पवित्र बाइबल

पोतीपर की पत्नी और यूसुफ की परीक्षा

वो दिन आम दिनों जैसा ही शुरू हुआ था। मिस्र की धूप तेज थी, और हवा में रेत के महीन कण तैर रहे थे। यूसुफ ने आँगन में खड़े होकर एक लम्बी साँस ली। पोतीपर का घर, जहाँ वह सेवक था, चहल-पहल से भरा हुआ था। दास आ-जा रहे थे, लेखक हिसाब-किताब में व्यस्त थे, और बाहर बाजार का शोर सुनाई दे रहा था। पर यूसुफ के मन में एक अजीब सी शांति थी। वह जानता था कि उसकी जिंदगी उसके भाइयों के हाथों बेचे जाने के बाद से ही एक लम्बी यात्रा थी, और उस यात्रा में परमेश्वर उसके साथ था।

पोतीपर, फिरौन के अधिकारियों में से एक, ने इस युवक में कुछ खास देखा था। यूसुफ के हाथ में जो कुछ भी आता, वह फलता-फूलता था। घर का सारा प्रबंध, सारी जिम्मेदारी, धीरे-धीरे उसी के कंधों पर आ गई। पोतीपर को बस इतना भर पता था कि जब से यह यहूदी युवक उसके घर आया है, उसकी सम्पदा बढ़ी है, सब कुछ सुचारू चल रहा है। उसने यूसुफ पर पूरा भरोसा कर लिया था।

लेकिन घर में एक और थी – पोतीपर की पत्नी। वह मिस्र की कुलीन स्त्री थी, आँखों में एक अद्भुत चमक और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो कभी-कभी बहुत गहरी, बहुत जटिल लगती थी। शुरू में, उसने यूसुफ को सिर्फ एक कुशल सेवक की नजर से देखा। पर धीरे-धीरे, उसका ध्यान उसकी सुडौल काया, गंभीर चेहरे और विनम्र पर दृढ़ स्वभाव पर जाने लगा। एक दिन, जब यूसुफ घर के भीतरी कमरों में कुछ कपड़े ले जा रहा था, तो वह रास्ते में खड़ी मिली। उसने कोई बात नहीं कही, बस उसे देखती रही। यूसुफ ने सिर झुकाकर अभिवादन किया और आगे बढ़ गया। पर उसकी नजरों का भार उसके पीठ पर महसूस हो रहा था।

फिर वह दिन आया। घर में सन्नाटा था, पोतीपर दूर कहीं गया हुआ था। यूसुफ अपने काम में लगा हुआ था कि अचानक पोतीपर की पत्नी ने उसे अपने कक्ष में बुलाया। कमरा खुशबूदार था, हवा में सुगंध तैर रही थी। वह सीधी बात पर आई। “मेरे साथ सोओ,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी, आधा अनुरोध और आधा आदेश।

यूसुफ का दिल जोर से धड़का। उसने नीचे देखते हुए कहा, “मेरे स्वामी ने इस घर का सब कुछ मेरे हवाले कर रखा है। वह खुद कुछ भी नहीं जानता, सिवाय इस रोटी के जो वह खाता है। उसने मुझ पर पूरा भरोसा किया है। तुम उसकी पत्नी हो। मैं ऐसा पाप कैसे कर सकता हूँ? यह परमेश्वर के सामने भी बहुत बड़ा दोष होगा।”

उसकी बात सुनकर उस स्त्री का चेहरा क्षण भर के लिए सख्त हो गया। फिर वह मुस्कुराई। उसने समझा, यह लड़का डर गया है। भय या लालच, कुछ न कुछ तो उसे मनवा ही लेगी। पर यूसुफ ने उस दिन वहाँ से जल्दी काम बना लिया। उसके पैरों में जैसे आग लग गई थी।

लेकिन वह स्त्री हार मानने वाली नहीं थी। दिन ब दिन, वह और आक्रामक होती गई। कभी कोमल शब्दों में, कभी झलकी हुई नाराजगी के साथ, कभी सीधे आदेश देकर। यूसुफ का एक ही जवाब था – मना करना। वह न केवल अपने स्वामी के विश्वास को धोखा नहीं देना चाहता था, बल्कि उस आवाज़ से डरता था जो उसके भीतर थी – परमेश्वर की आवाज, जो उसे सही और गलत का भेद बताती थी।

एक दोपहर, घर में और कोई नहीं था। यूसुफ किसी काम से भीतरी भवन में गया। अचानक, वह स्त्नी सामने आ गई। उसने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, उसे खींचा। “आज तू मेरी बात टाल नहीं सकता,” उसने कहा, उसकी आँखों में एक जुनून सा था। डर के मारे यूसुफ का खून सुन्न हो गया। उसने अपना हाथ झटककर छुड़ाया और भागा। पर वह उसका चोगा पकड़े हुए थी। वह उसके हाथ में ही रह गया। यूसुफ बिना पीछे मुड़े देखे, बाहर की ओर भाग गया, अपने स्वामी का घर, उसका कमरा, सब कुछ पीछे छोड़ता हुआ।

उसने जो कुछ छोड़ा था, वह अब एक हथियार बन गया। गुस्से और अपमान से जलती हुई उस स्त्री ने चोगा अपने पास रख लिया। जब पोतीपर घर लौटा, तो उसने रोना-पीटना शुरू कर दिया। उसने वह चोगा दिखाया। “वह यहूदी दास, जिसे तूने हमारे घर लाया था, वह मेरे पास छेड़छाड़ करने आया। जब मैं चिल्लाई, तो यह चोगा छोड़कर भाग गया।”

पोतीपर का चेहरा लाल हो गया। क्रोध से उसकी नसें फूल गईं। उसने बिना कुछ सोचे-समझे आदेश दिया। यूसुफ को बुलवाया गया और उसकी एक न सुनी गई। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। वह जेल, जहाँ राजा के कैदी रखे जाते थे – अँधेरी, नम, बदबूदार जेल। उसकी पीठ पर कोड़े पड़े, उसे धक्के देकर एक साँसल कोठरी में ढकेला गया। लोहे की सलाखों के पीछे, अँधेरे में बैठे यूसुफ के मन में एक ही विचार कौंध रहा था – ‘परमेश्वर, तू कहाँ है?’

समय बीता। जेल के अधिकारी ने भी, किसी अदृश्य हाथ की तरह, यूसुफ में वही योग्यता देखी। उस पर भरोसा किया। जल्द ही, वह सभी कैदियों का प्रबंधक बन गया। उसके हाथ में जो कुछ आता, वह सफल होता। जेल के अन्दर भी, परमेश्वर उसके साथ था, और उसने लोगों की दृष्टि में उस पर अनुग्रह दिखाया। वह कोठरी अब भी वही थी, पर उसमें एक आशा की किरण दिखने लगी थी। उसने सपना देखना बंद नहीं किया था। वह जानता था कि उसकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। कहीं दूर, परमेश्वर की एक योजना चल रही थी, और वह उसका एक टुकड़ा था। बस विश्वास बनाए रखना था। बस चलते रहना था।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *