उस गाँव में जहाँ धूप सोने जैसी पिघलती थी और हवा में मिट्टी की खुशबू रहती थी, एक बूढ़ा किसान रहता था, नाम था विश्वनाथ। उसके पास ज़मीन तो बहुत थी, पर उसकी असली दौलत उसकी इज्ज़त थी। लोग कहते, “विश्वनाथ दादा की बात अगर हो गई, तो फिर वही होगा।” एक दिन, उसका छोटा भाई मोहन, जो शहर में रहता था, अपने बेटे राहुल को लेकर आया। राहुल पढ़ा-लिखा था, नए विचारों से भरा हुआ। उसने देखा कि चाचा बिना किसी मशीन के, हाथ से हल चला रहे हैं। उसने हँसकर कहा, “चाचा, यह तो पुराने ज़माने का तरीका है। कर्ज़ लेकर ट्रैक्टर ले लो, काम आसान हो जाएगा।”
विश्वनाथ ने अपने हाथ का हल रोका, माथे का पसीना पोंछा, और धीरे से बोले, “बेटा, बिना सोचे-समझे कर्ज़ लेना, बिना देखे कुएँ में कूदने जैसा है।” राहुल ने ध्यान नहीं दिया। उसने शहर जाकर एक साहूकार से बड़ा कर्ज़ ले लिया, नया ट्रैक्टर मँगवाया। पहले साल तो फसल अच्छी हुई, लेकिन दूसरे साल बारिश ने साथ नहीं दिया। कर्ज़ का बोझ बढ़ता गया। एक शाम, वह साहूकार के यहाँ गया, गिड़गिड़ाया, “थोड़ा और समय दे दो।” साहूकार ने ठंडी आँखों से देखा और दरवाज़ा बंद कर दिया। राहुल उदास होकर लौटा। विश्वनाथ ने उसे आते देखा, उसकी आँखों में निराशा पढ़ ली। वह चुपचाप अपनी कोठरी में गया, एक पुरानी पीतल की पेटी निकाली, जिसमें उसने सालों की कमाई छिपा रखी थी। उसने राहुल का कर्ज़ चुका दिया, बिना किसी से कहे।
उधर गाँव के दूसरे छोर पर रमेश नाम का एक आदमी रहता था। वह हमेशा दूसरों की चुगली करता, झूठे वादे करता। उसकी ज़बान मीठी थी, पर दिल में कँटीले बबूल। एक बार उसने गाँव वालों से पैसे इकट्ठे किए, कहा कि स्कूल बनवाएगा। पैसे लिए और शहर चला गया। महीनों बाद लौटा तो खाली हाथ। लोग गुस्से में थे। विश्वनाथ के पास पहुँचे। वह बोले, “एक झूठा सचाई से दूर भागता है, पर उसकी छाया उसका पीछा नहीं छोड़ती। रमेश अपने झूठ में खुद उलझ गया है। तुम्हारा काम उसे माफ़ करना नहीं, उससे दूर रहना है।”
ठीक उसी समय, रमेश के घर में हलचल मची थी। उसका बेटा तेज़ बुखार से तप रहा था। डॉक्टर दूर था, रात अँधेरी। रमेश की पत्नी रोते हुए विश्वनाथ के दरवाज़े पर आई। विश्वनाथ बिना एक शब्द कहे अपनी बैलगाड़ी जोती और बच्चे को लेकर तीन कोस दूर शहर के हस्पताल पहुँचा। बच्चा बच गया। अगली सुबह, रमेश, जिसकी आँखों में अब अहंकार नहीं, शर्म थी, विश्वनाथ के चरण छूने आया। विश्वनाथ ने उसे उठाया और बस इतना कहा, “दया दिखाना गरीब पर, उधार देना प्रभु को।”
समय बीतता गया। विश्वनाथ बूढ़ा हो गया। एक बार वह गंभीर रूप से बीमार पड़ा। डाक्टरों ने हार मान ली। पूरा गाँव उसके दरवाज़े पर जमा था। राहुल, जो अब परिपक्व हो चुका था, रो रहा था। तभी एक अनजान साधू वहाँ से गुज़रा। उसने विश्वनाथ के माथे पर हाथ रखा, कुछ मंत्र पढ़े। कोई चमत्कार नहीं हुआ। विश्वनाथ की साँसें तो चली गईं। लेकिन उसके चेहरे पर शांति थी, जैसे कोई लंबा सफ़र पूरा करके विश्राम कर रहा हो।
अंतिम संस्कार के बाद, गाँव के लोग इकट्ठा हुए। राहुल ने विश्वनाथ की वह पुरानी पीतल की पेटी खोली, जिसमें से उसने कर्ज़ चुकाया था। अंदर पैसे नहीं थे, बस एक पुरानी, घिसी हुई बाइबल थी, और एक काग़ज़। काग़ज़ पर विश्वनाथ की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था: “बेटा, धन से मनुष्यों के मित्र बहुत होते हैं, पर दुःख में सब छोड़ जाते हैं। सच्चा मित्र वही है जो हमेशा बना रहे, और भाई दुःख के समय के लिए पैदा होता है। मैंने तुम्हारा कर्ज़ चुकाया था, ताकि तुम सीख सको। अब यह बाइबल तुम्हारी है। इसमें नीतिवचन 19 लिखा है, इसे जीवन में उतारना।”
राहुल ने आँसू पोंछे और उस बाइबल को खोला। उसे वह श्लोक याद आ गया जिसे विश्वनाथ अक्सर गुनगुनाया करते थे: “प्रभु की इच्छा के आगे मनुष्य की सब योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं, पर वही स्थिर रहता है।” उस दिन राहुल ने समझा कि चाचा की सादगी के पीछे कितनी गहरी समझ थी। और गाँव में विश्वनाथ की कहानियाँ अब भी सुनाई जाती हैं, खेतों की मेड़ों पर, पीपल के पेड़ के नीचे, एक ऐसे आदमी की जिसने शब्दों से नहीं, अपने जीवन से यह सिखाया कि ईमानदारी की फसल कभी नहीं सूखती, और दया का बीज अंधेरे में भी उग आता है।




