शीलो की पहाड़ियाँ सूरज की तिरछी किरणों में सुनहरी हो रही थीं। दिन ढल रहा था, और हवा में जैतून के पेड़ों की हल्की सी सरसराहट थी। बूढ़ा यहोशू अपने तम्बू के सामने बने पत्थर के एक साधारण बेंच पर बैठा, उसकी पीठ में एक अजीब सी पीड़ा थी, वह दर्द नहीं, बल्कि वर्षों के बोझ का एहसास था। उसकी आँखें, जो कभी यरीहो की दीवारों को गिराते हक्त नगरों का सामना करते समय चमकती थीं, अब थोड़ी धुँधली पड़ गई थीं, पर उनकी गहराई में वही दृढ़ता कायम थी।
उसने आसपास नज़र दौड़ाई। शीलो का तम्बू मिलाप, जहाँ से परमेश्वर की उपस्थिति का एहसास हुआ करता था, शांत खड़ा था। चारों ओर इस्राएल के गोत्रों के डेरे लगे हुए थे। रसोई के धुएँ की गंध हवा में मिल रही थी, बच्चों के खेलने की आवाज़ें आ रही थीं। यह सब देखकर उसके होंठों पर एक क्षणिक मुस्कान खेल गई, फ़िर तुरंत गंभीर हो गए। यह शांति, यह स्थिरता… यह बहुत नाजुक थी। उसे पता था।
उसने अपने एक सेवक को बुलाया। “सब बुजुर्गों, सरदारों, और न्यायियों को बुलाओ। सबको। यहाँ, इसी खुले मैदान में।” उसकी आवाज़ में कंपन था, लेकिन आदेश स्पष्ट था। सेवक दौड़ पड़ा।
लोग इकट्ठा होने लगे। कोई धीरे-धीरे चलकर आया, कोई समूह बनाकर। कुछ के चेहरे पर उत्सुकता थी, कुछ पर चिंता। सब जानते थे कि यहोशू बहुत बूढ़ा हो चला है। उसका बुलाना कोई साधारण बात नहीं होगी। जब सभा काफी बड़ी हो गई, तो यहोशू ने अपने हाथ में एक लम्बी, पुरानी लाठी का सहारा लेकर धीरे से खड़े होने का प्रयास किया। पास खड़े एक युवा ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर यहोशू ने एक इशारे से मना कर दिया। उसे अपनी ताकत पर भरोसा था, या शायद इस बात पर कि जिस संदेश को वह देना चाहता है, उसे दुर्बलता की छवि के बिना ही देना चाहिए।
वह खड़ा हुआ। सबकी निगाहें उस पर टिक गईं। उसने गहरी साँस ली, और बोलना शुरू किया। आवाज़ शुरू में धीमी थी, गड्ढों में से रिसती हुई सी, फिर धीरे-धीरे मजबूत, स्पष्ट होती गई।
“तुम सबने देखा है… वह सब कुछ जो तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने तुम्हारे लिए किया है।” उसने अपना हाथ उठाकर उन सब ओर घुमाया जहाँ वे बसे हुए थे। “ये दाख की बारियाँ, जिनकी तुमने कटाई नहीं की। ये जैतून के बाग, जिन्हें तुमने नहीं लगाया। ये नगर, जो तुम्हारे लिए बनाए गए, भरे पड़े हैं उन चीजों से जो तुमने नहीं जमा कीं।”
कुछ लोग सिर हिलाने लगे, उनकी आँखों में कृतज्ञता थी। एक बुजुर्ग ने फुसफुसाते हुए अपने पोते से कहा, “सुन, बेटा, सच कह रहा है।”
“परमेश्वर ने तुम्हारे सामने से बड़े-बड़े राष्ट्रों को भगाया,” यहोशू की आवाज़ में एक नया जोश भर आया, जैसे वह फिर से उन लड़ाइयों में खड़ा हो। “तुम्हारे लिए लड़ा। एक व्यक्ति के सामने हज़ार भाग खड़े हों, तो भी तुम जीतोगे, क्योंकि तुम्हारे साथ यहोवा है। यह उसका वादा है।”
