पवित्र बाइबल

सच्ची भक्ति का मार्ग

गाँव के पश्चिम में एक पुराना बरगद था, जिसकी छाया दोपहर बाद एक ठंडी शरण बन जाती थी। उसी छाया में बैठा था यूसुफ, जिसके हाथ की मुट्ठी में कुछ सिक्के थे, और दिल में एक उलझन। सामने की ओर से नथुन फुलाए हुए शमौन निकला, उसकी लम्बी चोगे वाली पोशाक पर धूल की एक परत चढ़ी थी, मानो उसने जानबूझ कर उसे सफ़ेद न होने दिया हो। उसने ज़ोर से खँखार करके दो सिक्के यूसुफ की गोद में फेंके। “अरे भाई, आज तो बड़े उदार मन से दान दिया है मैंने,” उसकी आवाज़ इतनी ऊँची थी कि रास्ता पार कर रही एक बूढ़ी औरत ने भी मुड़कर देखा। यूसुफ ने सिक्के उठाए, पर उसकी नज़रें शमौन के चेहरे पर टिकी रहीं, जो अब एक संतुष्ट, थोड़ा अहंकार भरे भाव से भीड़ की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ कुछ लोग उसकी प्रशंसा में सर हिला रहे थे।

यूसुफ ने सिक्के अपनी थैली में रखे, पर मन हल्का नहीं हुआ। उसे याद आया उस सुबह की बात, जब वह मन्दिर गया था। एक कोने में खड़े एक आदमी ने, जिसके कपड़े फटे थे और चेहरा धूल से सना, बस इतना कहा था, “पिता, तू देख रहा है।” और उसने अपना दान-पात्र भर दिया था। उसकी आँखों में कोई दिखावा नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। बस विश्वास था। यूसुफ ने महसूस किया, शमौन के दान से ज़्यादा मूल्यवान वह अनाम आदमी का विश्वास था।

घर लौटते हुए रास्ते में उसने राहेल को देखा। वह अपने घर की मिट्टी की दीवार के सामने बैठी थी, उसकी उँगलियाँ रोटी बेलने में व्यस्त थीं, पर होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे। कोई प्रार्थना। न कोई ऊँचा स्वर, न कोई विशेष मुद्रा। बस एक सहज बातचीत, जैसे कोई अपने पिता से गुफ़्तगू कर रहा हो। यूसुफ रुक गया। उसे अपनी प्रार्थनाएँ याद आईं, शब्दों के ढेर, फार्मूलों जैसे वाक्य, माँगों की लिस्ट। राहेल की सादगी ने उसे झकझोर दिया। उसने सोचा, “क्या हमारी प्रार्थना सिर्फ़ शब्दों का ढोंग नहीं बन गई है? क्या हम वास्तव में उससे बात करते हैं, या सिर्फ़ अपनी फ़रमाइशें सुनाते हैं?”

अगले दिन उपवास का दिन था। गाँव के चौराहे पर यिर्मयाह खड़ा था, उसका चेहरा उदास, कपड़े मैले, बाल बिखरे। लोग उसकी तरफ़ देखकर सर हिला रहे थे, “देखो, कितनी कठिन तपस्या करता है।” यिर्मयाह ने जानबूझ कर अपना रूप ऐसा बनाया था। यूसुफ ने देखा, और उसकी समझ में कुछ आया। उसने घर जाकर अपना चेहरा धोया, तेल लगाया, साफ़ कपड़े पहने। वह सामान्य दिनों की तरह दिखना चाहता था। जब उसकी पत्नी ने पूछा, “आज उपवास नहीं?” तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, “कर रहा हूँ। पर सिर्फ़ उसी और अपने आप के बीच।”

दिन बीतते गए। यूसुफ का खेत सूखा पड़ा था। बारिश नहीं हुई, बीज सड़ने लगे थे। चिंता ने उसे घेर लिया। एक शाम, जब आसमान में बादल नहीं, सिर्फ़ तारे थे, वह खेत की मेड़ पर बैठा आकाश की तरफ़ देख रहा था। तभी उसकी नज़र एक चिड़िया पर पड़ी, जो बरगद की डाल पर बेफ़िक्र सो रही थी। न कोई भंडार, न चिंता। फिर उसने खेत के किनारे उगे जंगली फूलों को देखा, जो बिना किसी मेहनत के, इतने सुंदर थे कि राजा सुलैमान का वैभव भी उनके आगे फीका लगता। उसके मन में एक शांति उतर आई। उसने अपने आप से कहा, “अगर ये छोटे जीव, ये नन्हें फूल उसकी देखभाल में हैं, तो क्या मैं, उसकी संतान, उसकी नज़र से ओझल हो सकता हूँ?”

सुबह हुई। यूसुफ ने एक निर्णय लिया। उसने अपनी चिंताओं को, अपनी महत्वाकांक्षाओं को, दिखावे की इच्छा को, एक तरफ रख दिया। उसने अपने खेत में काम करना शुरू किया, बिना यह सोचे कि फसल कैसी होगी। उसने छोटे-छोटे दान दिए, बिना किसी को बताए। उसने सरल शब्दों में प्रार्थना की, बस इतना कहा, “तेरी इच्छा पूरी हो। हमें आज का भोजन दे। हमारे अपराध क्षमा कर, जैसे हम दूसरों के अपराध क्षमा करते हैं।”

कुछ हफ़्ते बाद, जब शमौन और यिर्मयाह लोगों की नज़रों में धर्म के ठेकेदार बने घूम रहे थे, यूसुफ के खेत में हरी शुरुआत दिखाई दी। कोई चमत्कार नहीं हुआ था। बस एक साधारण वर्षा हो गई थी। पर यूसुफ जानता था, उसके जीवन में कुछ बदल गया था। उसने न तो धन इकट्ठा किया, न प्रशंसा। पर उसकी नींद गहरी हो गई, उसके चेहरे पर एक अलग तरह की रौनक थी। वह समझ गया था कि असली खज़ाना, वह नहीं जो धूल खाता है या चोर चुरा लेते हैं, बल्कि वह है जो दिखाई नहीं देता। और असली प्रकाश, वह नहीं जो दिखावे के लिए जलाया जाता, बल्कि वह है जो अंदर से पूरे अस्तित्व को रोशन कर देता है।

एक दिन राहेल ने उससे पूछा, “यूसुफ, तुम इतने शांत कैसे रहते हो?” यूसुफ ने बरगद की ओर देखा, और मुस्कुरा दिया। “कल की चिंता छोड़ दो, राहेल। आज का दिन अपने लिए काफ़ी है। बस उसकी बनाई इस दुनिया में, उसकी खोज में जीना सीखो। बाकी सब, वह स्वयं जोड़ देगा।” और उसकी आवाज़ में कोई उपदेश नहीं, कोई दिखावा नहीं था। बस एक सहज, गहरा विश्वास, जो मिट्टी और आकाश के बीच, एक साधारण मनुष्य के हृदय में पनप रहा था।

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