवन के दृश्य सामने आते गए – वह रात जब वह भागकर दमिश्क की दीवारों से टोकरी में लटक कर उतरा था; वह लंबी यात्राएँ जब पैरों में छाले पड़ गए थे; वह विरोधी चेहरे जो उसके संदेश को सुनकर तमतमा जाते थे।
पर वह यह भी लिखना चाहता था कि इन सबके बीच, एक आनंद था, एक शांति थी जो समझ से परे थी। वह लिखता गया, “पवित्र आत्मा में, निष्कपट प्रेम में, सत्य के वचन में, परमेश्वर की सामर्थ्य में… दायें और बायें हाथ में, आदर और अपयश में, बदनामी और सुनामी में।” उसे लगा जैसे वह एक तस्वीर बना रहा है – एक ऐसी तस्वीर जिसमें काले और सफेद रंग साथ-साथ चलते हैं, पर मिलकर एक सुंदर चित्र बनाते हैं।
एक बार की बात है, कुरिन्थुस की कलीसिया के कुछ लोगों ने उस पर आरोप लगाया कि वह केवल शब्दों का जादूगर है, उसके कर्म खोखले हैं। उस दिन पौलुस ने चुपचाप सब कुछ सुना, और फिर धीरे से कहा, “हमने तुम्हारे सामने अपने मन के द्वार खोल दिए हैं।” उसकी आँखें नम थीं। “तुम हमें दूर न करो। तुम्हारे हृदय भी संकरे न हों।” वह चाहता था कि वे समझें – यह संबंध एकतरफा नहीं था। परमेश्वर का प्रेम उन तक पहुँचाने के लिए उसने सब कुछ दिया, और अब वह उनसे भी एक संगति चाहता था, एक आत्मीय मेल।
पत्र लिखते-लिखते, दिन ढलने लगा। खिड़की से आती हुई संध्या की लालिमा ने कमरे को सुनहरा कर दिया। पौलुस ने कलम रखी। उसने लिखा था, “अपवित्रता के साथ अयोग्य जोड़ न बनो।” ये शब्द उसे बहुत गहरे लगे। वह जानता था कि कुरिन्थुस एक ऐसा शहर था जहाँ मूर्तिपूजा और अनैतिकता हवा में घुली हुई थी। वह चाहता था कि उसके प्रिय लोग, जो अब प्रकाश में आ चुके हैं, अंधेरे की ओर फिर न लौटें। यह चेतावनी प्रेम से दी गई एक पिता की चिंता थी, न कि न्यायी की धमकी।
अंत में, उसने वे पुराने शब्द लिखे जो उसे याद थे, पर इस बार उनमें उसका अपना जीवन सांस ले रहा था – “मैं तुम्हारा पिता बनूंगा, और तुम मेरे बेटे-बेटियां बनोगे।” उस पल, एक गहरी शांति ने उसे घेर लिया। सारे कष्ट, सारी चिंताएँ, सारी थकान – सब कुछ इस एक सत्य में समा गया कि वह परमेश्वर का है, और वे लोग जिनसे वह प्रेम करता है, वे भी परमेश्वर के हैं।
उसने पत्र समेटा। बाहर, कुरिन्थुस के दीपक जलने लगे थे, और दूर समुद्र में जहाजों के लट्टू टिमटिमा रहे थे। पौलुस ने एक लंबी सांस ली। कल फिर सुबह होगी, फिर लोगों से मिलना होगा, फिर संदेश सुनाना होगा। पर अब वह अकेला नहीं था। वह जानता था कि वह जो कुछ भी सह रहा है, वह व्यर्थ नहीं है। यह सब एक महान, अदृश्य योजना का हिस्सा था – परमेश्वर और मनुष्य के बीच टूटे हुए रिश्ते को जोड़ने की योजना। और इस काम में, वह एक मिट्टी का मटका ही सही, पर उसमें रखा खजाना अमूल्य था।




