यह उस अंतिम गर्मी की बात है, जब यरूशलेम की हवा में भी एक तरह की चीख़ समाई हुई थी। सूरज शहर की पथरीली दीवारों पर पड़ता, तो लगता मानो सोना नहीं, खून चमक रहा हो। राजा सिदकिय्याह का शासन, वह जो यहोवा की दृष्टि में बुरा काम करता था, अपनी आख़िरी सांसें गिन रहा था। नबूकदनेस्सर, बाबेल का वह महान और भयानक राजा, अपनी पूरी सेना लेकर शहर के सामने डटा था। उसका डेरा केवल एक शिविर नहीं, एक पूरा लोहबद्ध नगर था, जो धीरे-धीरे शहर के प्राणों का घेरा कस रहा था।
घेराबंदी के दिन लंबे होते गए। पहले तो अनाज के भंडार खाली हुए, फिर घरों के कोने-अतरे के दाने चुने गए। बच्चों का रोना धीमा पड़ गया, एक खोखली खाँसी में बदल गया। गली-गली में मौत की गंध फैल गई, वह गंध जो भूख और निराशा से पैदा होती है। फिर भी, शहर के दरवाज़े बंद रहे। सिदकिय्याह, डर और अहंकार के बीच फँसा, भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह की चेतावनियों को अनसुना करके, उस आख़िरी आशा से चिपका रहा कि शायद मिस्र की सेना आ जाए। पर मिस्र नहीं आया। केवल बाबेल की सेना आई, दिन-ब-दिन और मज़बूत, और और निर्मम।
फिर वह दिन आया – आख़िरी दीवार का टूटना। चौथे महीने के नौवें दिन, जब शहर की भूख एक जानवर की तरह हड्डियाँ चबा चुकी थी, तब शहर में भोजन बिलकुल समाप्त हो गया। एक भयानक ख़ामोशी छा गई, जो किसी भी युद्धचीत्कार से ज़्यादा डरावनी थी। और फिर… फिर दरवाज़े टूटे। बाबेल के सैनिक, लोहे और काँसे से लदे, एक उग्र बाढ़ की तरह शहर में घुस आए। उनकी तलवारों की आवाज़, पत्थर के मकानों से टकराते हुए, एक ऐसा संगीत थी जिसने यरूशलेम की सदियों की प्रार्थनाओं को दबा दिया।
राजा सिदकिय्याह, अपने सैनिकों के एक छोटे से दल के साथ, रात के अंधेरे में भाग निकला। वह राजमहल की गोपनीय निकासी से, शहर की दीवार के किनारे-किनारे सरकता हुआ, यरीहो के मैदानों की ओर भागा। उसकी सांसें फूल रही थीं, उसके कानों में अभी भी अपने महल के हॉल में बच्चों के रोने की गूंज थी। पर भाग्य ने उसका साथ नहीं दिया। बाबेल के सैनिकों ने उसे यरीहो के मैदानों में ही घेर लिया। उसके सारे साथी, उसके पुत्र, सब उसकी आँखों के सामने पकड़े गए। और फिर, एक छोटे से गाँव रब्ला में, जहाँ बाबेल का राजा डेरा डाले हुए था, सिदकिय्याह को उसके सामने लाया गया।
नबूकदनेस्सर के सामने खड़े होते ही, सिदकिय्याह की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। पहले तो उसके पुत्रों को, उसकी अपनी आँखों के सामने, वहाँ मार डाला गया। एक-एक करके। फिर… फिर राजा सिदकिय्याह की आँखें निकाल ली गईं। लोहे की गर्म सलाखों से। अंतिम चीख़ के साथ ही, उसकी दुनिया सन्नाटे और अँधेरे में डूब गई। उसे बेड़ियों से जकड़कर बाबेल ले जाया गया, जहाँ वह जेल में, उसी अनंत अँधेरे में, अपनी मृत्यु तक पड़ा रहा। उसकी आख़िरी याददाश्त उसके पुत्रों की चीख़ों की थी, और उसकी आख़िरी दृष्टि में बाबेल के राजा का निर्मम, लोहबद्ध चेहरा अटका रह गया।
