पवित्र बाइबल

योशिय्याह का महान फसह

यरूशलेम की सुबह थी, और ऊषा की पहली किरणें मंदिर के सफेद पत्थरों पर पड़ रही थीं, जैसे स्वर्ग की ओर से एक कोमल स्पर्श। हवा में बसंत की सुगंध थी, और जैतून के पेड़ों के पत्ते हल्के से सरसरा रहे थे। राजा योशिय्याह मंदिर के आँगन में खड़ा था, उसकी आँखों में एक गहरी संकल्पशील चमक। उसके चारों ओर लेवीय इकट्ठा थे, उनके चेहरे गंभीर थे, यह जानते हुए कि आज का दिन कोई साधारण दिन नहीं है। वर्षों बाद, एक ऐसा फसह मनाने का समय आया था, जैसा शमूएल भविष्यद्वक्ता के दिनों में भी नहीं मनाया गया था।

योशिय्याह ने अपनी आवाज़ उठाई, जो आँगन में गूंज गई। “पवित्र सन्दूक को अब इस आँगन में न रखो,” उसने लेवीयों से कहा, जो परमेश्वर की सेवा के लिए अभिषिक्त थे। “अपने-अपने पितरों के घरानों के अनुसार अपने आप को अभिषिक्त करो, और इस्राएल के परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार फसह का मेम्ना तैयार करो।” उसकी आवाज़ में एक तरह का विश्वास था, एक ऐसी निश्चितता जो सालों के ध्यान और व्यवस्था की पुस्तक की खोज से पैदा हुई थी।

फिर क्या था, एक असाधारण सक्रियता छा गई। लेवीय, जो दाऊद और शलोमोन के समय से अपने-अपने दलों में विभाजित थे, एक सुव्यवस्थित ढंग से चल पड़े, मानो एक विशाल दैवीय यंत्र के पुर्जे हों। हिल्किय्याह, जकर्याह और यहीएल जैसे प्रधान याजक आगे बढ़े। उन्होंने अपने हाथों में उन चाकुओं को संभाला, जो केवल पवित्र सेवा के लिए थे। मंदिर के विशाल आँगन में, लेवीयों ने फसह के मेम्नों को उतारना शुरू किया। रक्त की गंध हवा में मिल गई, पर वह गंध बलिदान की गंध थी, प्रायश्चित की, एक पुरानी वाचा की याद दिलाती।

पर योशिय्याह ने केवल आदेश देकर छोड़ नहीं दिया। वह स्वयं सबके बीच में था। उसने अपने राजकोष से हज़ारों मेम्ने और बछड़े निकाले। तीन हजार बछड़े, और सैंतीस हज़ार भेड़-बकरियाँ… ये संख्याएँ केवल लिखी हुई बातें नहीं थीं। आँगन में उन जानवरों की मुँझरे की आवाज़, चमड़े की सरसराहट, और लेवीयों के फुर्तीले हाथों की चाल – सब कुछ एक जीवन्त तस्वीर बना रहे थे। याजक लगातार काम कर रहे थे, उनके वस्त्र रक्त से तर हो गए थे, पर उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक अद्भुत उत्साह था। वे जानते थे कि यह सेवा है, यही उनकी विरासत है।

और फिर वह क्षण आया जब लेवीयों ने मेम्नों का मांस तैयार किया, और उसे सारे सामान्य लोगों में, उन सबके लिए जो वहाँ एकत्र हुए थे, बाँट दिया। यह केवल एक रस्म नहीं थी। यरूशलेम की गलियों से, यहूदा और इस्राएल के गाँवों से आए हज़ारों लोग वहाँ जमा थे। बूढ़े, जवान, बच्चे – सबकी आँखों में एक ही प्रश्न था: क्या यह वही फसह है, जिसके बारे में हमारे बुजुर्ग सुनाते थे? जब लेवीयों ने उनके हाथों में उबला हुआ, पवित्र किया हुआ मांस दिया, तो एक सामूहिक आह निकली। कई लोगों की आँखें नम हो गईं। यह भोजन नहीं था, यह स्मरण था। मिस्र से छुटकारे की रात का, बादल के खम्भे और आग के खम्भे का, और यहोवा की महान शक्ति का स्मरण।

पूरे सात दिन तक उत्सव चला। मंदिर के आँगन में लगातार भजन गूंजते रहे। लेवीयों के सारंगी, वीणा और झाँझ की ध्वनि हवा में तैरती रही। याजकों ने बिना रुके बलिदान चढ़ाए। और लोगों ने खाया, प्रार्थना की, और अपने परमेश्वर की स्तुति की। राजा योशिय्याह ने सब कुछ देखा। वह एक कोने में खड़ा होकर मंदरवार की ओर देखता, उस पत्थर की नक्काशी को निहारता जिसे उसके पूर्वज शलोमोन ने बनवाया था। उसके मन में शांति थी, पर एक गहरी उदासी भी छिपी थी। वह जानता था कि यह उज्ज्वल क्षण, यह एकता, यह आनन्द स्थायी नहीं होगा। उसके लोगों के हृदय अभी भी चंचल थे। पर आज के लिए, इस क्षण के लिए, सब कुछ सही था।

इतिहासकार बाद में लिखेंगे कि शमूएल के दिनों के बाद से, किसी ने इस तरह का फसह नहीं मनाया। न ही किसी राजा ने इतनी ईमानदारी से, इतने सम्पूर्ण हृदय से, यहोवा की व्यवस्था का पालन किया। पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उत्सव के बाद, जब यरूशलेम फिर से अपनी दिनचर्या में लौटने लगा, तो योशिय्याह के मन में एक बेचैनी घर कर गई। वह जानता था कि उत्तर में, मिस्र का राजा फिरौन नेको शक्ति संग्रह कर रहा था। और भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह की चेतावनी की बातें उसे याद आती रहती थीं। फसह का उत्सव एक शिखर था, पर शिखर के बाद ढलान आती है। उसकी मृत्यु, मगिद्दो के मैदान में, एक दुखद विडम्बना होगी – एक ऐसा राजा जिसने परमेश्वर की आराधना को पुनर्जीवित किया, पर अपने लोगों के भाग्य को टाल न सका।

पर उस दिन, जब सूरज डूब रहा था और मंदिर के दीपक जल उठे थे, तो केवल आनन्द था। लोग थके हुए, पर तृप्त थे। लेवीयों ने अपने वस्त्र बदले, और आँगन की सफाई शुरू की। राख और लकड़ी के ढेर इकट्ठे किए गए। एक सन्नाटा छा गया, जो उत्सव के शोर के बाद और भी गहरा लगता था। योशिय्याह ने अंतिम प्रार्थना की, और अपने महल की ओर चल पड़ा। पीछे मंदिर का सुनहरा गुंबद, अब अस्त होते सूरज की लालिमा में नहा रहा था, मानो स्वयं परमेश्वर की मुस्कान हो। यह एक पल था, जो सदियों तक याद रखा जाएगा – एक ऐसा फसह, जब यरूशलेम ने सच में, अपने सम्पूर्ण हृदय से, यहोवा को याद किया।

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