वह आखिरी दिन शुरू हुआ था सामान्य सी सुबह से। आकाश में बादल तैर रहे थे, पर कोई भयावह संकेत नहीं था। नूह की पीठ थोड़ी झुक गई थी इतने वर्षों के श्रम से, पर उसकी आँखों में वही दृढ़ता थी जो परमेश्वर की आज्ञा मिलने के दिन थी। उसने अपने हाथ जोड़े, और फिर उस विशाल जहाज़ की ओर देखा, जो सैकड़ों बरसों के विश्वास का साक्ष्य था। लकड़ी की गंध हवा में तैर रही थी।
तभी, दूर से, एक कोमल गड़गड़ाहट सी आई। पक्षियों का झुंड अचानक बेतरतीब उड़ने लगा। नूह ने देखा, जमीन से, बिलों से, पेड़ों से, जानवरों की लयबद्ध आवाजाही शुरू हो गई। यह कोई उतावली भगदड़ नहीं थी, बल्कि एक गंभीर, शांत प्रक्रिया थी, मानो सृष्टि स्वयं परमेश्वर के निर्देश पर चल रही हो। हाथी अपने धीमे डग भरते हुए आए, उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी। भेड़ें बल खाती हुई, शेर धीरे-धीरे, और चूहे दबे पाँव। “जोड़े-जोड़े,” नूह ने अपने बेटों से कहा, और वे सब द्वार पर खड़े हो गए उनका मार्गदर्शन करने के लिए।
दोपहर तक, जहाज़ का अंदरूनी हिस्सा जीवित ध्वनियों से गूंजने लगा। सिंह की गुर्राहट, गाय का रंभाना, पक्षियों का चहकना—सब एक अद्भुत समरसता में मिल रहे थे। नूह की पत्नी ने चुपचाप एक कोने में बैठकर कुछ सूखे मेवे बाँधे। उसकी आँखें नम थीं। बाहर की दुनिया, उन पड़ोसियों की हँसी-मजाक की आवाजें, जो सदियों से इस “पागल बूढ़े” का मजाक उड़ाते आए थे, वे अब धुंधली पड़ रही थीं।
फिर वह क्षण आया। आकाश ने एक गहरा, लंबा साँस लिया, और फिर बरसना शुरू कर दिया। यह कोई सामान्य वर्षा नहीं थी। ऐसा लगा जैसे स्वर्ग के सारे जलाशय फट गए हों। पानी की मोटी-मोटी रस्सियाँ जमीन से टकरातीं, और कुछ ही देर में धरती का चेहरा धुंधला होने लगा। नूह और उसका परिवार, सभी आठ जन, अंदर आए। परमेश्वर ने द्वार स्वयं बंद कर दिया। बाहर से आती हथौड़ों की आवाज के बजाय, केवल पानी का गर्जन था, और लकड़ी के जोड़ों के चरमराने की आवाज।
जहाज़ हिलने लगा। धीरे से पहले, फिर एक तैरती हुई अस्थिरता के साथ। बाहर, पानी बढ़ता ही जा रहा था। पहाड़ियाँ डूब गईं, परिवार के खेत, वे पेड़ जिनके नीचे नूह ने बचपन खेला था, सब जल-समाधि में चले गए। उसके बेटे शेम ने एक खिड़की की ओर देखने की कोशिश की, पर केवल घना, भूरे रंग का जल दिखाई दिया, आकाश से मिला हुआ। हवा में नमक और तरल मिट्टी की गंध थी।
रात आई तो अंधकार और भी भयावह था। जहाज़ के भीतर जानवर शांत थे, मानो इस महाप्रलय का भार समझ रहे हों। नूह ने अपने पोते-पोतियों को देखा, जो डर से सहमे हुए थे। उसने उन्हें बांहों में भर लिया। “यह उसकी न्याय की घड़ी है,” उसने धीरे से कहा, “पर हमारे लिए, यह अनुग्रह का सन्दूक है।”
चालीस दिन और चालीस रातें। वह समय कैसे बीता, यह वे स्वयं भी नहीं बता सकते थे। दिनचर्या बन गई: जानवरों को चारा-पानी देना, प्रार्थना करना, उस लौहद्वार की ओर देखना जो बंद था। कभी-कभी जहाज़ किसी डूबे हुए पेड़ या पहाड़ की चोटी से टकरा कर एक भयानक खड़खड़ाहट करता, और सब की साँसें अटक जातीं। फिर शांति।
आखिरकार, वर्षा रुकी। सन्नाटा और भी गहरा था। केवल पानी के हिलने की मद्धिम आवाज। नूह ने प्रतीक्षा की। फिर प्रतीक्षा की। उसका हृदय जानता था कि यह उजड़ाव स्थाई नहीं है। परमेश्वर ने वाचा बाँधी थी। और जिसने उन्हें इस सन्दूक में सुरक्षित रखा था, वही उन्हें नई धरती पर कदम रखने देगा।
कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, पर उत्पत्ति का सातवां अध्याय उसी गहरे जल में समाप्त होता है, जहाँ सब कुछ डूब चुका है, पर एक लकड़ी का पहाड़ उम्मीद लिए तैर रहा है। और उसके भीतर, सृष्टि का भविष्य सो रहा है, जाग रहा है, और प्रतीक्षा कर रहा है।




