यरूशलेम की सुबह धीरे-धीरे खुल रही थी। पहाड़ियों से कोहरा सरक रहा था, और राजमहल के श्वेत पत्थरों पर सूरज की पहली किरणें टिमटिमा रही थीं। सुलैमान का राज्य, अब स्थिर और विस्तृत, एक विशाल देह की तरह सुबह की इस शांति में सांस ले रहा था। यह वह समय था जब परिश्रमी लोग अपने दिन की शुरुआत करते, और महल के भीतर भी, शासन के चक्र घूमने लगते।
महल के एक कोने में, एक छोटे से कमरे में जहाँ खिड़की से जैतून के पेड़ों की हरी झलक दिखती थी, शमा नाम का एक युवा लिपिक सावधानी से चर्मपत्र पर अंक गिन रहा था। उसके सामने विभिन्न प्रांतों से आए लेखा-जोखा के स्क्रोल फैले थे। हवा में चाक और लकड़ी की गंध थी। शमा ने आँखें मलीं। आज का काम बहुत था – दान के रूप में आए अनाज, जैतून का तेल, मेवे, चारा, सबका हिसाब। पर यह केवल संख्या नहीं थी। प्रत्येक अंक के पीछे एक कहानी थी, दूर-दराज़ के इलाक़े की, वहाँ के लोगों की, और राजा सुलैमान के उस ज्ञान की जिसने इस विशाल प्रबंधन को संभव बनाया था।
शमा को याद आया कैसे उसके बुजुर्ग, प्रांत नफ्ताली से आए एक किसान, ने बताया था कि अब वे निश्चिंत थे। पहले तो हर साल लड़ाइयों का डर, छापेमारी का भय रहता था। पर अब? अब वे अपनी ज़मीन पर मेहनत करते, फसल उगाते, और जानते थे कि उनका हिस्सा राज्य की व्यवस्था में, यरूशलेम की ओर जाएगा। यह कर नहीं था, यह एक साझेदारी थी। बारह प्रांतों में बँटा हुआ यह राज्य, हर महीने एक प्रांत राजा और उसके घराने के भरण-पोषण का दायित्व उठाता। और कोई शिकायत नहीं। क्योंकि बदले में मिली थी शांति। दान से लेकर दमिश्क तक, हेर्मोन से लेकर मिस्र की सीमा तक – हर आदमी अपनी दाखलता और अंजीर के पेड़ के नीचे बैठ सकता था।
और अधिकारीगण! शमा ने एक दूसरे स्क्रोल पर नज़र दौड़ाई। अज़र्याह, सादोक का पुत्र, याजक। एलीहोरप और अहिय्याह, मंत्री। यहोशापत, इतिहासकार। बेनायाह, सेना का प्रधान। सादोक और अबियातार, याजक। अज़र्याह, प्रधान अधिकारी। जब्दी का पुत्र अहिलूद, मंत्री… नामों की सूची लंबी थी, पर हर नाम एक ज़िम्मेदारी था। यहूदा और इस्राएल, समुद्र के किनारे बसे गावों से लेकर एफ्रैम के पहाड़ी दुर्गों तक, सब पर इन्हीं की निगाह थी। और इन सबके ऊपर थे बारह प्रभारी, हर एक एक प्रांत की देखरेख के लिए। उनके नाम भी शमा को याद थे – बेन-हूर, बेन-देकर, बेन-हेसेद… हर एक का एक महीना।
दोपहर ढल चुकी थी जब शमा ने अंतिम गणना पूरी की। उस दिन के लिए राजभंडार में आया था – तीस कोर महीन आटा, साठ कोर आटा, दस मोटे-मोटे बैल, बीस चरागाह के बैल, सौ भेड़-बकरियाँ, हिरन, मृग, दुमदार हिरन, और पलता हुआ मुर्ग़ा। यह सब केवल एक दिन का भोग था। शमा ने सिर हिलाया। यह विपुलता अचरज में डालने वाली थी। पर वह जानता था कि यह सब राजा की महिमा के लिए नहीं था। महल के द्वार सभी के लिए खुले थे। विदेशी राजदूत, दूर-दूर से आए व्यापारी, दरबार के लोग, सब यहाँ आते और राजा का ज्ञान सुनते। इस भोजन से उन सबका सत्कार होता।
शाम को, जब सूरज पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे डूब रहा था, शमा महल के ऊपरी प्रांगण में गया। वहाँ से नज़ारा विस्तृत था। यरूशलेम नीचे बसी हुई, धुएँ के बादल उठ रहे थे रसोईघरों से। सड़कों पर व्यापारी अपना सामान समेट रहे थे। और दूर, बहुत दूर तक, फैला हुआ था वह राज्य जो रेवैन नदी से लेकर ग़ज़ा तक, और तीम्ना से लेकर अक्को तक विस्तृत था। शांति थी। “दान से लेकर बेर्शेबा तक,” शमा ने धीरे से कहा। यह वह वादा था जो पूरा हुआ था। सुलैमान की प्रजा बहुत थी, समुद्र के किनारे की बालू के कणों के समान। वे खाते-पीते, आनन्द करते थे।
अचानक हवा के झोंके के साथ, दूर से घोड़ों के टापों और पहियों की आवाज़ आई। शायद कहीं से कोई दूत आ रहा था, या कोई प्रभारी अपनी रिपोर्ट लेकर। राज्य का काम कभी रुकता नहीं था। शमा ने एक लम्बी सांस ली। यह सब, यह समृद्धि, यह शांति, केवल मनुष्यों के प्रबंधन से नहीं थी। उसके मन में उन वचनों की गूँज उठी जो उसने बचपन से सुने थे – “यहोवा ने सुलैमान को चारों ओर बहुत ही बड़ी प्रतिष्ठा दी।” यह प्रतिष्ठा केवल धन या सैन्य बल से नहीं, बल्कि उस न्याय और शांति से थी जो परमेश्वर के भय पर टिकी थी।
रात के पहरे की घंटी बजी। शमा ने अपने चर्मपत्र समेटे। कल फिर नया दिन होगा, नये अंक, नयी आपूर्ति। पर आज की गणना पूरी थी। वह नीचे उतरा, महल के लंबे गलियारों से गुज़रता हुआ, जहाँ मशालों की लौ ने पत्थर की दीवारों पर नाचती हुई छायाएँ बनाई थीं। और उसके कदमों की आवाज़ गूँजती रही, उस विशाल, जीवित राज्य की लय में, जो परमेश्वर की दृष्टि में साँस ले रहा था।




