सूरज ढलने लगा था, और मरुभूमि की लालिमा मिश्कान के सफेद बने तम्बू पर पड़ रही थी। हारून अपनी कुटिया के सामने बैठा, हाथों पर नज़र गड़ाए थे। ये वही हाथ थे जिन्होंने धूप-वेदी पर धूनी चढ़ाई थी, जो प्रायश्चित के दिन पवित्रस्थान के परदे के पीछे गए थे। पर आज उन पर एक अजीब सी थकान थी। उसके भीतर एक खालीपन सा घूम रहा था – सेवा का भार, डर का भार, और एक अनजाना दायित्व जो उसकी साँसों में भी समा गया था।
उसके पास बैठे उसके बेटे, एलीआजर और इथामार, चुपचाप रेत में लकीरें खींच रहे थे। चारों ओर इस्त्राएल के गोत्रों के तम्बू फैले हुए थे, और उन सबके बीच में, एक घेरा-सा बनाकर, लेवीयों के डेरे थे। कभी-कभी कोई आवाज़ उठती – बच्चे का रोना, भेड़ की मिमियाहट, लोहे के बर्तनों की खनखनाहट। सामान्य जीवन की ये आवाजें भी हारून को एक अलग ही संसार की लगतीं। उसकी दुनिया तो वह पवित्र तम्बू था, जिसके सामने धुआँ हमेशा उठता रहता।
तभी मूसा आते दिखे। उनके चेहरे पर वही गंभीरता थी, जो परमेश्वर के वचन को सुनकर लौटने वालों के चेहरे पर होती है। हारून का दिल धक-सा हो गया। कोरह, दातान और अबीराम की घटना के बाद से, हर संदेशा काँपती हुई आशंका लेकर आता था।
“भाई,” मूसा ने कहा, आवाज़ में एक ठोसपन था, “यहोवा ने तुमसे और तुम्हारे साथ तुम्हारे पुत्रों से बात की है। सुनो।”
हारून ने सिर उठाया। मूसा की आँखों में डूबी हुई वह आग, वह पवित्र भय, उसे दिखाई दिया। फिर मूसा ने बोलना शुरू किया। शब्द धीरे-धीरे, स्पष्ट और भारी होकर गिरे, जैसे पहाड़ से निकले पत्थर।
“तू और तेरे पुत्र, और तेरे पिता का घराना, पवित्रस्थान के पाप अपने ऊपर लोगे। और तू और तेरे पुत्र याजक का पद अपने ऊपर लोगे।” हारून ने अपनी साँस रोक ली। पाप? वह पवित्रस्थान का पाप? उसकी आँखों के सामने वह दृश्य तैर गया – सोने का सिंहासन, करूबों के पंखों की छाया, और वह असीम पवित्रता जिसके सामने खड़े होने का साहस केवल एक बार साल में, रक्त के साथ, किया जा सकता था। अब यह भयानक जिम्मेदारी उस पर और उसके वंश पर थी। एक गलती, एक चूक, और मृत्यु निश्चित थी। उसकी हथेलियाँ पसीने से तर हो गईं।
“और तेरे भाई लेवी के गोत्र को भी तेरे साथ खड़ा किया जाएगा,” मूसा ने आगे कहा, “पर वे तेरे सेवक बनेंगे। तू और तेरे पुत्र पवित्रस्थान और वेदी के सामने सेवा करोगे। और कोई अन्य नहीं, न कोई परदेशी, न कोई और गोत्र, तुम्हारे पास आकर तुम्हारी सेवा में हाथ न डालेगा। नहीं तो मृत्यु होगी।”
शब्द हवा में लटके रहे। यह एक सुरक्षा थी या एक कैद? हारून ने देखा – उसके चारों ओर लेवीयों के तम्बू। वे, उसके अपने माँ-बाप का गोत्र, अब उसके और पूरी सभा के बीच एक दीवार बन जाएँगे। वे तम्बू की रक्षा करेंगे, सेवा के सारे सामान उठाएँगे, पर उस पर्दे के भीतर नहीं जा सकेंगे। केवल हारून और उसके वंशज। एक विशेषाधिकार जो एक ताबूत के सामान था।
फिर मूसा ने उन चीजों के बारे में बताया जो परमेश्वर ने याजकों और लेवीयों के भरण-पोषण के लिए दी थीं। यहाँ आवाज़ में कठोरता के स्थान पर एक कोमलता आ गई, जैसे परमेश्वर अपने सेवकों की चिंता कर रहा हो।
