पवित्र बाइबल

आसा: विश्वास और भय की द्वंद्व कथा

यहूदा के राज्य में अबीराम के बाद उसका पुत्र आसा राजा बना। वह यरूशलेम में बैठा, और उसने एक चालीस वर्ष तक राज किया। पर ये वो चालीस वर्ष नहीं थे जिनमें शांति और सुख-सुविधा बरसी हो। नहीं, ये तो वो दिन थे जब राजा का हर सुबह उठना, हर रात का सोना, सियासी षड्यंत्रों, सीमा पर धूल उड़ाते शत्रुओं, और अपने ही घराने के अंदर के झगड़ों से घिरा रहता था।

उसकी दादी, माका, उसने तो एक अशेरा की मूर्ति बनवा रखी थी। वही देवता जिसके नाम पर बाल देवता की पूजा होती, जंगलों में अश्लील उत्सव मनाए जाते। यरूशलेम के एक ऊंचे टीले पर वह घृणित स्तंभ खड़ा था, लकड़ी का बना हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा। आसा को याद आता, कैसे बचपन में उसकी दादी उसे अपने पास बुलाती और उस मूर्ति के सामने झुकने के लिए कहती। पर उसके मन में एक अलग ही आग जलती थी। उसके पिता और दादा ने जो गलत किया था, उसे सुधारने की एक तीव्र, अधीर इच्छा।

तो एक दिन, जब राज्य की बागडोर उसके हाथों में ठीक से आई, उसने फैसला किया। उसने नगर के बुजुर्गों को बुलवाया, सेनापतियों को इकट्ठा किया, और आदेश दिया। वह स्तंभ, वह अशेरा की मूर्ति, उसे काटकर गिरा दिया जाए। और सिर्फ इतना ही नहीं, उसने उस मूर्ति को किड्रोन की घाटी में ले जाकर जला डालने का हुक्म दिया। लोग हैरान थे। दादी के विरुद्ध यह कैसा साहस? पर आसा डटा रहा। उसकी दादी माका को उसने राजमाता के पद से हटा दिया। कहते हैं, उस रात किड्रोन की घाटी में आग की लपटें ऐसी उठीं, मानो स्वर्ग से कोई न्याय की ज्वाला उतर रही हो। धुंआ दूर-दूर तक फैला, और लोगों के मन में एक भय मिश्रित श्रद्धा जागी।

और फिर उसने उन मन्दिर वेश्याओं को भी देश से निकाल बाहर किया, जो पिछले राजाओं के दिनों से ही पनप रही थीं। उसने अपने पिता द्वारा बनवाए गए सभी मूर्ति-स्थल ढहवा दिए। वह यहोवा की दृष्टि में ठीक काम करने की कोशिश कर रहा था, दाऊद की तरह। हां, पर दाऊद जैसा हो पाना कितना कठिन था। दाऊद का हृदय पूर्णतः परमेश्वर के प्रति नतमस्तक था, पर आसा के अपने हृदय में अभी भी संसार की चिंताएं घर किए हुए थीं।

उत्तर में, इस्राएल का राज्य बसा हुआ था। वहां नादाब के बाद बाशा राजा बना था। बाशा, वह हमेशा यहूदा की ओर ललचाई निगाहों से देखता। दोनों राज्यों के बीच का तनाव हवा में तैरता रहता। आसा ने सोचा, क्यों न अराम के राजा बेन्हदद से मित्रता कर ली जाए, जो दमिश्क में बैठा था? पर यह मित्रता, क्या यहोवा पर भरोसे की कमी नहीं दर्शाती थी? आसा ने फिर भी यही किया। उसने राजकोष के चांदी-सोने से भेंट भेजी बेन्हदद के पास, और कहला भेजा, “हमारे बीच संधि हो, जैसे हमारे पिताओं के बीच थी। और कृपया इस्राएल के राजा बाशा से अपनी संधि तोड़ लो, ताकि वह मेरे पीछे पड़ा रहे तो मैं उसे खदेड़ सकूं।”

बेन्हदद ने सुन लिया। उसने अपनी सेनाएं भेजीं, और उन्होंने इस्राएल के उत्तरी शहरों पर, इय्योन, दान, आबेल-बेत-माका पर चढ़ाई कर दी। बाशा घबरा गया। उसे पीछे हटना पड़ा, और रामा को बनाने का अपना काम छोड़कर तिरसा लौट गया। आसा को मौका मिल गया। उसने पूरे यहूदा में ऐलान करवा दिया, “कोई भी आदमी न रुके। सब लोग आएं और रामा के उन पत्थरों और लकड़ियों को, जो बाशा ने जमा किए थे, उठा लाएं।” और लोगों ने ऐसा ही किया। उन पत्थरों और काठ से उसने गबा और मिस्पा नगरों के किलेबंदी की। यह एक जीत थी, एक रणनीतिक सफलता। पर क्या यहोवा को यह पसंद आया?

