पवित्र बाइबल

वाचा का नवनिर्माण

यरूशलेम की दीवारों की मरम्मत का काम पूरा हो चुका था, पर एक और काम बाकी था। वह दीवार से भी ऊँची, और पत्थर से भी मजबूत वाचा बाँधने का काम था। नहेम्याह उस सुबह बहुत जल्दी उठ गया। उसके कमरे की खिड़की से नगर का विस्तार दिख रहा था। हवा में ठंडक थी, और पूर्व दिशा में आकाश धीरे-धीरे गहरे नीले रंग से फीके पीले में बदल रहा था। उसने एक लम्बी सांस ली। आज का दिन महत्वपूर्ण था।

लोग सुबह-सुबह ही चौड़े फाटक के सामने वाले बड़े मैदान में इकट्ठा होने लगे थे। यह कोई उत्सव नहीं था, न ही कोई साधारण सभा। एक गहरी गम्भीरता हवा में तैर रही थी। पुरुष अपने परिवारों के साथ आए थे – उनकी पत्नियाँ, बेटे और बेटियाँ जो समझ सकती थीं। बच्चों का शोर भी आज कुछ मंद पड़ा हुआ था, जैसे माता-पिताओं ने उन्हें पहले ही समझा दिया हो कि आज क्या होने वाला है।

एज्रा को वहाँ लाया गया, उस बड़ी, भारी पुस्तक के साथ जिसमें मूसा की व्यवस्था लिखी थी। चर्मपत्र के पन्नों की सरसराहट भी सुनाई देती थी, जब उन्हें सावधानी से खोला गया। एज्रा ने खड़े होकर पढ़ना शुरू किया। उसकी आवाज पहले तो धीमी थी, फिर ऊँची और स्पष्ट होती गई। वह व्यवस्था के वे हिस्से पढ़ रहा था जो उनके अपने इतिहास से जुड़े थे – विदेशियों के साथ व्यवहार के नियम, सब्त के दिन की पवित्रता, भूमि के सातवें साल में उसके विश्राम के बारे में, और मन्दिर के लिए आवश्यक भेंटों के विधान।

हर वाक्य के साथ लोगों के चेहरों पर एक अजीब सी चमक आ रही थी। यह डर नहीं था, बल्कि एक प्रकार का स्मरण था। वे भूल चुके थे। बर्बादी के वर्षों, बन्धुआई के दिनों में, इन आदेशों का बड़ा भाग उनकी स्मृति से धूमिल हो गया था, या फिर उन्होंने जानबूझकर उनकी उपेक्षा की थी। एक बुजुर्ग, जिसकी दाढ़ी पूरी तरह सफेद हो चुकी थी, अपनी आँखें बंद किए सुन रहा था। उसकी पलकें कभी-कभी फड़कती थीं, जैसे एज्रा की आवाज उसे दशकों पीछे, उसके बचपन में ले जा रही हो, जब उसका अपना पिता उसे ये ही बातें सुनाया करता था।

फिर नहेम्याह ने आगे बढ़कर बोलना शुरू किया। उसकी आवाज में वह दृढ़ता थी जिसने दीवार खड़ी की थी, पर आज एक नया स्वर भी था – एक प्रकार की विनम्र याचना। “सुनो,” उसने कहा, “हमारे पूर्वजों ने इन वचनों को तोड़ा। उनकी अवज्ञा के कारण हम सब तितर-बितर हुए, हमारी भूमि रोती रही। पर अब हम यहाँ हैं। परमेश्वर ने हम पर दया की है। उसने हमें वापस लाया है। क्या अब भी हम उसी राह पर चलेंगे?”

लोग चुप थे। पर चुप्पी सहमति की थी, उदासीनता की नहीं। फिर एक स्वर उठा, फिर दूसरा, और देखते-ही-देखते पूरी भीड़ एक साथ बोल उठी – हाँ, हम वाचा बाँधते हैं। हम अपने परमेश्वर यहोवा की व्यवस्था का पालन करेंगे। उसकी आज्ञाओं, नियमों, और विधियों को मानेंगे।

तब कुछ नेता आगे आए। पहले नहेम्याह हस्ताक्षर करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस बड़े दस्तावेज़ पर, जो तैयार किया गया था, अपना नाम लिखा। उसकी कलम के निशान गहरे और स्पष्ट थे। फिर महायाजक एल्याशीब के पुत्रों ने हस्ताक्षर किए। ये नाम केवल शब्द नहीं थे; ये प्रतिबद्धताएँ थीं। हर नाम के साथ, भीड़ में एक सिहरन दौड़ जाती थी। यह कोई साधारण समझौता पत्र नहीं था जिस पर ये लोग हस्ताक्षर कर रहे थे। यह उनके जीवन, उनकी आजीविका, उनकी दैनिक आदतों को बदल देने वाला एक प्रण था।

