येरूशलेम के महल की छाया में दाऊद बैठा था, पर उसका मन अशांत था। राज्य स्थिर था, शत्रु परास्त हो चुके थे, पर एक विचित्र खालीपन, एक ऐसी जड़ता उसे घेरे हुए थी जिसका नाम वह स्वीकार नहीं कर पा रहा था। वह अपने सिंहासन के कमरे से बाहर आया और महल की ऊँची दीवारों के किनारे टहलने लगा। नीचे, नगर जीवन से भरपूर था—बाजारों का शोर, बच्चों की किलकारियाँ, यहोवा के मन्दिर के लिए तैयार की जा रही सामग्री का ढेर। पर उसकी आँखें इन सबसे आगे, दूर, उन सीमाओं पर टिकी थीं जहाँ तक उसका राज्य फैला हुआ था।
“मेरी शक्ति का आधार क्या है?” यह प्रश्न उसके मन में किसी कुंडली की तरह लिपट गया। सेना? धन? प्रजा का प्रेम? एक ऐसी इच्छा, गुप्त और विषैली, उसके हृदय में जगह बनाने लगी—सब कुछ गिन लेने की, अपनी इस विशाल सम्पदा को एक संख्या में बाँध देने की। वह जानता था कि यहोवा ने उसकी गिनती न करने की चेतावनी दी थी, पर आज उसका हृदय गर्व के एक काले बादल से ढँक गया था। उसने योआब को, अपने सेनापति को, बुलवाया।
योआब आया, उसके चेहरे पर अनुभव की झुर्रियाँ थीं और आँखों में एक तीक्ष्ण चमक। दाऊद ने अपना आदेश दिया: “इस्राएल के दान से लेकर बेर्शेबा तक, सब लोगों की गिनती करो। हर एक पुरुष, हर एक योद्धा। मैं जानना चाहता हूँ।”
योआब स्तब्ध रह गया। उसने हाथ जोड़कर विनती की, “मेरे प्रभु, यहोवा आपके लोगों को सौ गुना बढ़ाए। पर क्या मेरा स्वामी यह चाहता है? क्या यह उनके पाप के कारण नहीं होगा? हम यहोवा की सेना हैं, संख्याएँ उसकी महिमा को कम करती हैं।” उसकी आवाज़ में एक सच्चे भक्त और कर्मचारी का दर्द था।
पर दाऊद का निश्चय पत्थर की तरह कठोर था। उसकी आँखों में वह चमक गायब थी जो एक बार यहोवा पर निर्भर रहने वाले चरवाहे में होती थी। “मेरा आदेश पालन करो, योआब।”
योआब ने आदेश माना, पर उनका मन विद्रोह से भरा था। वह और उसके सेनापति महीनों तक भूमि में घूमते रहे। वे दूर-दूर के गाँवों में गए, पहाड़ी इलाकों में चढ़े, जंगलों से होकर निकले। वे लोगों को गिनते थे, पर उनकी आँखें जमीन की ओर झुकी रहतीं, मानो यह कार्य कोई श्राप हो। उन्होंने लेवीयों और बिन्यामीन के गोत्र को गिना ही नहीं, राजा के आदेश की अवहेलना करते हुए—क्योंकि योआब को यह कार्य घृणित लगा।
आखिरकार, वे लौट आए। योआब ने वह कठोर संख्या राजा के सामने रखी: ग्यारह लाख से अधिक तलवार चलाने योग्य पुरुष। पर आँकड़ा कागज पर लिखा होने के बावजूद, वह हवा में एक जहरीली गंध की तरह फैल गया। दाऊद ने उसे देखा, और तुरंत उसका हृदय टूट गया। वह गिनती पूरी होने के पल ही समझ गया था कि उसने क्या किया है। उसने अपना विश्वास संख्याओं पर रखा था, अपने सामर्थ्य पर, यहोवा पर नहीं। एक भारी पश्चाताप, एक गहरा भय, उसकी आत्मा में घर कर गया।
और यहोवा का शब्द गाद दृष्टि के माध्यम से आया। गाद, दाऊद के पास आया, उसके चेहरे पर दैवीय संदेश की गम्भीरता थी। “यहोवा यह कहता है,” गाद ने कहा, उसकी आवाज़ में कोमलता और दुख का अद्भुत मिश्रण था, “मैं तुझे तीन में से एक बात चुनने देता हूँ। सात वर्ष का अकाल, तीन महीने तक तेरे शत्रुओं के आगे भागना, या तीन दिन तक यहोवा का महामारी देश में फैलना। सोच ले, और मुझे उत्तर दे।”