उसी समय, एक भविष्यद्वक्ता, हनानी का पुत्र यहूदी आसा के पास पहुंचा। वह बूढ़ा था, उसकी आंखों में एक अलग ही चमक थी। उसने आसा से कहा, “तूने अराम के राजा पर भरोसा किया, और इस्राएल के राजा से बचने के लिए यहोवा परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया। क्या अराम की सेना यहोवा की सेना नहीं है? उसने तुझे कुश केियों और लूबियों के विरुद्ध जीत दी थी। यहोवा की आंखें सारी पृथ्वी पर इसलिए फिरती हैं कि जो कोई उसके प्रति खरा रहता है, उसकी सहायता करे। तूने इस बार मूर्खता की है। इसलिए अब से तुझे युद्ध ही युद्ध झेलने पड़ेंगे।”

आसा क्रोध से भर गया। उस भविष्यद्वक्ता की बात उसे चुभ गई। सच में, वह डर गया था बाशा से, और उसने परमेश्वर के बजाय एक मनुष्य का सहारा लिया था। पर अपने इस डर को, इस अपराधबोध को, उसने क्रोध में बदल दिया। उसने यहूदी को कठोर कारावास में डलवा दिया। और कुछ प्रजा के लोगों को भी, जो शायद भविष्यद्वक्ता का पक्ष लेते दिखे, उसने दंडित किया। वही आसा जिसने अशेरा की मूर्ति तोड़ी थी, अब सच्ची बात कहने वाले को जेल में डाल रहा था।

उसके जीवन के अंतिम दिन… वे कितने भिन्न थे। उसके पैरों में कोई भयंकर रोग लग गया। वैद्य आते, मलहम-पट्टी करते, पर कोई लाभ नहीं होता। दर्द इतना तीव्र कि रातों की नींद हराम हो गई। और इस विपत्ति में भी, उसने यहोवा की खोज नहीं की, वरन वैद्यों पर ही भरोसा किया। कितनी विडंबना थी। जिसने अपने राज्य को मूर्तियों से साफ किया, वही अब अपने शरीर के रोग में परमेश्वर के पास नहीं आया।

और फिर वह दिन आया जब आसा सो गया अपने पुरखाओं के साथ। उसे दाऊद नगर में, उसी कब्र में दफनाया गया जो उसने अपने लिए खुदवाई थी। लोगों ने उसके लिए बहुत सा गंधद्रव्य जलाया, एक राजा के योग्य। उसका पुत्र यहोशापात राजा बना।

उत्तर में, इस्राएल में, बाशा का अंत कुछ और ही था। वह तिरसा में रहता था, और उसने भी यहोवा की दृष्टि में बुरा किया। नबात के पुत्र यारोबाम के पापों में वह भी चलता रहा, और इस्राएल को भी पाप में चलाया। तब यहूदी नबी यहू का वचन उसके पास पहुंचा, “मैंने तुझे धूल से उठाकर अपनी प्रजा इस्राएल का अधिपति बनाया, पर तू यारोबाम के मार्ग पर चलता रहा। इसलिए देख, मैं बाशा और उसके घराने का सफाया कर डालूंगा।” और ऐसा ही हुआ। जब बाशा मरकर सो गया, उसका पुत्र एला राजा बना। पर उसके राज्य के केवल दो वर्ष ही पूरे हुए थे कि उसके अपने ही सेनापति जिम्रि ने उसके पीने के मदिरालय में ही उसे मार डाला, और सारे परिवार का वध कर डाला। यहोवा का वचन, यहू के मुख से निकला, पूरा हुआ।

दो राज्य, दो राजा, दो कहानियां। आसा का हृदय आरंभ में परमेश्वर के प्रति खरा था, पर अंत में उसमें भरोसे की कमी रह गई। बाशा तो आरंभ से अंत तक पाप में डूबा रहा। और यरूशलेम की दीवारों पर सूरज डूबता, तो लाली फैलाता, मानो खून के धब्बे हों। राजा आते-जाते रहे, परमेश्वर का वचन टलता नहीं था। वह एक पत्थर की लकीर की तरह था, जिस पर राजाओं की महत्वाकांक्षाएं और भय, टकराकर चूर-चूर हो जाते थे। और नबियों की आवाजें, कभी कोमल, कभी कठोर, हवा में गूंजती रहतीं, शायद किसी के कान उन्हें सुनने के लिए तैयार होते।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *