पवित्र बाइबल

प्रतीक्षा और आशा का दिन

उस गाँव में, जहाँ चिलचिलाती धूप मिट्टी के घरों की दीवारों पर सफेदी चढ़ा देती थी, बूढ़ा इलियास अपनी झोपड़ी के साये में बैठा, आँखें बंद किए, दूर क्षितिज को सुन रहा था। हवा में सूखी मिट्टी की गंध थी, और आम के पेड़ की पत्तियाँ बिना हिले-डुले लटक रही थीं, मानो प्रतीक्षा में हों। गाँव के युवा, जिनके लिए धैर्य एक विलुप्त भाषा थी, उसके पास जमा होने लगे। उनमें से एक, नटखट आँखों वाला राहुल, बोला, “बाबा, सब कहते हैं प्रभु फिर आएगा, न्याय करेगा। पर ये वादे कब से किए जा रहे हैं? हमारे दादा के दादा भी यही सुनते आए। सब कुछ तो वैसा ही चल रहा है – सूरज निकलता है, बादल बरसते हैं, लोग पैदा होते और मरते हैं।”

इलियास ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में गहराई थी, जैसे किसी गहरे कुएँ का पानी, जो समय की सतह के नीचे छुपा हो। उन्होंने धीरे से एक सूखी टहनी उठाई और रेत पर एक रेखा खींची। “तुम्हें लगता है सब कुछ वैसा ही चल रहा है?” उनकी आवाज़ में फुसफुसाहट थी, पर वह हर शब्द साफ था। “इस रेखा को देखो। क्या तुम देख सकते हो कि यह हिल रही है? नहीं। पर एक दिन आएगा, जब तूफान आएगा, और यह रेखा मिट जाएगी। समय प्रभु के लिए तुम्हारी धड़कन जैसा नहीं है। उसके लिए एक दिन हज़ार साल के समान है, और हज़ार साल एक दिन के। वह जल्दबाज़ी में नहीं है, क्योंकि उकसाना उसकी आदत नहीं। वह तो धीरज रखता है, चाहता है कि कोई भी नष्ट न हो। हर एक को मन फिराने का अवसर मिले।”

उसने एक ओर इशारा किया, जहाँ एक सूखी नदी का चौड़ा पाट धूप में चमक रहा था। “तुम्हें याद है, जब हम बच्चे थे, तो यह नदी बरसात में उफन उठती थी? उसका पानी इतना तेज होता था कि पत्थरों को घसीट ले जाता था। परमेश्वर का न्याय भी ऐसे ही अचानक आएगा, जब लोग ‘शांति, सुरक्षा’ कह रहे होंगे। जैसे पुराने जमाने में जल-प्रलय आया था, वैसे ही यह आकाश आग से भस्म हो जाएगा, और धरती की सारी रचनाएँ जल मारी जाएँगी।”

एक लड़की, प्रिया, जो चुपचाप सुन रही थी, बोली, “फिर तो सब व्यर्थ है। जलना है, राख होना है, तो अच्छे बनने का क्या लाभ?”

इलियास ने कोमलता से मुस्कुराया। “बेटी, क्या तुम फसल काटने के बाद खेत को ऐसे ही छोड़ देती हो? नहीं। तुम जोतती हो, बीज बोती हो, नई फसल की आशा रखती हो। प्रभु ऐसा ही करेगा। यह पुरानी सृष्टि, जो पाप और मृत्यु से कलंकित है, जलकर नष्ट हो जाएगी। पर उसके बाद? उसके बाद एक नया आकाश और नयी पृथ्वी प्रकट होगी। धर्म का निवास स्थान। कोई और आँसू नहीं, कोई पीड़ा नहीं, कोई विदाई नहीं। यही हमारी आशा है। यही हमारी प्रतीक्षा का कारण है।”

उसने अपनी झोली से एक पुरानी, मुलायम चमड़े में बंधी बाइबिल निकाली। “पतरस ने कहा था – चूंकि ये सब बातें इस प्रकार घुलनी-मिलनी हैं, तो तुम्हें कैसा होना चाहिए? पवित्र आचरण और भक्ति में होना चाहिए। उस दिन की आशा में, जो अवश्य आएगा, तुम्हें शुद्ध और निष्कलंक रहना चाहिए। तुम्हारी ज़िंदगी एक तैयार मशाल की तरह हो, न कि बुझे हुए कोयले की तरह।”

शाम ढलने लगी। आसमान में केसरिया और बैंगनी रंग फैल रहे थे। इलियास ने युवाओं की ओर देखा। “तुम लोग जाओ। रोजमर्रा के काम करो। पर उस आशा को मन में रखो। उस दिन के लिए तैयार रहो। वह चोर की तरह आएगा, बिन बुलाए, बिन सूचना दिए। प्रतीक्षा में बिताया गया हर पल, प्रार्थना में बिताया गया हर क्षण, व्यर्थ नहीं जाएगा। क्योंकि उसकी प्रतिज्ञाएँ खोखली नहीं हैं। वह विलंब नहीं कर रहा, वह तुम्हें और मुझे समय दे रहा है… कि हम मुड़ सकें।”

लोग चले गए। इलियास अकेला रह गया। उसने नई पृथ्वी के स्वप्न को अपने हृदय में संजोया। हवा में एक ठंडक आई, मानो स्वर्ग की एक सांस ने धरती को छुआ हो। प्रतीक्षा लंबी थी, पर उसकी आशा दृढ़ थी। क्योंकि वह जानता था – प्रभु का एक दिन अवश्य आएगा।

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