समुद्र की हल्की लहरें जहाज़ के पतवार से टकरा रही थीं, और हवा में नमक की एक हल्की गंध थी। पौलुस ने कन्धे पर पड़ी अपनी साधारण चादर को ठीक किया, और आँखें सेलेउकिया के बढ़ते हुए तट की ओर गड़ाए रखीं। बरनबास उनके पास खड़े थे, चेहरे पर एक गहरी, स्थिर शान्ति। वर्षों पहले, दमिश्क की सड़क पर हुई उस घटना के बाद से पौलुस की ज़िन्दगी बदल चुकी थी। अब वह सुलैमान के मन्दिर की ओर नहीं, बल्कि दुनिया के कोने-कोने में उस सन्देश को लेकर जा रहा था, जिसने उसे पलट कर रख दिया था।
सेलेउकिया से उन्होंने साइप्रस के लिए रुख किया, जहाँ बरनबास का जन्म हुआ था। सलामीस पहुँचते ही, वे यहूदियों के आराधनालयों में जाने लगे। हवा गर्म और राल के पेड़ों की महक से भरी थी। आराधनालय में लकड़ी की पुरानी कुर्सियाँ थीं, और खिड़कियों से धूप की किरणें आकर फर्श पर चौकोर निशान बना रही थीं। पौलुस खड़ा हुआ, उसके हाथ में चमड़े की पुरानी पोथी थी। उसने भविष्यद्वक्ताओं के लेख पढ़े, फिर धीरे से, पर दृढ़ता से समझाना शुरू किया। वह मूसा की व्यवस्था से शुरू करके दाऊद तक गया, और फिर उसने यीशु का नाम लिया – दाऊद का वंशज, जिसे मृत्यु से जी उठने के बाद अब तक के सभी पापों की क्षमा का मार्ग बताया जा रहा था। कुछ लोगों की आँखों में चमक थी, तो कुछ के चेहरे संशय से भरे हुए।
वे पूरे द्वीप को पार करते हुए पाफस पहुँचे। वहाँ उनकी मुलाकात सरजियुस पौलुस नाम के एक व्यक्ति से हुई, जो द्वीप का राज्यपाल था। वह बुद्धिमान और जिज्ञासु व्यक्ति था। उसने बरनबास और पौलुस को बुलाया, परेशान सा। “मेरे यहाँ एक व्यक्ति है,” उसने कहा, “एल्युमस नाम का। जादू-टोना करता है, और स्वयं को परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता कहता है। वह मुझे आप लोगों से मिलने से रोक रहा है, भ्रम फैला रहा है।”
अगले दिन, जब वे राज्यपाल के महल में गए, तो एल्युमस वहाँ पहले से मौजूद था। उसकी आँखें संकरी और चालाक थीं, उसने रेशमी वस्त्र पहन रखे थे। उसने सरजियुस पौलुस को फुसफुसाते हुए कहा, “ये लोग झूठे हैं, हे उम्दा शासक। ये आपके विश्वास को बहकाएँगे।”
पौलुस ने उसे सीधे देखा। एक क्षण के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया, केवल बाहर झरने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। फिर पौलुस की आवाज़ गूँजी, तीखी और अधिकार से भरी। “हे सारे छल और कपट से भरे, शैतान के सन्तान!” उसने कहा, “क्या तू धर्म्म की सीधी राहों को बिगाड़ना नहीं छोड़ेगा? अब देख, प्रभु का हाथ तुझ पर है। तू अंधा हो जाएगा, और कुछ समय के लिए सूरज को न देख सकेगा।”
यह कहते ही, एक अजीब सी धुँधली छाया ने एल्युमस की आँखों को ढक लिया, जैसे कोई गाढ़ा कोहरा उसकी दृष्टि के आगे आ गया हो। वह हाथ फैलाकर इधर-उधर टटोलने लगा, चीखा, “कोई मुझे हाथ पकड़ो! मैं कुछ नहीं देख पा रहा!” उसके चेहरे का घमण्ड चूर-चूर हो गया था, अब केवल भय और विवशता थी।