“सभी इस्त्राएल की अर्पण की हुई पवित्र वस्तुएँ मैंने तुझे और तेरे पुत्रों को दी हैं,” मूसा ने कहा। “अन्नबलि, पापबलि, अपराधबलि की जो वस्तुएँ वापस लौटाई जाएँगी, वे अति पवित्र हैं। तुम पुरुषों को उन्हें पवित्र स्थान में खाना होगा।”
हारून के मन में तस्वीरें उभरने लगीं। लोगों की टोकरियाँ भरकर आतीं, अपने दिल की गहराई से निकालकर लाई गई फसल का पहला हिस्सा, तेल की बूँदें, नई शराब की सुगंध। और ये सब, परमेश्वर का प्रावधान, उसके और उसके परिवार के लिए। वह दशमांश का भी जिक्र आया – सारे इस्त्राएल का दिया हुआ दशमांश लेवीयों का होगा, और लेवीयों को उसमें से एक दशमांश, सबसे उत्तम हिस्सा, हारून के घराने को देना होगा।
“इसे तुम्हारे लिए मजदूरी समझो,” मूसा ने कहा, “क्योंकि तुम मिलापवाले तम्बू की सेवा करते हो। और इसके बदले तुम इस्त्राएलियों के पापों का भार अपने ऊपर लोगे।”
यह बात हारून के मन में उतर गई। यह मजदूरी नहीं थी, यह एक वाचा थी। एक आपसी बँधन। इस्त्राएल परमेश्वर को अपनी उपज देगा, परमेश्वर उसे याजकों और लेवीयों को देगा, और वे बदले में पवित्रस्थान की सेवा करके सबके पापों का भार उठाएँगे। यह एक जीवित चक्र था, एक पवित्र आदान-प्रदान।
रात हो चली थी, तारे निकल आए थे। मूसा चले गए थे। हारून अब भी बाहर बैठा था। उसकी नज़र उस विशाल, अंधेरे तम्बू पर थी, जिसके ऊपर अग्नि-स्तंभ का प्रकाश हल्का-हल्का महक रहा था। उसके भीतर का डर अब एक गहरी, शांत समझ में बदल रहा था। यह भारी था, यह डरावना था, पर यह स्पष्ट था। उसकी भूमिका, उसके बेटों की भूमिका, लेवीयों की भूमिका – सब कुछ साफ़ लिख दी गई थी, जैसे रेत पर कोई रेखाएँ खींच दी गई हों।
उसे याद आया कैसे लोग कभी-कभी ईर्ष्या से देखते थे, यह सोचकर कि याजक का पद बड़ी बात है। पर आज वह जान गया था कि यह बड़ाई नहीं, बल्कि एक पवित्र जोखिम था। एक ऐसी सेवा जिसमें जीवन और मृत्यु हमेशा पास-पास खड़े रहते थे।
अगले दिन सुबह, जब एलीआजर ने पवित्रस्थान के परदे के सामने धूप जलाई, तो हारून ने देखा कि उसके हाथ अब पहले जैसे काँपते नहीं थे। उनमें एक नया दृढ़तापूर्ण कर्म था। बाहर, लेवीय तम्बू के खंभों को सहारा दे रहे थे, रस्सियाँ कस रहे थे। उनकी आँखों में भी एक नया सम्मान था। वे जानते थे कि अब वे केवल वाहक नहीं, बल्कि परमेश्वर और उसकी सभा के बीच एक अटूट कड़ी थे।
और इस प्रकार, मरुभूमि के बीच, एक नई व्यवस्था ने जन्म लिया। न तो राजसी भवन थे, न सोने-चाँदी के बड़े पात्र। था तो केवल रेत, बालू, और किरमिजी रंग के बैलों के चमड़े से ढका एक तम्बू। पर उसके भीतर एक सिद्धान्त स्थापित हो रहा था – पवित्रता, सेवा, और प्रावधान का। हारून चुपचाप अपना काम करता रहा। उसे अब पता था कि उसकी सेवा उसके लिए ही नहीं, बल्कि उस पूरी भीड़ के लिए थी जो दूर, अपने तम्बुओं में, इस बात पर भरोसा किए हुए थे कि परमेश्वर उनके और उनके पापों के बीच में खड़ा है। और वह भरोसा, उस धूप की सुगंध की तरह, हवा में तैर रहा था।