इसके एक महीने बाद, बाबेल के प्रधान सेनापति नबूजरदान यरूशलेम आया। उसने आज्ञा दी, और उस महान नगर, जिस पर दाऊद और सुलैमान का गर्व था, जहाँ यहोवा का मंदिर खड़ा था, उसे जलाने का काम शुरू हुआ। राजमहल जला, यहोवा का भव्य मंदिर जला, हर बड़ा घर जला। आग की लपटें आकाश को चाट रही थीं, और धुआँ इतना घना था कि लगता था सूरज भी काला पड़ गया है। पत्थर चटखने की आवाज़, लकड़ी के गिरने का शोर, और उस सब के ऊपर, एक गहरी, दर्द से भरी ख़ामोशी।
फिर दीवारें गिराई गईं। चारों ओर की शहरपनाह, जो सदियों से शहर की रक्षा करती आई थी, उसे पत्थर दर पत्थर ढहा दिया गया। जो बचा, वह केवल एक धुँए से भरा, काला, टूटा हुआ ढाँचा था। मलबे के ढेर पर बैठे कौवे ही अब उसकी विजय गाथा गाते प्रतीत होते थे।
और लोग… हाँ, लोग। जो बचे थे, उनमें से अधिकांश को बंदी बनाकर बाबेल की ओर, उस लंबी, धूलभरी यात्रा पर धकेल दिया गया। उनके पैरों में बेड़ियाँ थीं, आँखों में एक सूनापन। वे पीछे मुड़कर देखते, तो अपने घर की जगह केवल आकाश में उठता काला धुआँ दिखता। केवल कुछ दरिद्र दाख़ की बारियों और खेतों में काम करने के लिए छोड़ दिए गए।
इस सब के बीच, मंदिर के वे पवित्र बर्तन, सोने-चाँदी के बड़े-बड़े पात्र, जो सुलैमान ने बनवाए थे… उन सबको तोड़ा गया, पिघलाया गया, और लूट के माल के रूप में बाबेल ले जाया गया। वह सोना, जो एक दिन परमपवित्र स्थान की ज्योति में चमकता था, अब एक विजेता राजा के खजाने की नीरस चमक बनकर रह गया।
कुछ लोगों ने विद्रोह करने की चेष्टा की। गदल्याह, जिसे बाबेल ने शहर पर नियुक्त किया था, की हत्या कर दी गई। डर के मारे, लोग मिस्र भाग गए। पर उनका भाग्य कहीं भी शांति नहीं लाया। वे अपने साथ उस टूटन और पलायन का दंश लेकर भागे, जो अब उनकी नियति बन चुका था।
और इस तरह यहूदा अपनी भूमि से निर्वासित हुआ। यरूशलेम की गलियाँ सूनी पड़ गईं, केवल हवा का सीटियन बजता रह जाता, पत्थरों के बीच से उग आए जंगली पौधों को हिलाता। वह मंदिर, जहाँ से एक दिन धूप की सुगंध और भजनों की ध्वनि उठती थी, अब केवल चार काले, जले हुए खंभों का ढाँचा था, जो एक सवाल की तरह आकाश की ओर देख रहे थे। यह दंड था, उन पीढ़ियों के पापों का, उनकी अवज्ञा का, उन झूठे देवताओं के पीछे भागने का। और इस सबके मध्य में, एक प्रश्न मौन था – क्या यहोवा ने सदा के लिए अपना मुँह फेर लिया था? या फिर इस राख के ढेर में भी, उसकी प्रतिज्ञा की एक कोपल दबी हुई थी, प्रतीक्षा कर रही थी? उत्तर किसी के पास नहीं था। केवल धूल थी, और स्मृतियाँ, और एक गहरा, गूँजता हुआ मौन।




