चिलचिलाती धूप रेगिस्तान की रेत को तप्त किए हुए थी। सिनै पर्वत एक विशाल, धूसर और गूँजते हुए रहस्य की तरह आसमान से टकराया खड़ा था। नीचे, उस विस्तृत घाटी में, एक भीड़ बेचैन हो रही थी। दिन गिने जा चुके थे, हफ्ते बीत गए थे। मूसा पर्वत पर चढ़ गया था, और अब तक लौटा नहीं था। उसकी अनुपस्थिति एक जीवित चीज़ की तरह, लोगों के बीच घूम रही थी, फुसफुसाती थी।
“यह आदमी, मूसा, हमें मिस्र से निकाल लाया,” एक बूढ़ा चमड़ा सिलता हुआ बोला, उसकी आँखें घबराई हुई थीं, “लेकिन अब वह स्वयं गायब है। क्या हुआ? कहाँ गया वह? हम इस उजाड़ में अकेले पड़ गए हैं।”
भीड़ में यह बेचैनी दिनों से पक रही थी। भय और अनिश्चितता की आग धीरे-धीरे सुलग रही थी। एक दिन, वह आग भभक उठी। लोगों का एक समूह हारून के पास जा पहुँचा, जो मूसा के न रहने पर उनका नेतृत्व कर रहा था। उनके चेहरों पर वही डर था, वही खालीपन।
“उठाओ, हमारे लिए एक देवता बनाओ जो हमारे आगे चले,” उन्होंने जोर देकर कहा, उनकी आवाज़ें एक साथ मिलकर एक गड़गड़ाहट बन गईं। “क्योंकि उस मूसा का, जो हमें मिस्र देश से निकाल लाया, हमें कुछ पता नहीं कि उसका क्या हुआ।”
हारून के सामने भीड़ देखकर घबरा गया। उसने उनकी आँखों में वह चिंगारी देखी, जो दंगे की लपट बन सकती थी। शांति बनाए रखने का विचार, एक क्षणिक समाधान का विचार, उसके मन में आया। “तुम्हारी स्त्रियों, बेटों और बेटियों के कानों की बालियाँ निकालकर मेरे पास लाओ,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में एक थकी हुई नर्मी थी, समर्पण की झलक।
और लोगों ने ऐसा ही किया। सोने की बालियाँ, चमकती हुई, उनके पल्लों से निकलकर एकत्र होने लगीं। एक ढेर बन गया, जो रेत पर सूरज की रोशनी में टिमटिमा रहा था। हारून ने उस सोने को लिया, एक साँचे में ढाला, और एक बछड़े की मूर्ति गढ़ डाली। लोग इकट्ठा हुए, उनकी आँखें उस चमकदार, निर्जीव रूप पर टिक गईं, जो उनकी अपनी भेंट की हुई वस्तु से बना था।
“हे इस्राएल,” किसी ने जोर से पुकारा, एक अजीब उत्साह से भरकर, “यह तेरा देवता है जो तुझे मिस्र देश से निकाल लाया।”
और ऐसा मानकर, मानो कोई भार उनके हृदय से उतर गया हो, वे उत्सव मनाने लगे। भोज तैयार किया गया। लोग खाने-पीने में मग्न हो गए। और फिर नाच शुरू हुआ। यह कोई पवित्र नृत्य नहीं था। यह एक ऐसा उन्माद था, जिसमें डर, राहत और उत्तेजना का घालमेल था। शरीर टेढ़े-मेढ़े झटके दे रहे थे, आवाज़ें चीख-चीखकर गा रही थीं। रेत उनके पैरों तले उड़ रही थी, और सुनहरे बछड़े की मूर्ति मूक, निर्विकार खड़ी थी, उस अव्यवस्था पर मुस्कुराती हुई सी।
ऊपर, पर्वत पर, ऐसा कुछ नहीं था। वहाँ एक गहरी, कंपकंपा देने वाली शांति थी। मूसा ने पत्थर की दो पटियाएँ प्राप्त की थीं, जिन पर परमेश्वर की उँगली से व्यवस्था लिखी हुई थी। लेकिन तभी, यहोवा ने मूसा से कहा, “जा, नीचे उतर। क्योंकि तेरी प्रजा, जिसे तू मिस्र देश से निकाल लाया है, बिगड़ गई है।”
पर्वत के नीचे उतरते हुए, यहोशू ने, जो उसके साथ था, आवाज़ सुनी। “छावनी में लड़ाई का शोर सुनाई दे रहा है,” उसने कहा।
मूसा ने सिर हिलाया। उसका चेहरा गंभीर था। “नहीं,” उसने कहा, उसकी आवाज़ भारी थी, “यह जयजयकार का नहीं, हार का भी नहीं। यह गाने का शोर है जो मैं सुन रहा हूँ।”
और जैसे ही वे नज़दीक पहुँचे, दृश्य सामने आया। भीड़ अबाध नृत्य में थी। और उस सबके केंद्र में, रेत में गड़ा हुआ, वह सोने का बछड़ा चमक रहा था। मूसा के हाथों में वह पत्थर की पटियाएँ थीं, जिन पर जीवन का नियम खुदा हुआ था। उसने जो देखा, उससे उसका क्रोध भड़क उठा, एक शांत, भयानक क्रोध। उसने अपने हाथ फैलाए और उन पवित्र पटियाओं को, पर्वत की तराई में, पत्थरों पर पटक दिया। वे टूटकर चकनाचूर हो गईं। उनके टुकड़े चारों ओर बिखर गए, उस उन्मत्त नृत्य के बीच गिरे, जो अचानक थम गया था।
शोर खत्म हो गया। सन्नाटा छा गया। सिर्फ रेत की हवा की सीटी बज रही थी। सैकड़ों जोड़ी आँखें अब मूसा पर टिकी थीं, जो धीरे-धीरे शिविर में घुस रहा था। उसने सोने के बछड़े को उठाया, उसे आग में झोंक दिया, पिघलाया, पीस डाला, जब तक वह महीन बारीक धूल न बन गया। फिर उसने उस धूल को पानी में मिलाया और इस्राएल के लोगों को पिला दिया। “लो,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “जिस देवता को तुमने गढ़ा है, उसे पी लो।”
फिर वह शिविर के फाटक पर खड़ा हो गया। “मेरे पास आओ, जो यहोवा के हैं,” उसने पुकारा। उसकी आवाज़ में अब कोमलता नहीं, लोहे जैसा दृढ़ संकल्प था। लेवी के गोत्र के लोग उसके पास इकट्ठे हुए। और एक दुखद, भयानक आज्ञा दी गई। उस दिन करीब तीन हजार लोग मारे गए। रेत लाल हो गई। उत्सव का स्थान शोक और मृत्यु की गंध से भर गया।
अगली सुबह, मूसा ने लोगों से कहा, “तुमने बड़ा पाप किया है। परन्तु अब मैं परमेश्वर के पास जाता हूँ। शायद, तुम्हारे पाप के लिए प्रायश्चित कर सकूँ।”
वह फिर पर्वत पर गया। उसकी प्रार्थना टूटी हुई थी, एक संतान के लिए बोझिल हृदय की याचना। “हे यहोवा, इन लोगों ने बड़ा पाप किया है… कृपया, उनका पाप क्षमा कर। यदि नहीं, तो मुझे भी, जिस पुस्तक में तू ने लिखा है, उस में से मिटा दे।”
पर्वत की हवा ठंडी थी। मूसा की आवाज़ अकेलेपन में गूँज रही थी। उत्तर आया, एक दिव्य, अटल न्याय की घोषणा। पाप का परिणाम भुगतना होगा। फिर भी, एक राह थी। प्रायश्चित का मार्ग खुला रहा। जब मूसा नीचे उतरा, उसके चेहरे की त्वचा एक अलौकिक चमक से जगमगा रही थी, इतनी तेज कि लोग उसकी ओर सीधे देख नहीं पा रहे थे। उसे एक परदा ढाँकना पड़ा। वह चमक अनुग्रह की चमक थी, न्याय के बाद भी बची हुई दया की किरण। लोग चुपचाप देखते रहे, जब वह मिलनवाले तम्बू में प्रवेश करने के लिए चला गया, उनके और परमेश्वर के बीच फिर से खड़ा होने के लिए, टूटी हुई पटियाओं और एक टूटे हुए विश्वास के बीच, पुनर्निर्माण की एक कठिन, दीर्घकालिक यात्रा शुरू करने के लिए।