दाऊद ने सामने खुले आकाश की ओर देखा। उसका चेहरा राख जैसा पीला हो गया था। “मैं बड़ी विपत्ति में हूँ,” उसने कहा, आवाज़ लगभग फुसफसाहट थी। “पर मुझे मनुष्यों के हाथ में नहीं पड़ना। यहोवा के हाथ में पड़ना ही बेहतर है, क्योंकि उसकी करुणा बहुत है।”
इसलिए, यहोवा ने इस्राएल पर महामारी भेज दी। वह तीन दिन का समय इतिहास के सबसे भयानक दिनों में लिखा गया। देवदूत का हाथ यरूशलेम तक फैल गया, और सत्तर हज़ार पुरुष गिर गए—युवा, बूढ़े, सेनानी, साधारण नागरिक। हर घर में विलाप की आवाज़ गूँजने लगी। दाऊद ने महल से देखा—शहर के ऊपर एक अदृश्य आकृति, एक उज्ज्वल तलवार हाथ में लिए हुए, ओर्नान के खलिहान के ऊपर ठहरी हुई। वह स्थान, शहर के बाहर, एक ऊँची पहाड़ी पर था।
दाऊद ने टाट ओढ़ लिया, अपने सिर पर राख डाली, और यहोवा के सामने गिर पड़ा। “पाप तो मैंने किया है, मैंने बड़ा अपराध किया है!” उसकी आवाज़ विलाप में डूबी हुई थी। “पर इन भेड़ों ने क्या किया है? हे मेरे परमेश्वर, कृपया तेरा हाथ मुझ पर और मेरे पिता के घराने पर हो, तेरी प्रजा पर नहीं।”
तब यहोवा ने गाद को आदेश दिया कि दाऊद को ओर्नान के खलिहान पर जाकर एक वेदी बनाने का निर्देश दे। दाऊद तुरंत चल पड़ा, उसके पीछे बूढ़े सलाहकारों का एक समूह था, सभी के चेहरे पर मौत की छाया थी। ओर्नान, एक यबूसी, अपने चारों पुत्रों के साथ गेहूँ मसल रहा था जब उसने राजा को आते देखा। उसने देवदूत को भी देखा था, और भय से वह और उसके पुत्र छिप गए थे। पर जब उसने दाऊद को आते देखा, तो वह बाहर आया और राजा के सामने झुककर प्रणाम किया।
दाऊद ने कहा, “यह स्थान मुझे दे दे, ताकि मैं यहोओवा के लिए एक वेदी बना सकूँ। पूर्ण मूल्य देकर इसे लूँगा, ताकि महामारी प्रजा से टल जाए।”
ओर्नान ने उत्तर दिया, “मेरे स्वामी, इसे ले लो और जो अच्छा लगे वह करो। देखो, मैं बलिदान के लिए बैल और लकड़ी भी देता हूँ। सब कुछ तुम्हारा है।”
पर दाऊद ने दृढ़ता से कहा, “नहीं। मैं तेरे से बिना मूल्य लिए नहीं लूँगा। यहोवा को जो भेंट चढ़ानी है, उसकी कीमत अदा करूँगा।” और उसने ओर्नान को उस भूमि के लिए सोने के सिक्कों का भारी भुगतान किया।
वहाँ, उसी पहाड़ी पर, दाऊद ने एक वेदी बनाई। उसने बैलों और मेढ़ों की बलि दी। आग स्वर्ग से गिरी और बलि को भस्म कर दिया, और यहोवा के देवदूत ने अपनी तलवार म्यान में कर ली। महामारी रुक गई। उस स्थान पर हवा में जलने वाली लकड़ी और पवित्र धूप की सुगंध फैल गई, और एक गहरी शांति उतर आई।
दाऊद वहीं झुका रहा, आँसू उसकी दाढ़ी को भिगो रहे थे। उसने कहा, “यही यहोवा के घर का स्थान होगा, और यही इस्राएल के होमबलि की वेदी।” उस पल कोई नहीं जानता था कि वही पहाड़ी, मोरिय्याह पर्वत, आगे चलकर सुलैमान के भव्य मन्दिर की नींव बनेगी। पर उस दिन, वहाँ सिर्फ एक टूटा हुआ राजा, एक क्षमा किया हुआ पाप, और एक भविष्य की आशा की पहली नींव थी—यह सब उस दयालु हाथ की महिमा में, जिसमें गिरने का साहस दाऊद ने दिखाया था।




