पवित्र बाइबल

यूसुफ का क्षमा और विश्वास

यूसुफ उस शव पर गिरकर रोया, अपने पिता के ठंडे माथे को छूकर। मिस्र की भरी धूप में भी उसे एक कंपकंपी सी लग रही थी। याकूब का शरीर, जो इतने वर्षों तक उसके लिए एक सहारा, एक स्मृति बना रहा, अब सिर्फ स्मृति था। उसने आँखें मूंदीं। पिता की आवाज़ याद आई – वह आशीर्वाद, वह कसम जो उससे गिलाद के पहाड़ पर ले जाने के लिए खाई गई थी।

अगले चालीस दिन मिस्र में शोक के दिन थे। डॉक्टरों ने शव को सुरक्षित रखने के लिए अपनी कला दिखाई। और फिर, एक विशाल जुलूस तैयार हुआ। यह कोई साधारण अंतिम यात्रा नहीं थी। फिरौन के आदेश पर, मिस्र के रथसवार, हथीसवार, और अधिकारियों का एक बड़ा दल यूसुफ और उसके परिवार के साथ चला। गाड़ियाँ और घोड़े, सब कुछ था। वे सारे पड़ाव जो यूसुफ ने एक दास के रूप में देखे थे, अब एक राजकुमार के रूप में, एक शोकाकुल पुत्र के रूप में देख रहा था।

यात्रा लंबी थी। जब वे अताद के खलिहान के पास पहुँचे, तो नील की हरियाली पीछे छूट चुकी थी और जंगल की कठोर भूमि शुरू हो गई थी। यहाँ, एक विचित्र दृश्य हुआ। यूसुफ ने देखा कि उनके साथ आए मिस्र के अधिकारी और सैनिक एक तरफ खड़े हैं, और उसके भाई, बच्चे, और परिवार दूसरी तरफ। उसने फैसला किया। उसने मिस्र के लोगों से कहा कि वे यहीं ठहरें। “यह एक कनानी परिवार का शोक है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब दृढ़ता थी, “इसे हम ही निभाएंगे।”

और फिर, केवल वे परिवार वाले आगे बढ़े। बिना मिस्र की भव्यता के। सात दिनों तक, वे उसी रीति से शोक मनाते रहे, जैसे कनान की धूल में कोई साधारण परिवार मनाता है। जंगल के जानवर हैरान देखते रहे। स्थानीय कनानी लोगों ने देखा और कहा, “देखो, मिस्र में यह एक भारी शोक है।” उन्होंने उस जगह का नाम ही ‘मिस्री शोक’ रख दिया।

अंततः, वे उस गुफा तक पहुँचे, जो मकपेला की खेत में थी, जहाँ इब्राहीम, सारा, इसहाक, रिबका दफन थे, और जहाँ लिआ भी पहले ही विश्राम कर रही थी। याकूब को उसकी बीवी के बगल में रखा गया। पत्थर फिर से लुढ़काया गया। सब कुछ शांत था। कोई रोना नहीं, कोई विलाप नहीं। सिर्फ एक गहरी, थकी हुई चुप्पी, जैसे एक लंबी दौड़ पूरी हुई हो।

फिर वापसी की यात्रा शुरू हुई। मिस्र लौटते हुए, रेत पर पैरों के निशान लम्बे पड़ रहे थे। यूसुफ के भाईयों के मन में एक नया भय जन्म ले रहा था। अब पिता नहीं थे। वह यूसुफ, जिसे उन्होंने कुएँ में फेंका था, जिसे गुलाम बेचा था, अब पूरे मिस्र का शक्तिशाली व्यक्ति था। अब क्या होगा? क्या वह बदला लेगा?

वे आपस में फुसफुसाने लगे। “शायद अब यूसुफ हमसे बैर रखेगा,” एक ने कहा। “हमने उसे जो दुःख दिया, उसका हिसाब तो चुकता करेगा ही,” दूसरे ने आह भरकर कहा। उनकी बातें यूसुफ तक पहुँची। वह चुप रहा। उसके मन में कोई कड़वाहट नहीं थी, लेकिन वह जानता था कि उनके भीतर का डर असली था।

एक दिन, वे सब इकट्ठे हुए। भाईयों ने एक संदेश भेजा: “तेरे पिता ने मरने से पहले यह आज्ञा दी थी कि तू हमसे यह कहना कि ‘तुम यूसुफ से कहना कि भाइयों के अपराध और पाप क्षमा करना।'” यूसुफ सुनकर रो पड़ा। वह समझ गया। यह आज्ञा नहीं, उनकी मजबूरी थी। वह उनकी लाचारी देख सकता था।

जब वे स्वयं उसके सामने आए और उसके सामने सिर झुकाकर गिर पड़े, तो वह द्रवित हो गया। “मैं परमेश्वर की जगह नहीं हूँ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अद्भुत कोमलता थी। “तुमने मेरे लिए बुराई का विचार किया, पर परमेश्वर ने उसी का भला करने की योजना बनाई, ताकि आज बहुत लोगों का जीवन बच सके। इसलिए डरो नहीं। मैं तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का पालन-पोषण करूंगा।”

और उसने उन्हें दिलासा दी, प्यार से बातें कीं। उनके दिलों का बोझ हल्का हुआ। वर्षों की ग्लानि धुल गई। यूसुफ उनके साथ रहा, और वे सब मिस्र में बस गए। गोशन की भूमि उनका घर बन गई।

समय बीतता गया। यूसुफ बूढ़ा हुआ। उसने अपने भाईयों के बच्चों और पोतों को देखा, और उसकी आँखों में संतुष्टि थी। एक दिन, जब उसका अंत निकट था, तो उसने सबको बुलाया। “मैं मरने वाला हूँ,” उसने कहा, “पर परमेश्वर तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हें इस देश से उस देश में ले जाएगा, जिसकी शपथ उसने इब्राहीम, इसहाक और याकूब से खाई थी।”

उसने एक वादा लिया। “जब परमेश्वर तुम्हारी सहायता करे, तो मेरी हड्डियाँ यहाँ से उठाकर अपने साथ ले जाना।” और ऐसा ही हुआ। यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया। उसके शव को सुगन्धित द्रव्यों में रखा गया, और एक ताबूत में सुरक्षित कर दिया गया। वह ताबूत मिस्र की भूमि में रहा, एक मूक प्रतीक, एक प्रतीक्षा। एक वादे की प्रतीक्षा, कि एक दिन परमेश्वर अपने लोगों को वादा किए हुए देश में ले जाएगा, और यूसुफ की हड्डियाँ भी, अपने पिता-दादाओं के पास पहुँच जाएंगी।

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