फिर उसके स्वर में एक तीखा पन आया। वह आगे झुका, उसकी नजर एक-एक चेहरे पर पड़ रही थी। “पर सावधान रहो। बहुत सावधान।” हवा जैसे थम सी गई। “उन बचे-खुचे राष्ट्रों के साथ कोई संधि मत करना। उनके देवताओं का नाम तक मत लेना। उनकी पूजा मत करना। उनकी ओर हाथ मत फैलाना।”
उसने एक ठहराव लिया। उसकी साँसें थोड़ी तेज चल रही थीं। “अगर तुम पीछे हटोगे, और उनसे मेल-मिलाप करोगे, तो जान लो… वही तुम्हारे लिए फन्दा और कोड़ा बन जाएंगे। तुम्हारी आँखों में काँटा और तुम्हारी बगल में छुरा। जब तक तुम इस देश में से उनका सफाया नहीं कर दोगे, तब तक तुम्हारे लिए चैन नहीं है।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। कुछ युवाओं के चेहरे पर अविश्वास का भाव था। क्या इतनी सख्ती जरूरी थी? वे तो बस शांति से रहना चाहते थे।
यहोशू ने उनके भाव पढ़ लिए। उसकी आवाज़ दर्द से भर गई। “मैं आज तुम सबके सामने जा रहा हूँ। सब मनुष्यों की तरह। तुम्हारा परमेश्वर यहोवा, वह तुम्हारे सामने से इन सब राष्ट्रों को नष्ट करेगा। तुम उनके देश को अपने अधिकार में ले लोगे, जैसे उसने वादा किया है।”
“पर याद रखो,” उसने अपनी लाठी जमीन पर पटकी, आवाज़ गूंज उठी। “एक बात का पक्का रहना। जिस तरह परमेश्वर के सारे अच्छे वादे पूरे हुए हैं, उसी तरह वह अपनी धमकियाँ भी पूरी करेगा। अगर तुमने उसकी वाचा को तोड़ा, जो उसने तुमसे बाँधी है… अगर तुम दूसरे देवताओं की ओर मुड़े और उनकी उपासना करने लगे… तो यहोवा का क्रोध तुम पर भड़केगा। और तुम इस उत्तम देश से शीघ्र नाश हो जाओगे, जो उसने तुम्हें दिया है।”
उसने फिर से सब पर नजर दौड़ाई। अब उसकी आँखों में आँसू थे, जो सूर्य की अंतिम किरणों में चमक रहे थे। “देखो, आज मैं स्वर्ग और पृथ्वी को साक्षी करके तुमसे कहता हूँ… तुमने अपने लिए अपने परमेश्वर यहोवा को चुना है, तो उसकी सेवा ईमानदारी और सच्चे मन से करना। उससे दूर मत होना। उससे प्रेम रखना। क्योंकि वही तुम्हारा सब कुछ है।”
इतना कहकर यहोशू चुप हो गया। उसकी शक्ति जैसे खत्म हो गई थी। वह धीरे से बैठ गया। कोई ताली नहीं बजी, कोई जय-जयकार नहीं हुई। बस एक गहरा, भारी मौन था, जिसमें हर व्यक्ति अपने मन में उन शब्दों को दोहरा रहा था। कुछ लोगों के माथे पर बल पड़ गए थे, कुछ ने अपने बच्चों को और पास खींच लिया था।
धीरे-धीरे, साँझ की लाली आकाश में फैलती गई और लोग चले गए। यहोशू अकेला बैठा रहा, उसकी नजर पश्चिम में डूबते सूरज पर टिकी थी। उसे मूसा की बातें याद आ रही थीं, यह नदी, वह जंगल। उसे एक आशंका थी, एक ऐसा डर जो उसकी अपनी मृत्यु से नहीं, बल्कि उस भविष्य से था जिसकी ओर वह देख पा रहा था। पर उसने अपना काम कर दिया था। चेतावनी दे दी थी। अब यह इन लोगों पर था कि वे किस मार्ग को चुनते हैं।
उसने एक लम्बी, थकी हुई साँस ली। हवा ठंडी होने लगी थी। दूर से, कहीं एक माँ अपने बच्चे को सुलाने के लिए कोमल स्वर में गीत गा रही थी। यह ध्वनि, यह सामान्य जीवन का संकेत, उसे अजीब सी शांति दे गया। उसने आँखें बंद कर लीं। उसकी प्रार्थना बिना शब्दों के, केवल एक चित्त की गहराई से निकली एक आह थी, जो बढ़ती हुई रात की निस्तब्धता में विलीन हो गई।




