पवित्र बाइबल

विवाह, बच्चे और धन: यीशु की कठोर शिक्षाएँ

सूरज यरूशलेम की ओर जाने वाली उस सड़क पर सिर के ऊपर तप रहा था। धूल उड़ती, पैरों के नीचे कंकड़ चटकते। यीशु चल रहे थे, और उनके साथ वे लोग थे जो अब केवल शिष्य ही नहीं, एक प्रश्न से भरे हुए यात्री थे। रास्ते में कुछ फरीसे आए। उनके चेहरे पर वह भारी गंभीरता थी जो सवाल पूछने से पहले चढ़ाई जाती है। “क्या किसी पति के लिए यह उचित है कि वह अपनी पत्नी को त्याग दे?” उनकी आवाज़ में एक तल्ख उत्सुकता थी, जैसे कोई जाल बिछा रहे हों।

यीशु ने उनकी ओर देखा। उनकी नज़रें सीधी थीं, धूल से सनी उनकी पलकें झपकीं। “मूसा ने तुम्हें क्या आज्ञा दी थी?”

“मूसा ने त्याग-पत्र लिखने और उसे छोड़ देने की अनुमति दी थी,” फरीसियों ने जवाब दिया, शब्दों को तौल-तौल कर।

यीशु ने एक लम्बी सांस ली, मानो हवा में मौजूद सारी निराशा को अपने भीतर खींच रहे हों। “यह अनुमति तो तुम्हारे मन की कठोरता के कारण थी। लेकिन आरम्भ से, सृष्टि के समय से ही, परमेश्वर ने उन्हें नर और नारी बनाया। इसलिए पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिलेगा, और वे दोनों एक तन बन जाएंगे। वे अब दो नहीं, बल्कि एक हैं। जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।”

शिष्यों ने एक दूसरे की ओर देखा। ये शब्द पत्थर की लकीर की तरह थे, उस समय की ढीली-ढाली व्यवस्था में एक दृढ़ खिंचाव। फिर घर के भीतर, शिष्यों ने फिर इस बारे में पूछा। यीशु ने और भी स्पष्ट किया, “जो कोई अपनी पत्नी को त्यागकर दूसरी से विवाह करता है, वह उसके प्रति व्यभिचार करता है। और यदि कोई स्त्री अपने पति को त्यागकर दूसरे से ब्याह करती है, तो वह व्यभिचारिणी होती है।”

बात साफ थी। कठोर भी। शिष्य चुप रहे। उस गर्मी की दोपहर में यह शिक्षा एक छाया की तरह थी—स्पष्ट, ठंडी, और सब कुछ उजागर कर देने वाली।

फिर रास्ते में लोग अपने बच्चों को लाए। छोटे-छोटे हाथ-पैर, चिपचिपे गाल, माताओं की बाँहों में लिपटे या पिताओं के कंधों पर बैठे। वे चाहते थे कि यीशु उन पर हाथ रखें, प्रार्थना करें। शिष्यों ने उन्हें डांटा। “गुरु थके हैं, यह शोरगुल उचित नहीं।” उनकी आवाज़ में थकान और एक प्रकार की उदासीनता थी।

यीशु ने यह देखा और नाराज़ हुए। उनका चेहरा कठोर हो गया। “बच्चों को मेरे पास आने दो, उन्हें मत रोको। स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है। मैं तुमसे सच कहता हूँ, जो कोई बच्चे के समान स्वीकार नहीं करता, वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं पाएगा।” और उन्होंने बच्चों को गोद में लिया, उन पर हाथ रखे, आशीष दी। उनकी उंगलियाँ एक नन्हें बच्चे के नरम बालों से टकराईं, और उस क्षण सब कुछ सरल, निर्मल लगा।

फिर वह युवक आया। वह दौड़ता हुआ आया, उसके महंगे वस्त्रों पर धूल उड़ रही थी। वह घुटनों के बल यीशु के सामने गिरा। “अच्छे गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मैं क्या करूँ?” उसकी आँखों में एक प्यास थी, एक ईमानदार बेचैनी।

