पवित्र बाइबल

सातवें महीने की पवित्र यात्रा

सातवाँ महीना था। तिशरी का महीना। हवा में अब गर्मी का सितम नहीं, बस एक कोमल सरसराहट थी, जो शाम ढलते ही ठंडक में बदल जाती। पहाड़ियों के पीछे से सूरज डूब रहा था और लम्बी-लम्बी छायाएँ मिलाप के डेरे पर पसर रही थीं। एलियासीम अपने पिता के पीछे-पीछे चल रहा था, उसके हाथ में एक मेमने की बलि के लिए चुनी गई नई रस्सी थी, जो अभी भी उसकी हथेली को चुभती महसूस हो रही थी।

“कल,” उसके पिता, यिशाई, ने कहा। उनकी आवाज़ में वह गंभीरता थी जो साल के इस समय आती थी। “कल पहला दिन है। याद रखना, कोई साधारं काम नहीं। पवित्र सभा का दिन है। एक बछड़ा, एक मेढ़ा, सात साल के बेदाग मेमने।”

एलियासीम ने सिर हिलाया। वह सब जानता था। उसे यह भी याद था कि अन्न, तेल, और दाखमधु का भेंट चढ़ाना कितना महत्वपूर्ण था। पर आज उसका ध्यान वेदी के पास जमा हुए लोगों पर था। इतनी भीड़… यह साल का सबसे विशेष समय था। पिता ने फिर कहा, “और एक बकरा। पापबलि के लिए। यह सब तुम्हारी सुबह की भेंट के अलावा है।”

सातवें महीने का पहला दिन आया। भोर में ही तुरहियों का स्वर फटा। तीखा, कंपकंपा देने वाला, पहाड़ियों से टकराता हुआ। यह आवाज़ सीधे हृदय में उतर गई। एलियासीम ने देखा कि कैसे याजक लंबी-लंबी चांदी की तुरहियाँ बजा रहे थे, उनके गाल फूले हुए थे। यह ‘योम तेरुआ’ था – तुरहियों का दिन। स्वर के साथ ही डेरे के चारों ओर एक सक्रियता दौड़ गई। यह सिर्फ एक सभा नहीं थी; यह एक पुकार थी। परमेश्वर की याद दिलाने वाली, एक नए सिरे से शुरुआत का संकेत।

अगले दस दिन किसी अदृश्य तनाव से भरे हुए थे। हर दिन की बलि थी – बछड़े, मेढ़े, मेमने। संख्या घटती जा रही थी। तेरह, बारह, ग्यारह… एलियासीम हर सुबह गिनता। यह गिनती हृदय की एक लय बन गई थी। वेदी पर लगातार धुआँ उठता रहता, मांस की सोंधी गंध हवा में मिल जाती, और तेल व दाखमधु की मीठी सुगंध उसे घेर लेती। लोग चेहरों पर एक गहरी श्रद्धा लिए खड़े रहते। ये दिन तैयारी के दिन थे। आत्मा की तैयारी।

फिर दसवाँ दिन आया। योम किप्पुर – प्रायश्चित का दिन। उस दिन सब कुछ थम सा गया। एक भारी, पवित्र शांति छा गई। कोई भोजन नहीं, कोई काम नहीं। सिर्फ प्रार्थना और आत्म-चिंतन। महायाजक, अपने विशेष वस्त्रों में, परमपवित्र स्थान में प्रवेश करने को तैयार था। एलियासीम ने अपने पिता को एक अजीब-सी घबराहट में देखा। “आज,” पिता ने फुसफुसाते हुए कहा, “आज वही हमारे सारे पापों के लिए प्रायश्चित करता है। हमारे लिए, और इस डेरे के लिए, और वेदी के लिए भी।” बलि विशेष थी – एक बछड़ा, एक मेढ़ा, सात मेमने, और एक बकरा। पर उससे भी ज्यादा, वह ‘अजाजेल’ के लिए चुना गया दूसरा बकरा था, जिस पर सारे पापों का भार डालकर उसे जंगल में भेज दिया जाता। एलियासीम ने उस बकरे को जाते देखा, एक याजक उसे ले जा रहा था, और उसके साथ ही लगा जैसे सबके मन का बोझ भी दूर जा रहा हो।