फिर लेवीय आए। उनके चेहरों पर एक विशेष गुरुत्व था, क्योंकि मन्दिर की सेवा और व्यवस्था की शिक्षा का भार उन पर था। फिर सिरों, अर्थात समुदाय के प्रधानों के नाम आए। यहूदा और बिन्यामीन के कुलों के मुखिया, फिर याजक, फिर लेवीय, फिर द्वारपाल, गायक, नितिनीम… एक लम्बी सूची थी। हर समूह, हर वर्ग के प्रतिनिधि आगे बढ़े। यह केवल नेताओं की वाचा नहीं थी। यह पूरे समाज, हर परिवार, हर व्यक्ति की सामूहिक प्रतिज्ञा थी।

और फिर उन्होंने उन विशेष बातों को दोहराया जिन्हें वे पूरा करने का वचन दे रहे थे। यह सिर्फ “अच्छे बनेंगे” कहने जैसा नहीं था। यह ठोस था, मूर्त था। “हम अपनी बेटियों को इस देश के लोगों को नहीं देंगे, और न अपने बेटों के लिए उनकी बेटियाँ लेंगे।” एक युवक, जो किनारे खड़ा था, ने अनजाने में एक गहरी सांस ली। उसकी नज़रें एक ओर मुड़ गईं। शायद उसे कोई सुंदरी पसन्द थी, जो अशदोद या मोआब के किसी परिवार से थी। पर अब यह संभव नहीं था। उसने अपने सिर को हल्के से हिलाया, जैसे किसी विचार को दूर कर रहा हो, और दृढ़ता से आगे देखने लगा।

“और जब इस देश के लोग सब्त के दिन सामान लेकर बेचने आएँगे, तो हम उनसे कुछ नहीं खरीदेंगे।” यह बात सुनकर कई व्यापारियों के चेहरे गंभीर हो गए। सब्त का दिन व्यापार के लिए अच्छा दिन होता था। पर उन्होंने हामी भरी। उनकी आर्थिक हानि होगी, यह सच था। पर उनकी आत्मा की हानि उससे कहीं बड़ी थी, यह वे अब समझते थे।

सबसे महत्वपूर्ण वचन था – मन्दिर का वार्षिक भार उठाने का। “हम हर साल अपने परमेश्वर के भवन की सेवा के लिए एक-एक तीसरे शेकेल देंगे।” लोग अपने मन में गणना करने लगे। एक परिवार के लिए यह कितना होगा? फसल अच्छी नहीं हुई तो? पर कोई विरोध की आवाज नहीं उठी। मन्दिर, परमेश्वर का निवास स्थान, उनकी एकता और पहचान का केंद्र था। उसे जीवित रहना था।

लकड़ी चढ़ाने के बारे में वचन दिया गया – कि लोग निश्चित समय पर मन्दिर की वेदी के लिए लकड़ी लाएँगे। अन्न, नए दाखमधु और तेल के अंश भेंट करने का वादा किया गया। दशमांश को पूरी ईमानदारी से लेवीयों को देने की प्रतिज्ञा की गई, ताकि वे अपनी सेवा में लगे रह सकें। इन सबके बिना, मन्दिर केवल पत्थरों का ढाँचा बनकर रह जाता। इन भेंटों से ही वह जीवित रहता था, साँस लेता था।

दोपहर ढलने लगी थी। सूरज पश्चिम की दीवारों पर सुनहरी रोशनी फैला रहा था। सभा समाप्त हो चुकी थी। लोग चले जा रहे थे, पर उनके कदमों में एक नई दृढ़ता थी। चेहरों पर थकान थी, पर संतोष भी था। एक स्त्री अपने छोटे बेटे का हाथ पकड़े हुए थी। बच्चा बोला, “माँ, हम अब सब्त के दिन बाज़ार नहीं जाएँगे क्या?” स्त्री ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, बेटा। उस दिन हम विश्राम करेंगे। हम प्रार्थना करेंगे। तुझे कहानियाँ सुनाऊँगी – हमारे पूर्वजों की कहानियाँ।” बच्चे की आँखों में चमक आ गई।

नहेम्याह अब भी उसी मैदान में खड़ा था। लोग जा चुके थे। हवा में धूल के कण सूर्य की किरणों में नाच रहे थे। उसने उस मुहर लगे दस्तावेज़ की ओर देखा, जिस पर इतने सारे नाम थे। यह दीवार से भी बड़ी उपलब्धि थी। दीवारें शत्रु को रोक सकती थीं, पर केवल यह वाचा ही उनके हृदयों को भीतर से, विस्मृति और अवज्ञा के शत्रु से बचा सकती थी। उसने आँखें बंद कर लीं। एक लम्बी, शान्त प्रार्थना उसके होंठों पर थी। काम अभी ख़त्म नहीं हुआ था। बस एक नई शुरुआत हुई थी।

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