यीशु ने उसे देखा। “तुम मुझे अच्छा क्यों कहते हो? परमेश्वर के सिवा कोई अच्छा नहीं। तुम आज्ञाएँ तो जानते ही हो—हत्या मत करो, व्यभिचार मत करो, चोरी मत करो, झूठी गवाही मत दो, किसी का अपहरण मत करो, अपने माता-पिता का आदर करो।”

युवक ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ दृढ़ थी, “गुरु, इन सबका मैंने बचपन से पालन किया है।”

तब यीशु ने उस पर दृष्टि डाली, और उसे प्रेम किया। यह प्रेम एक दुखद स्नेह की तरह था। उनकी आवाज़ कोमल हुई, “तुझ में अभी एक बात की कमी है। जा, जो कुछ तेरा है, बेचकर कंगालों को दे दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा। फिर आकर मेरे पीछे हो ले।”

युवक का चेहरा उतर गया। वह दुखी हुआ, क्योंकि उसके पास बहुत धन था। वह चला गया, उसकी पीठ एक भारी झुकाव लिए हुए। यीशु ने चारों ओर देखा और शिष्यों से कहा, “धनवानों का परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है!” शिष्य चकित रह गए। तब यीशु ने फिर कहा, “हे बच्चों, धन पर भरोसा रखनेवालों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन है! एक सूई के नाके से ऊँट का निकलना, धनवान के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से अधिक सरल है।”

शिष्य और भी अचम्भित हुए। “तो फिर कौन उद्धार पा सकता है?” उनकी आवाज़ों में हताशा का स्वर था।

यीशु ने उनकी ओर देखा। “मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है; क्योंकि परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।”

पतरस ने कहा, “देख, हमने तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिया है।”

यीशु की आँखों में एक कोमल चमक आई। “मैं तुमसे सच कहता हूँ, जिसने मेरे लिए घर, भाइयों, बहनों, माता, पिता, सन्तान, या भूमि को छोड़ दिया है, वह इस समय सौ गुना प्राप्त करेगा… साथ ही सताव भी, और परलोक में अनन्त जीवन भी। पर बहुतेरे प्रथम अन्तिम होंगे, और अन्तिम प्रथम।”

वे फिर चल पड़े, यरूशलेम की ओर। यीशु आगे-आगे चल रहे थे, और उनके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जिसे देखकर शिष्य भयभीत थे। वह भयानक निश्चय का भाव था। फिर उन्होंने बारहों को एक तरफ ले जाकर फिर से वही बात कही, जो वे कहते आ रहे थे: “सुनो, हम यरूशलेम जा रहे हैं, और मनुष्य का पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हाथों पकड़वाया जाएगा। वे उसे मृत्यु की आज्ञा देंगे और उसे अन्यजातियों के हाथों सौंप देंगे। वे उसका उपहास उड़ाएंगे, उस पर थूकेंगे, उसे कोड़े मारेंगे और मार डालेंगे। परन्तु तीसरे दिन वह जी उठेगा।”

ये शब्द हवा में लटके रहे। जकबेई और यूहन्ना, वे दोनों भाइयाँ, एक ओर आए। उनकी माँ सलोमे भी साथ थी, उसके चेहरे पर एक महत्वाकांक्षा की झलक थी। वे एक अनोखी प्रार्थना लेकर आए। “हम चाहते हैं कि तू हमारे लिए वह करे जो हम मांगें।”

“तुम क्या चाहते हो?” यीशु ने पूछा।

“जब तू अपनी महिमा में विद्यमान हो, तो इन दोनों में से एक तेरे दाहिने और दूसरा तेरे बायें बैठे।”

यीशु ने एक क्षण के लिए आँखें मूँद लीं, मानो थोड़ी और ताकत जुटा रहे हों। “तुम नहीं जानते कि क्या माँग रहे हो। क्या तुम व

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