वह दिन भी क्या दिन था। सुबह से ही आसमान में सघन, स्लेटी बादल छाए थे, मानो स्वर्ग का कोई बोझ धरती पर उतरने को हो। हवा में नमी थी, और उस नमी में मेरे घावों की पीड़ा और बढ़ गई थी। कोठरी की खिड़की से टूटकर आती धुंधली रोशनी में, मैं अपने हाथों को देख रहा था – पहले जो मजबूत और कर्मठ थे, अब केवल हड्डी और पतली त्वचा के पुतले थे। बीमारी ने मुझे धीरे-धीरे, बिना रुके, खोखला कर दिया था।
डाक्टर तो बहुत आए, जड़ी-बूटियाँ, मलहम, मंत्र-तंत्र… सब व्यर्थ। पर शायद बीमारी से भी अधिक कष्टदायी थी वह एकांत। लोग आते, सिर हिलाते, और चले जाते। उनकी आँखों में दया नहीं, एक अजीब सी उदासीनता होती थी, मानो मैं कोई अभागा प्राणी हूँ जिसने ईश्वर का कोष्ठक भर दिया हो। फुसफुसाहटें दीवारों के पार से भी सुनाई देतीं – “क्या पाप किया होगा इसने, जो प्रभु ने इसे ऐसी दशा में डाल दिया?”
पर एक थे, जो प्रतिदिन आते। नाथन। बिना किसी शोर-शराबे के, वह कोने में बैठ जाता, कभी पानी पिलाता, कभी सिरहाने से तकिया ठीक कर देता। उसकी उपस्थिति में ही एक शांति रहती थी। एक दिन, जब दर्द असह्य हो गया, मैंने कराहते हुए कहा, “नाथन, मैं थक गया हूँ। मेरे शत्रु तो प्रसन्न हैं, यह सोचकर कि मेरा नाम नष्ट हो जाएगा। और जो मित्र थे… वे भी दूर खड़े हैं।”
नाथन ने कोई उत्तर नहीं दिया। बस हलके से मेरे माथे पर हाथ फेरा, और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर बारिश शुरू हो गई थी, बूंदों की ठक-ठक की आवाज सुनाई दे रही थी।
फिर वह दिन आया। मेरी हालत और बिगड़ गई। सांस लेना दूभर हो रहा था। घर में चिकित्सक के अलावा कोई नहीं था। तभी द्वार खुला, और मेरे एक पुराने सहयोगी, शेमा का पुत्र, योआब भीतर आया। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी रेखाएं थीं। उसने डाक्टर से कुछ कहा, फिर मेरे पास आकर बोला, “चिंता मत करो। प्रभु तुम्हारा सहारा है।”
पर उसकी आँखें कुछ और कह रही थीं। वह जल्दबाजी में था। कुछ ही क्षणों में वह चला गया। शाम को, जब नाथन आया, तो उसका चेहरा फीका था। वह बहुत देर तक चुप रहा, फिर धीरे से बोला, “योआब नगर में फैला रहा है कि तुम्हारी बीमारी ईश्वर का प्रकोप है। वह तुम्हारे व्यापार के सभाध्यक्ष पद के लिए स्वयं को प्रस्तावित कर रहा है। उसने तुम्हारी कमजोरी को अपना मौका बनाया है।”
उन शब्दों ने मेरी आत्मा को भी उसी तरह जकड़ लिया, जैसे बीमारी ने शरीर को। विश्वासघात। वह शब्द मेरे मन में गूंजता रहा। भजनकार के शब्द स्मृति में उभरे – “जो मेरा बैरी है, वह मेरे विषय में बड़ी बातें कहता है… वह मन में बुराई रखता है, बाहर निकलते ही झूठ बोलता है।”
उस रात नींद नहीं आई। ज्वर और मन की पीड़ा में मैं तड़पता रहा। तभी, अचानक, एक स्मृति कौंधी – बचपन की। माँ मुझे गोद में लेकर बैठी थीं, और धीमे स्वर में गा रही थीं, “धन्य है वह, जो दीन की सुधि लेता है; संकट के दिन में यहोवा उसको छुड़ाएगा।”
वह धुन, वह आश्वासन… जैसे कोई मरहम मेरे तप्त मस्तिष्क पर लगा हो। मैंने अपनी आँखें बंद कीं। प्रार्थना के शब्द नहीं थे, केवल एक गहरी, दर्द से भरी चुप्पी थी, जिसे मैंने परमेश्वर की ओर फेंक दिया। यह आत्मसमर्पण था, शिकायत नहीं।
कुछ घंटे बाद, जब पहली किरण ने खिड़की की जाली को छुआ, मैंने अनुभव किया कि ज्वर कुछ कम हुआ है। सांस लेने में थोड़ी सहजता आई। नाथन ने सुबह आकर जब मेरा माथा छुआ, तो उसकी आँखों में आश्चर्य चमका। “ज्वर टूटा है,” उसने फुसफुसाया।
चंगाई रातोंरात नहीं आई। धीरे-धीरे, दिन प्रतिदिन, जैसे कोई कुशल माली पौधे को सींचता है, वैसे ही मेरा बल लौटा। पर शारीरिक स्वास्थ्य से भी बढ़कर एक आंतरिक स्थिरता आई। योआब के विश्वासघात का दंश अब भी था, पर वह मुझे निराश नहीं करता था। मैं समझ गया था कि प्रभु ने मुझे सँभाल लिया है, मेरी सहायता की है, और अपने साम्हने मुझे कायम रखा है।
जिस दिन मैं पहली बार अपने आँगन में खड़ा हुआ, नीम के पेड़ की छाया में, सूरज की गर्मी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी, तो मैंने कुछ नहीं कहा। केवल देखा – आकाश की नीली, बादलों की सफेदी, पत्तों की हरियाली। जीवन सरल और सुंदर लग रहा था।
नाथन मेरे पास आया। मैंने उसकी ओर देखा, और मेरी आँखों में आँसू थे। “तूने मेरे लिए किया,” मैंने कहा। उसने केवल मुस्कुराया।
उस शाम, मैंने अपनी तबलेत पर बैठकर, एक कागज पर लिखा। भाव उमड़ रहे थे, शब्द भजन बन रहे थे – “हे यहोवा, मुझ पर अनुग्रह कर, और मुझे चंगा कर… मैं जानता हूँ कि तू मुझसे प्रसन्न है, क्योंकि मेरा शत्रु मुझ पर जय नहीं पाया…”
यह केवल एक बीमारी से उबरने की कहानी नहीं थी। यह एक गहरे अंधकार में, उस एक हाथ को पहचानने की कथा थी, जो सहारा देता है, चाहे सभी हाथ छोड़ दें। और यह जान लेने का विश्वास था कि अनंतकाल तक, परमेश्वर के साम्हने, कृपा से, मैं बना रहूँगा। बस, इतना ही। और यही बहुत था।




