पवित्र बाइबल

योशू की स्मृति में इकतीस राजा

धुप ढलने लगी थी, और गिलगाल के शिविर में आग की लपटों के चारों ओर बूढ़े योशू का घेरा सिमट आया था। हवा में भुनी हुई मछली और धूल की सुगंध थी। नए युवा सैनिक, जिनके हाथों पर अभी तलवार के छाले नहीं पड़े थे, बेसब्री से उसकी ओर देख रहे थे। उनकी निगाहें एक सवाल पूछ रही थीं: ये सब कैसे हुआ?

योशू ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसके सामने नक्शा खुल गया – वह नक्शा जो उसकी स्मृतियों में दर्ज था, नदियों, पहाड़ियों और शहरों से भरा हुआ। वह आवाज़ उठाने लगा, धीमी, थकी हुई, मानो हर नाम के साथ एक भार उठा रहा हो।

“याद रखो,” उसने कहा, “याद रखो कि ये केवल जमीन के टुकड़े नहीं हैं। हर नाम के पीछे एक इतिहास खड़ा है, एक गर्व से तनी हुई भौंहें, एक सिंहासन जिसपर बैठा कोई मनुष्य स्वयं को अजेय समझता था।”

उसने पूर्व की ओर इशारा किया, जहाँ से वे आए थे। “उस पार के राजा… जिस जमीन पर हमने पहला पैर रखा, वह सिहोन की भूमि थी। अमोरीयों का राजा। उसकी राजधानी हेशबोन थी, पत्थरों से बनी मजबूत, पहाड़ी पर बैठी हुई। उसका अहंकार उसकी सेना से भी लम्बा था। उसने हमें रास्ता देने से मना कर दिया। तब प्रभु ने कहा, ‘डरो मत, मैंने उसे तुम्हारे हाथ में कर दिया।’ और ऐसा ही हुआ। यह हमारी पहली विजय थी, मिस्र से निकलने के बाद की पहली लड़ाई। उसकी भूमि – अरोएर से लेकर यब्बोक नदी तक, अम्मोन की सीमा पर – हमारे हाथ में आ गई।”

आग की एक चिनगारी उड़कर अंधेरे में मिल गई। योशू ने आगे बताया, “और फिर था ओग। बाशान का राजा। उसकी कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। वह रपाइमों में से बचा हुआ अंतिम व्यक्ति था, उसका शयनकक्ष लोहे का बना था, नाप में कोई उसके समान नहीं था। उसकी नगरियाँ – अष्तारोत और एद्रेई – दुर्गम पहाड़ियों पर बसी थीं। लोग कहते थे वह अजेय है। परन्तु प्रभु ने हमसे कहा, ‘उसके विषय में भी मत डर, जैसे तुमने सिहोन के साथ किया, वैसे ही उसके साथ करोगे।’ और हमने किया। हमने उस पूरे देश पर, उसके साठ नगरों पर, अर्गोब के सारे प्रदेश पर कब्जा कर लिया। हाशबोन से लेकर हेर्मोन पर्वत तक… सब कुछ।”

एक युवा ने पूछा, “लेकिन ये तो केवल दो नाम हैं। और बाकी?”

योशू मुस्कुराया। उसकी आँखों में उन सभी धूल भरे मैदानों, चिलचिलाती धूप में लड़े गए युद्धों, और रातों के डर का स्मरण तैर गया। “बाकी? बाकी तो एक लम्बी सूची है, बेटे। येरिखो का राजा, जिसकी दीवारें बिना तलवार उठाए गिर गईं। ऐ की राजा, जिसने हमें धोखे से मारा और फिर उसका पूरा नगर भस्म हो गया। यरूशलेम का राजा, हेब्रोन का राजा, यरमूत का राजा, लाकीश का राजा… हर एक का अपना किला, अपनी सेना, अपना देवता था।”

उसकी आवाज़ और गहरी हो गई, “गेज़ेर का राजा था, जिसकी सेना हाथियों जैसी थी। दबीर का राजा, जिसके पास ज्ञान के पुराने ग्रन्थों का भंडार कहा जाता था। गिलगाल का राजा? नहीं, वो तो अलग है… वो वह स्थान है जहाँ हमने पहला डेरा डाला था। होर्मा का राजा, अराद का राजा… नाम सुनते-सुनते कान थक जाते हैं। लिब्ना, अदुल्लाम, मक्केदा, बेतेल, तप्पूअह… हेफेर, अफेक, लाशारोन… मेरोम के जल के पास का राजा, नाफत-दोर का राजा, गोयीम का राजा… तिरसा का राजा।”

वह रुका। सन्नाटा छा गया था। “कुल इकतीस राजा।”

“इकतीस?” एक फुसफुसाहट ने हवा को काटा।

“हाँ। पूर्व और पश्चिम, यरदन के इस पार और उस पार। पर्वतीय प्रदेश, शेफेला, अराबा, ढलानें, जंगल, नेगेव… सब। हित्ती, अमोरी, कनानी, परिज्जी, हिव्वी, यबूसी… सबके सब।”

“पर हमने कैसे जीता? हम तो इतने कम थे?”

योशू ने आग की लपटों में देखा, मानो उसमें ही उत्तर छिपा हो। “तुम कम थे? हाँ। उनके रथ लोहे के थे, हमारे पास भाला और तलवार। उनके किले आकाश छूते थे, हमारे पास खच्चर के खाल से बने तंबू। लेकिन… लेकिन हम अकेले नहीं थे। याद करो यरदन का पानी कैसे रुका था। याद करो यरिखो की दीवारें। क्या यह हमारे बल से हुआ? नहीं। हर लड़ाई से पहले, प्रभु ने कहा – ‘मैंने उन्हें तुम्हारे हाथ में कर दिया।’ यह उसकी प्रतिज्ञा थी, अब्राहम, इसहाक और याकूब से की गई। और वह अपने वचन पर अडिग रहता है।”

उसने अपना हाथ जमीन पर फैलाया, मिट्टी को अपनी उंगलियों में रगड़ा। “यह जमीन अब हमारी है। नहीं… गलत कहा। यह जमीन अब *उसकी* है, और हम उसके लोग, उसकी सेवा में यहाँ रहेंगे। इन इकतीस नामों को याद रखो, न कि इसलिए कि हम महान योद्धा थे, बल्कि इसलिए कि वह विश्वासयोग्य है। जो वादा किया, उसे पूरा किया।”

रात हो चली थी। आग अब राख में बदल रही थी। युवा सैनिक चले गए, पर उनके मन में वे नाम, वे पहाड़ियाँ, वे नदियाँ अंकित हो गई थीं। योशू अकेला रह गया। उसने आकाश की ओर देखा, जहाँ तारे टिमटिमा रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे उस रात तिमनाह-सेराह में देखे थे, जब मूसा ने उसे आदेश दिया था – ‘दृढ़ और साहसी बनो।’

वह मुस्कुराया। इकतीस राजाओं की सूची केवल एक रिकॉर्ड नहीं थी। यह एक स्तुति-गान थी, एक याद दिलाने वाला चिन्ह था, कि प्रभु का हाथ छोटा नहीं हुआ है। और अभी भी बहुत सी भूमि बाकी थी… लेकिन यह कहानी कल की होगी। आज के लिए, इतना ही काफी था।

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