प्रायश्चित के बाद का विश्राम गहरा और मधुर था। जैसे नए सिरे से साँस लेने का अवसर मिला हो।

और फिर पंद्रहवाँ दिन। सुक्कोत – झोपड़ियों का पर्व। अचानक ही डेरे का पूरा मिजाज बदल गया। गंभीरता की जगह एक अद्भुत आनंद फैल गया। लोग हँस रहे थे, एक-दूसरे से गले मिल रहे थे। हर परिवार अपनी-अपनी झोपड़ी बना रहा था – खजूर की डालियों, अरंड और बाँस के पत्तों से। एलियासीम ने अपने भाइयों के साथ मिलकर झोपड़ी खड़ी की। छत इतनी पतली कि रात को तारे दिखाई देते। यह याद दिलाता था कि उनके पूर्वज मिस्र से निकलकर जंगल में कैसे रहते थे। अस्थायी। सुरक्षा परमेश्वर से ही थी।

इन आठ दिनों में बलियों की संख्या फिर बदल गई। पहले दिन तेरह बछड़े, दूसरे दिन बारह… यह क्रम चलता रहा, आठवें दिन सिर्फ एक बछड़ा बचा। एलियासीम को यह गिरती हुई संख्या अजीब लगती। उसने पूछ ही लिया, “पिता, यह घटती संख्या… इसका क्या अर्थ है?”

यिशाई ने एक टहनी को झोपड़ी की दीवार में बाँधते हुए कहा, “कुछ कहते हैं कि यह अन्यजातियों के लिए है, जिनकी संख्या पर्व के दिनों में घटती जाती है। पर मेरे विचार में… शायद यह हमारी ही भेंट है जो धीरे-धीरे शुद्ध होती जाती है। शुरुआत बहुत से जानवरों से, अंत में एक तक। जैसे हमारा मन, जो इस उत्सव में तराशा जाता है, अंत में सिर्फ एक ही भाव से भर जाता है – उसकी उपस्थिति का आनंद।”

आठवें दिन, ‘अत्जेरेत’ पर, एक अन्तिम पवित्र सभा हुई। बलि सादी थी – एक बछड़ा, एक मेढ़ा, सात मेमने। कोई विशेष तुरही नहीं, कोई झोपड़ियाँ नहीं। बस एक सादगी भरा समापन। जैसे एक गहरी साँस लेकर छोड़ दी गई हो।

एलियासीम झोपड़ी की ओट में खड़ा होकर वेदी की लपटों को देख रहा था। अब धुआँ कम था। सातवाँ महीना समाप्त हो रहा था। उसे वह रस्सी याद आई, जो पहले दिन उसकी हथेली में चुभती थी। अब वह चुभन नहीं थी। उसकी जगह एक कोमल सुपरिचितता थी। इन सभी बलियों, इन संख्याओं, इन नियमों के पीछे एक लय थी। एक अनुशासन, जो मन को सिखाता था कि पवित्रता साधारण चीजों में भी है – एक मेमने की चमकती आँख में, तुरही के स्वर में, झोपड़ी की छाया में। यह परमेश्वर के साथ चलने का एक ढंग था। समय के साथ चलना। फसल के समय उसकी उदारता को याद करना, अपने पापों पर दुखी होना, और अंत में, उसकी छाया में बैठकर शुद्ध आनंद मनाना।

हवा फिर से सरसराई, अब और ठंडी। एलियासीम ने अपनी झोपड़ी की ओर देखा। कल वह उसे उतार देगा। पर आज रात, वह उसकी छत के अंतराल से टिमटिमाते तारों को देखेगा, और उस महीने की स्मृति को अपने हृदय में संजोकर रख लेगा, जो उसे सिखा गया कि पवित्रता और आनंद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *