पवित्र बाइबल

दाऊद और परमेश्वर की वाचा

अरबों तारे यरूशलेम के ऊपर टिमटिमा रहे थे, जैसे चाँदी के छोटे-छोटे कीलों से भरा कोई विशाल नीला आसमानी कपड़ा टँगा हो। महल के ऊँचे कक्ष में, दाऊद बैठा था, पर उसकी आत्मा बैठी नहीं थी। दिन भर के राजकाज, फैसलों, और प्रार्थना से उत्पन्न एक अजीब सी बेचैनी उसे सताए जा रही थी। उसने अपने चारों ओर देखा – दीवारों पर लबालब लटके हथियार, एदोम और मोआब से लाए गए बहुमूल्य कालीन, खिड़की से दिखती उसकी राजधानी की छतें। वह सेदर के दृढ़ लकड़ी के सिंहासन पर विराजमान था, जिस पर बैंगनी रंग के मुलायम आसन बिछे थे। उसके हाथ ने सिंहासन की बाँह को थपथपाया, जैसे कोई धन्यवाद दे रहा हो।

पर भीतर एक चुभन थी।

उसकी नज़र दक्षिण-पूर्व की ओर उस ढलान पर गई, जहाँ शहर की दीवार के पास, गिदोन के खलिहान के पुराने चबूतरे पर, एक खटिया पड़ी थी। वहीं पर, इस्राएल का सन्दूक, परमेश्वर की महिमा का प्रतीक, एक तम्बू के नीचे रखा था। एक तम्बू! जबकि उसका, दाऊद का, महल देवदार की लकड़ी से बना हुआ था, जिसकी छत पर फ़िनीके के कारीगरों ने शानदार नक्काशी की थी। एक तीखा विरोधाभास उसे कचोट रहा था।

“नातान,” उसने धीरे से पुकारा। प्रोफेती, जो कोने में एक दीपक की मंद रोशनी में कुछ पढ़ रहा था, उठकर आया। उसकी आँखों में सदैव एक गहरी शांति और समझदारी रहती थी, जैसे वह किसी गहरे कुएँ के तल की बात जानता हो।

“हे मेरे प्रभु राजा?” नातान ने कहा।

दाऊद ने खिड़की की ओर इशारा किया। “देखो, नातान। मैं देवदार के इस महल में रहता हूँ… और परमेश्वर का सन्दूक अभी भी उस तम्बू के नीचे है, जिसके खम्भे जर्जर हो रहे हैं, जिसके कपड़े धूप और वर्षा से फट गए हैं। यह उचित नहीं लगता।”

उसकी आवाज़ में अपराधबोध नहीं, बल्कि एक तीव्र इच्छा थी। वह उठ खड़ा हुआ, उसकी छाती चौड़ी थी, वह आदमी जिसने गोलियत का सामना किया था, जिसने इस्राएल के सारे शत्रुओं को धूल चटाई थी। “मैं उसके लिए एक भवन बनाऊँगा। एक ऐसा महल, जो उसकी महिमा के योग्य हो। संगमरमर से, सोने से, नीले, बैंगनी और लाल कपड़ों से सजा हुआ। लबानोन के सबसे उत्तम देवदार से उसकी छत होगी। मैं स्वयं इसका नक्शा बनाऊँगा। क्या यह अच्छा नहीं होगा?”

नातान ने दाऊद के चेहरे पर उस उत्साह को देखा, जो उसके सारे सैनिक अभियानों में दिखता था। वह मुस्कुराया। “जाओ, वह सब करो जो तुम्हारे मन में है,” उसने कहा, “क्योंकि यहोवा तुम्हारे साथ है।”

उस रात, जब यरूशलेम सो रहा था और केव� रखवालों के कदमों की आहट और दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज़ हवा में तैर रही थी, नातान के पास एक वचन आया। यह कोई दर्शन नहीं था, न ही आकाश चीरती कोई आवाज़। यह उसके भीतर एक ज्ञान की भाँति उतरा, स्पष्ट और अटल, जैसे पहाड़ों की जड़ें। उसे पता चल गया कि दाऊद की योजना, हालाँकि भली थी, परमेश्वर की योजना नहीं थी।

अगले दिन, वह फिर दाऊद के सामने खड़ा था। राजा ने पहले ही कागजों पर रेखाएँ खींचनी शुरू कर दी थीं, सेनापतियों से पत्थरों की खदानों के बारे में पूछ रहा था। नातान का चेहरा गंभीर था।

“हे राजा,” उसने कहा, और उसकी वाणी में एक नया, दृढ़ स्वर था, “सुनो यहोवा का वचन।”

दाऊद ने अपनी कलम रख दी। कमरे की हवा जैसे स्थिर हो गई।

“क्या तुम मेरे लिए एक घर बनाने को कहते हो? सारे इस्राएल के चरवाहे के रूप में, क्या मैंने कभी किसी न्यायाधीश से पूछा, ‘मेरे लिए एक देवदार का घर क्यों नहीं बनवाया?’” नातान की आवाज़ में एक कोमल तान थी, जैसे कोई बुजुर्ग बच्चे को समझा रहा हो। “मैंने तुम्हें भेड़ों के बाड़े से लिया, तुम्हें अपनी प्रजा इस्राएल का अगुआ बनाया। मैं तुम्हारे साथ रहा, हर उस शत्रु को काट डाला जिसका तुमने सामना किया। मैं तुम्हारा नाम उस भूमि के महान लोगों के नाम के समान करूँगा।”

