शहर शूशन सुबह की नरम धूप में नहाया हुआ था। महल के आँगन में चहल-पहल थी, पर रानी एस्तेर के कक्ष में एक गहरी शांति पसरी हुई थी। खिड़की से आती रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जो थकान से भरी थी, पर आँखों में एक नई दृढ़ता थी। वह उस कागज को देख रही थी जो राजा अहश्वेरोश ने हमन के घर से मोर्दकै को दिया था। वह कागज, जिस पर हमन की मुहर लगी थी, अब बेकार पड़ा था। पर एस्तेर जानती थी कि सिर्फ एक दुष्ट की मौत से उसकी प्रजा की मुसीबत खत्म नहीं हुई थी। फरमान तो जारी था – तेरहवें दिन के आने तक सारे सूबों में यहूदियों के खात्मे का फरमान, राजा की मुहर से मंजूर।
उसने एक गहरी सांस ली। अब भी डर था। कल रात भर वह जागती रही थी, अपने लोगों के चेहरे याद करते हुए – वे चेहरे जो आने वाले विनाश से बेखबर, या फिर बेहद खबर होकर, दर-दर भटक रहे होंगे। उसने अपनी दासियों से कुछ न कहा। वह जानती थी कि आज फिर राजा के सामने जाना होगा। वह पहले की तरह साधारण वस्त्रों में नहीं, बल्कि राजसी परिधान में तैयार हुई, मानो यह उसकी प्रजा के गौरव का प्रतीक हो।
दरबार लगा हुआ था। राजा अहश्वेरोश सिंहासन पर विराजमान थे। उनकी नजर एस्तेर पर पड़ी, जो द्वार पर खड़ी थी। पिछली बार की तरह इस बार भी उन्होंने सोने का राजदंड बढ़ा दिया। एस्तेर ने आगे बढ़कर उसे छुआ। राजा की आँखों में एक अलग ही चमक थी – शायद हमन के कुकर्मों का पता चलने के बाद का पछतावा, या फिर एस्तेर के प्रति बढ़ा हुआ सम्मान।
“क्या चाहता है तू, रानी एस्तेर?” राजा ने पूछा, “तेरी कोई भी मांग पूरी की जाएगी, आधा राज्य भी।”
एस्तेर का स्वर भरा हुआ था, पर वह स्पष्ट था। “यदि राजा को यह उचित लगे, और यदि मैंने उसकी दृष्टि में अनुग्रह पाया है, तो एक निवेदन है। कृपा करके हमन के उस फरमान को, जो उसने यहूदियों को नष्ट करने के लिए लिखवाया था, रद्द कर दिया जाए। मैं यह कैसे सह सकती हूँ कि मेरे ही लोगों का विनाश देखूं? मैं यह कैसे सहन करूंगी कि मेरे कुटुम्बियों का सफाया हो जाए?”
राजा कुछ पल चुप रहा। उसने मोर्दकै की ओर देखा, जो अब राजकीय वस्त्र पहने, दरबार में खड़ा था। हमन का स्थान अब खाली था, और मोर्दकै ने उसकी जगह ले ली थी। राजा ने कहा, “देख, हमन का घर तो मैंने एस्तेर को दे दिया है, और हमन को फाँसी पर लटका दिया गया है, क्योंकि उसने राजा के लोगों पर हाथ उठाया। अब तुम लोग स्वयं ही यहूदियों के विषय में राजा के नाम से कुछ लिखो, जैसा तुम्हें अच्छा लगे, और राजा की मुहर से उसे मुकरर कर दो। क्योंकि राजा के नाम से लिखा हुआ, और राजा की मुहर से मुकरर किया हुआ लेख, कोई नहीं बदल सकता।”
यह एक अद्भुत समाधान था। पुराना फरमान तो अटल था, पर एक नया फरमान जारी किया जा सकता था जो यहूदियों को अपनी रक्षा करने का अधिकार दे। मोर्दकै ने एस्तेर की ओर देखा। उसकी आँखों में एक आभार और विश्वास था। अब उनकी जिम्मेदारी बनती थी कि वे ऐसा ही करें।
उसी दिन, तीसरे महीने के तेईसवें दिन, राजा के कारिन्दों को बुलाया गया। मोर्दकै ने स्वयं आज्ञापत्र लिखवाया। उसकी आवाज में एक नया सा गर्व था, वह गर्व नहीं जो अहंकार से आता है, बल्कि वह गौरव जो परमेश्वर के समय पर हस्तक्षेप से आता है। उसने हर सूबे के लिए उनकी अपनी भाषा और लिपि में, और यहूदियों के लिए उनकी भाषा और लिपि में फरमान लिखवाए।
लेख में लिखा गया कि राजा अहश्वेरोश ने यहूदियों को अधिकार दिया है कि वे हर नगर में इकट्ठे होकर, अपना प्राण बचाएं, और उन सभी लोगों को, जो उन्हें डराना या हानि पहुँचाना चाहें, उनकी स्त्रियों और बच्चों सहित मार डालें और लूट लें। यह दिन, अदार माह के तेरहवें दिन, नियत किया गया। एक तरह से, वही तारीख जो हमन ने चुनी थी, अब न्याय और रक्षा का दिन बन गई थी।
दूत, राजा के तेज घोड़ों पर सवार होकर, हर दिशा में दौड़ पड़े। फरमान शहर शूशन के चौराहे पर भी जारी किया गया। मोर्दकै ने नीले और सफेद राजकीय वस्त्र पहने, सिर पर सोने का एक बड़ा मुकुट और बैंजनी रेशम का एक चोगा ओढ़े, शहर में निकला। शूशन के लोग जय-जयकार करने लगे। यहूदियों के लिए तो आनन्द और आशा का दिन था। कई स्थानों पर जहाँ राजा का फरमान पहुँचा, वहाँ लोग यहूदी हो गए, क्योंकि यहूदियों का भय सब पर छा गया था। पर यह भय, दबाव का नहीं, बल्कि सम्मान का भय था – यह जानकर कि उनके साथ परमेश्वर है।
एस्तेर ने अपने कक्ष से खिड़की पर खड़े होकर मोर्दकै को जाते देखा। हवा में एक हल्की सी सरसराहट थी, जैसे पूरा शहर एक लम्बी सांस छोड़ रहा हो। उसने अपने हाथ जोड़े। उसकी आँखों से आँसू नहीं थे, बल्कि एक गहरी शांति थी। संकट टला नहीं था, अब भी लड़ाई बाकी थी, पर उनके पास अब साधन थे। वह एक साधारण यहूदी लड़की से राजा की रानी बनी थी, और आज उसने महसूस किया कि यह पद उसके लिए नहीं, बल्कि एक पूरी प्रजा के लिए था। उसने देखा कि कभी-कभी परमेश्वर चमत्कारी आग से नहीं, बल्कि मनुष्यों के हृदय बदलकर, उनकी हिम्मत बढ़ाकर, और समय पर सही शब्द कहलवाकर भी बचाता है।
शाम को जब दीपक जले, तो शूशन के यहूदी घरों से भजनों की मधुर स्वरलहरियाँ उठने लगीं। यह विजय का गान नहीं था, बल्कि धन्यवाद का भजन था। एक लम्बी रात का अंत हो रहा था, और नए दिन की किरण, पहले से कहीं ज्यादा तेज, क्षितिज पर दिखाई दे रही थी।




