यरूशलेम की वह पहाड़ी, जहाँ कभी अरावना का खलिहान हुआ करता था, अब एक अद्भुत चहल-पहल से गूंज रही थी। हजारों कारीगर, राजगीर, लुहार और बढ़ई दिन-रात काम में जुटे थे। राजा सुलैमान स्वयं प्रतिदिन आता, चुपचाप खड़ा होकर निर्माण को देखता, और मन ही मन उस वाचा का स्मरण करता जो उसके पिता दाऊद और परमेश्वर के बीच बनी थी। यह भवन केवल पत्थर और लकड़ी का ढांचा नहीं था; यह एक प्रतिज्ञा की पूर्ति थी, स्वर्ग और पृथ्वी के मिलन का एक स्थान बनने जा रहा था।
निर्माण का आरंभ वसंत के उस दिन हुआ था जब सूर्य की किरणें मोरियाह पर्वत की चट्टानों पर सोना बिखेर रही थीं। सुलैमान ने पहला आधारशिला रखी थी। माप के अनुसार, मंदिर की लम्बाई साठ हाथ, चौड़ाई बीस हाथ थी। पर इन संख्याओं से कहीं अधिक था वह विश्वास जो उसकी नींव में गड़ा था। देश-देशांतर से चुन-चुन कर लाए गए विशाल, सफेद पत्थरों को तराशा जा रहा था। उन पर हथौड़ों की चोट से निकलने वाली ध्वनि एक अजीब सी लय बनाती थी, मानो कोई विशाल वाद्य यंत्र बज रहा हो।
और फिर सोना आया। केवल सोना ही नहीं, बल्कि पर्वतों से निकला शुद्ध सोना। जब उन पत्तरों को धूप में रखा जाता, तो आँखें चौंधिया जातीं। कारीगर उन्हें पीटते, उन पर बारीक नक्काशी करते – डेलियों, फूलों और अनारों के चित्र। मुख्य कक्ष, जिसे वे ‘बेत हखाल’ कहते थे, उसकी दीवारें, छत, यहाँ तक कि फर्श भी सोने से मढ़ दिया गया। अंदर प्रवेश करते ही सब कुछ एक पीली, गर्म चमक से भर जाता, ऐसा लगता मानो सूर्य स्वयं वहाँ निवास करता हो।
लेकिन मंदिर का हृदय तो वह पवित्रस्थान था, ‘दबीर’। बीस हाथ लम्बा, बीस हाथ चौड़ा – एक पूर्ण घन। उसकी दीवारों पर सोने के साथ-साथ कीमती पत्थर जड़े गए। बैंगनी, लाल और नीले रंग के सूत से बने पर्दे, जिन पर करूबों के चित्र कढ़े थे, उस स्थान को और भी गूढ़ बना देते थे। और फिर वे दो करूब। उनकी कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देती थी। जैतून की लकड़ी से तराशे गए उन विशाल प्राणियों के पंखों का फैलाव बीस हाथ था। एक का एक पंख एक दीवार को छूता, दूसरा पंख बीच में दूसरे करूब के पंख से मिलता। वे अपने पंख फैलाए परमपवित्र सन्दूक को ढके रहते, एक निरंतर, शांत, भव्य पहरा।
सुलैमान कभी-कभी रात के समय वहाँ आता, दीपक की टिमटिमाती लौ में उन करूबों की छाया को दीवारों पर नाचते देखता। एक गहन विश्वास उसे भर देता कि यह स्थान खाली नहीं रहेगा। यहाँ वह महिमा उतरेगी जो कभी मूसा के मिलाप के तम्बू में रहा करती थी।
मंदिर के सामने उसने दो ऊँचे स्तम्भ खड़े किए – याकीन और बोअज। कल्पना करो, तैंतीस हाथ ऊँचे काँसे के ये स्तम्भ, जिनके शीर्ष पर सुंदर कमल के आकार की राजमुकुटें सजी थीं। वे केवल स्तम्भ नहीं थे; वे साक्षी थे – एक इस्राएल की स्थिरता का, दूसरा परमेश्वर की शक्ति का।
महीनों की कठिन परिश्रम, धूल, स्वेद और प्रार्थना के बाद वह दिन आया जब पर्दा लटकाया गया, अंतिम पत्थर जड़ा गया, आखिरी सोने का पत्तर चमकाया गया। सुलैमान ने निर्माण स्थल के बीचोंबीच खड़े होकर चारों ओर देखा। यह वह मंदिर था जिसका स्वप्न उसके पिता ने देखा था। हवा में लकड़ी की सुगंध, धातु की चमक और पत्थर की ठंडक एक अद्भुत मिश्रण बनाती थी। उसने आँखें बंद कर लीं। सन्नाटे में भी यह स्थान गूंज रहा था – हथौड़ों की स्मृति से, कारीगरों के गीतों से, और उस अनकही प्रतीक्षा से कि अब इस स्थान को उसकी उपस्थिति से भरना है।
पर्वत की चोटी पर बना वह भवन सूर्यास्त के समय एक अलौकिक आभा से जगमगा उठा। यह केवल एक इमारत नहीं थी। यह एक प्रार्थना थी, पत्थर, लकड़ी और सोने में ढली हुई। एक ऐसा निवास स्थान जहाँ पृथ्वी स्वर्ग से मिलने को बेकरार थी।




