पवित्र बाइबल

सड़ते साम्राज्य का अंत: नीनवे

(एक लंबी, विस्तृत कथा)

वह शहर जो कभी अजेय माना जाता था, अब अपनी ही बदबू में सड़ रहा था। नीनवे की दीवारें, जो मोटी और ऊंची थीं मानो स्वयं पर्वतों से ईर्ष्या करती हों, अब घेराबंदी के धुएं से काली पड़ चुकी थीं। उन पर चढ़े सैनिकों के चेहरे पर अब वह अकड़ नहीं थी जो दशकों तक पूरे एशिया को दहलाती रही। अब सिर्फ थकान थी, और एक गहरी, समझ से परे खामोशी। आसमान में काले पक्षी चक्कर काट रहे थे, बिना किसी उतावली के, मानो उन्हें पता हो कि समय उनके साथ है।

शहर के भीतर, राजमहल के सबसे ऊपरी कक्ष में राजा ने खिड़की से बाहर झांका। नदी की ओर, जो कभी नगर की जीवनरेखा हुआ करती थी, अब एक अजीब सी निस्तब्धता छाई थी। उसे याद आया कि कैसे उसके पूर्वजों ने दूर-दूर से लूट का माल लाकर इस नगर को सोने और हाथीदांत से भर दिया था। बाजारों में दुनिया भर के व्यापारी, दास और वेश्याएं, कीमती मसाले और बारीक कपड़े—सब कुछ यहां उपलब्ध था। नीनवे एक ऐसा राक्षस था जिसकी भूख कभी नहीं मिटती थी। और अब? अब उस राक्षस के पेट में सड़न भर चुकी थी।

एक सिपाही, जिसके चेहरे पर धूल और पसीना मिलकर कीचड़ सा बन गया था, दौड़ता हुआ आया। “महाराज! उत्तर की ओर से दुश्मन की सेना ने घेरा और कस लिया है। हमारे तीरंदाजों के शस्त्र भंडार खाली हो रहे हैं।”

राजा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी नजर शहर के उस हिस्से पर टिकी थी जहां से एक तीखी, मीठी सी दुर्गंध उठ रही थी। वह गंध उसने पहले कभी नहीं सूंघी थी, पर अब वह हवा में इस तरह रच-बस गई थी मानो शहर की हवा ही सड़ गई हो। किसी ने बताया था कि यह गंध पड़ोसी देशों से लूटकर लाए गए सोने-चांदी के भंडारों में लिपटे सड़े हुए अंजीरों की है, जो अब कीड़ों से भर चुके थे। लूट का माल, जो कभी गर्व का प्रतीक था, अब सड़कर एक अभिशाप बन गया था।

तभी उसे एक पुरानी बात याद आई। कई वर्ष पहले, एक अजीबोगरीब व्यक्ति, शायद यहूदा के इलाके से आया हुआ, शहर में आकर चिल्लाता रहा था। उसके शब्द तीखे और बेढब थे: “हाय खूनी शहर! तू झूठ और लूट से भर गया है, और लूट का धन कभी खाली नहीं होता।” लोगों ने उस पर हंसा था, उसे पागल कहकर भगा दिया था। उसने कुछ और भी कहा था—कि शहर के फाटक शत्रुओं के लिए खुल जाएंगे, कि यहां की वेश्याओं का जादू, जिस पर नीनवे को इतना घमंड था, उसे बचा नहीं पाएगा। राजा ने तब उसे अनदेखा कर दिया था। पर आज, जब दुश्मन के घोड़ों की टापों की आवाज दीवारों के पार से सुनाई दे रही थी, वे शब्द उसके कानों में साफ गूंज रहे थे।

शाम ढलते-ढलते स्थिति और भी भयावह हो गई। शहर के भीतर अफवाहों का जहर फैल चुका था। कहा जा रहा था कि दुश्मन की सेना में लोहे के रथ हैं जो आग उगलते हैं, कि उनके योद्धा लोहे के वस्त्र पहने हैं जो तलवारों को चकनाचूर कर देते हैं। डर के मारे, कई सैनिकों ने अपनी वर्दियां उतारकर नागरिकों के कपड़े पहन लिए थे, भूलकर कि जब शहर लूटा जाएगा तो फर्क क्या पड़ेगा।

रात के अंधेरे में, राजा ने अपने मंत्रियों को बुलाया। वे सभी, जो कभी मोटे और तगड़े हुआ करते थे, अब मुरझाए हुए, डरे हुए से लग रहे थे। “हमारे गठबंधन कहां हैं?” राजा की आवाज खिंची हुई थी। “कहां हैं वे सब राज्य जिन्हें हमने धन और संरक्षण दिया?”