यह देखकर राज्यपाल सरजियुस पौलुस विस्मय में पड़ गया। उसने पौलुस और बरनबास की ओर देखा, और उसके मन में बैठा हर संशय धुल गया। वह विश्वास करने लगा, पर यह विश्वास केवल एक चमत्कार देखकर नहीं, बल्कि उस सत्य से अचम्भित होकर उत्पन्न हुआ था, जिसकी शिक्षा इन दोनों यात्रियों ने दी थी।
पाफस से वे जहाज़ पर सवार होकर पम्पुलिया आए, और वहाँ से उन्होंने पिसिदिया के अन्ताकिया का रास्ता लिया। यह यात्रा कठिन थी – पहाड़ी रास्ते, धूल भरी हवाएँ, और अनजान भूमि। जब वे अन्ताकिया पहुँचे, तो सब्त के दिन वे आराधनालय गए। लकड़ी की लम्बी बेंचों पर बैठे लोगों ने उन्हें देखा। अगवानी करने वालों ने कहा, “भाइयो, यदि तुम्हारे पास लोगों के लिए कोई शिक्षा है, तो कहो।”
तब पौलुस खड़ा हुआ। उसने हाथ से इशारा किया, शान्ति से। उसकी आवाज़ में एक गहरा पैठ था। उसने कहा, “हे इस्राएल के लोगों, और परमेश्वर से डरने वालो, सुनो।” और फिर उसने कहानी शुरू की – एक कहानी जो मिस्र से छुड़ाए जाने से शुरू होकर, राजाओं और भविष्यद्वक्ताओं के ज़रिए चलते हुए, दाऊद तक पहुँची। “और दाऊद के वंश से,” पौलुस ने आवाज़ को और दृढ़ किया, “परमेश्वर ने इस्राएल के लिए एक उद्धारकर्ता भेजा है, यीशु है।”
उसने यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का ज़िक्र किया, फिर यरूशलेम के अगुवों के द्वारा यीशु की मृत्यु और उसके पुनरुत्थान की बात कही। “और इसलिए, हे भाइयो,” उसकी आवाज़ में एक अपील थी, “जान लो कि इसी के द्वारा तुम्हें पापों की क्षमा का प्रचार किया जाता है। मूसा की व्यवस्था से तुम में से कोई भी धर्मी नहीं ठहरा, पर इस पर विश्वास करने वाला हर कोई धर्मी ठहराया जाता है।”
आराधनालय से निकलते समय, लोग उनसे मिलने आए। कई लोग, विशेषकर अन्यजाति, जो परमेश्वर की उपासना करते थे, उनके पीछे-पीछे चल पड़े। अगले सब्त को तो शहर का बड़ा भाग इकट्ठा हो गया। पर जब यहूदी अगुवों ने इतनी भीड़ देखी, तो उनके मन में ईर्ष्या भर आई। उन्होंने पौलुस के शब्दों का विरोध करना शुरू कर दिया, और बुरा-भला कहने लगे।
तब पौलुस और बरनबास ने स्पष्ट कहा, “परमेश्वर का वचन पहले तुम्हें सुनाया जाना अवश्य था। पर जब तुम उसे ठुकराते हो, और अपने आप को अनन्त जीवन के योग्य नहीं ठहराते, तो देखो, हम अन्यजातियों की ओर फिरते हैं।”
यह सुनकर अन्यजातियों ने आनन्द मनाया, और प्रभु के वचन को ग्रहण किया। पर विरोध करने वालों ने उन महिलाओं को, जो प्रतिष्ठित थीं, और नगर के प्रमुख पुरुषों को भड़काया, और पौलुस और बरनबास को उस भूमि से निकलवा दिया। वे दोनों उस नगर से बाहर चले गए, और उन्होंने अपने पैरों की धूल झाड़ दी, एक प्रतीक के रूप में। फिर भी, उनके हृदय आनन्द से भरे थे, और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे। वे आगे की यात्रा के लिए तैयार थे, क्योंकि सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण केवल चमत्कार ही नहीं, बल्कि वह अनदेखा, अनकहा परिवर्तन था, जो एक मनुष्य के भीतर हो सकता है – अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से जीवन की ओर, एक कदम।