दाऊद साँस रोके सुन रहा था। उसकी महत्वाकांक्षी योजनाएँ धुँधली पड़ने लगीं।

“और मैं इस्राएल के लिए एक स्थान ठहराऊँगा, उसे अपनी जगह पर बसाऊँगा,” नातान ने आगे कहा, और उसकी आँखें दूर, किसी अदृश्य क्षितिज को देख रही थीं। “अब तक के दिनों के विपरीत, दुष्ट लोग उसे फिर कभी न सताएँगे। मैं तुम्हें तुम्हारे सभी शत्रुओं से विश्राम दिलाऊँगा।”

फिर वह बात आई, जिसने दाऊद के हृदय को जकड़ लिया। “यहोवा तुम्हें बताता है कि वह तुम्हारे लिए एक घर बनाएगा।”

दाऊद की साँस रुक गई। ‘मेरे लिए एक घर?’ उसने सोचा। क्या यह कोई महल था? नहीं।

“जब तुम्हारे दिन पूरे हो जाएँगे और तुम अपने पूर्वजों के साथ सो जाओगे,” नातान ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक दुख भरी मिठास घुल गई, “मैं तुम्हारे बाद तुम्हारी सन्तान को, जो तुम्हारे ही अंगों से उत्पन्न होगी, उत्पन्न करूँगा। और मैं उसके राज्य को दृढ़ करूँगा। वही मेरे नाम का एक घर बनाएगा, और मैं उसके राज्य के सिंहासन को युग युग के लिए दृढ़ करूँगा।”

शब्द हवा में लटके रहे – ‘युग युग के लिए’। दाऊद की आँखों के सामने उसका स्वयं का महल, उसकी योजनाएँ, सब धूल हो गईं। उसके स्थान पर एक दृष्टि उभरी – एक सिंहासन, उसके वंश का, जो समय की रेती पर अमिट अक्षरों की तरह खड़ा रहेगा। यह उसकी इमारत नहीं थी। यह परमेश्वर की योजना थी। उसकी वाचा।

“मैं उसका पिता होऊँगा, और वह मेरा पुत्र होगा,” नातान ने कहा, और ये शब्द दाऊद के कानों में मधुर संगीत की तरह बजे। “जब वह कुकर्म करेगा, तो मैं मनुष्यों की छड़ी और मनुष्यों के कोड़ों से उसे दण्ड दूँगा। परन्तु मेरी करुणा तुमसे वैसे ही न हटेगी, जैसे मैंने शाऊल से हटा ली, जिसे तुम्हारे सामने से दूर किया। तुम्हारा घर और तुम्हारा राज्य मेरे सामने सदैव बना रहेगा। तुम्हारा सिंहासन युग युग के लिए अटल रहेगा।”

जब नातान बोल चुका, तो कक्ष में गहरी शांति छा गई। दीवार पर टँगी एक तलवार से पड़ने वाली सूरज की किरण धीरे-धीरे खिसक रही थी। दाऊद उठा। उसके पैर उसे तम्बू की ओर ले गए, उसी तम्बू की ओर जिसके लिए वह एक भव्य मन्दिर बनाना चाहता था। पर अब उसकी नज़र में अहंकार नहीं, बल्कि एक गहरा, चकित आदर था।

वह सन्दूक के सामने जाकर भूमि पर मुँह के बल गिर पड़ा। उसकी प्रार्थना किसी सिद्ध स्तोत्र की तरह नहीं, बल्कि टूटे-फूटे, हिचकिचाते शब्दों में निकली, जैसे कोई बच्चा अपने पिता से बात कर रहा हो।

“हे सारे संसार के स्वामी यहोवा, मैं कौन हूँ, और मेरा कुल क्या है, कि तू मुझे इस स्थान तक पहुँचाए? और यह तेरी दृष्टि में बहुत छोटी बात भी न थी, हे सारे संसार के स्वामी यहोवा, कि तू ने तो अपने दास के घराने के विषय में दूरवर्ती बातें भी कह दीं… तू ही महान है, हे यहोवा परमेश्वर, क्योंकि तेरे समान कोई नहीं, और तेरे सिवा कोई परमेश्वर भी नहीं…”

उसकी आवाज़ भर्रा गई। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे, जो धूल भरी जमीन पर गिरकर गोले बनाने लगे। वह राजा था, पर इस क्षण वह केवल एक विस्मित, कृतज्ञ मनुष्य था। उसकी योजना नकार दी गई थी, पर उसे जो वादा मिला था, वह उसकी सभी कल्पनाओं से बड़ा था। एक घर नहीं, बल्कि एक वंश। एक सिंहासन जो अनन्त काल तक चलेगा।

शाम होने लग

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