एक बूढ़े मंत्री ने, जिसकी आंखें धुंधली पड़ चुकी थीं, सिर झुकाकर जवाब दिया: “महाराज, वे सब… दूर हैं। जैसे टिड्डियां झाड़ियों में छिप जाती हैं जब ठंड आती है, वैसे ही वे सब अपने-अपने घरों में सिमट गए हैं। कोई भी हमारी सहायता के लिए हाथ बढ़ाने नहीं आएगा।”

तभी दूर से एक भयानक धमाके की आवाज आई, और महल की दीवारें हिल उठीं। घेराबंदी के हथियार शहर की अजेय मानी जाने वाली दीवारों पर प्रहार कर रहे थे। जो दीवारें कभी लोगों को सुरक्षा का भाव देती थीं, अब वे ही एक विशाल कब्रगाह की दीवारें लग रही थीं।

सुबह होते-होते, वह हो गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उत्तर की ओर का फाटक, जो लोहे और कांसे से मजबूत किया गया था, अंदर से खुल गया। कहते हैं एक डरपोक सिपाही ने, जिस पर कभी भरोसा किया गया था, रात की अंधेरी में दुश्मन से सोने के सिक्कों का लालच खाकर फाटक का बंद खोल दिया। और फिर… फिर जो हुआ, उसे शब्दों में बांधना मुश्किल है।

दुश्मन की सेना एक उफनती हुई नदी की तरह शहर में घुस आई। कोई संगठित प्रतिरोध नहीं हुआ। सैनिक भाग खड़े हुए। सड़कों पर खून की नदियां बह निकलीं। वे महल, जो कभी हंसी और गानों से गूंजते थे, अब चीखों और तलवारों की खनखनाहट से भर गए। और वे वेश्याएं, जिनकी सुंदरता के किस्से दूर-दूर तक गाए जाते थे, अब अपनी छतों से चीखती हुई कूद पड़ीं। उनका जादू, उनकी चालें, कुछ भी काम नहीं आया। वे सब, जिन पर नगर को इतना गर्व था, मिट्टी में मिल गए।

राजा, अपने सिंहासन कक्ष में बैठा, अंतिम घटनाओं को होते देख रहा था। उसने देखा कि कैसे आक्रमणकारी उसके बेशकीमती खजाने को, उन सोने-चांदी के बर्तनों को, जिन्हें जमा करने में पीढ़ियां लग गई थीं, झाड़ू से बुहारने की तरह उड़ा ले जा रहे थे। सब कुछ, जो कभी शक्ति और समृद्धि का प्रतीक था, अब खाली, निरर्थक लग रहा था। उसने अपने चारों ओर देखा—महल के स्तंभों पर उकेरी गई युद्ध की तस्वीरें, जीत के दृश्य… सब मिथ्या साबित हो रहे थे।

उसकी याद में वह भविष्यवक्ता का चेहरा कौंध गया, और वे शब्द एक बार फिर साफ-साफ सुनाई दिए: “तू जितना बलवान होगा, शत्रु भी उतने ही बलवान तेरे विरुद्ध खड़े होंगे। तेरे किले अंजीर के पेड़ के समान होंगे, जिसमें पके हुए पहले फल लगते हैं—यदि उसे हिलाया जाए तो फल भोजन करने वाले के मुंह में गिर पड़ते हैं।”

और सचमुच, ऐसा ही हुआ था। नीनवे, जो इतना बलवान और पुष्ट था, उसके विरुद्ध पूरी शक्ति इकट्ठा हो गई थी। और उसकी संपदा, उसकी शक्ति, ऐसे ही गिर पड़ी थी जैसे पके अंजीर हिलाए जाने पर गिर जाते हैं। कोई संघर्ष नहीं, कोई युद्ध नहीं—बस एक सड़े हुए फल का भूमि पर गिरना।

जब दुश्मन के सैनिक सिंहासन कक्ष में घुसे, तो उन्होंने राजा को वहीं बैठे पाया, खाली नजरों से आगे देखते हुए। उसकी आंखों में न तो भय था, न क्रोध। सिर्फ एक गहरी, थकी हुई समझ थी। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसकी तलवार, जो कभी दस देशों को कांपने पर मजबूर कर देती थी, उसकी गोद में पड़ी थी, बिना खींची हुई। उसे अब पता चल गया था कि कोई भी तलवार, कोई भी दीवार, उस न्याय को नहीं रोक सकती जो अंततः उस सबको आ लेती है जो खून और झूठ पर टिका होता है।

नीनवे का अंत उतना ही शीघ्र और निर्णायक ह

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