पवित्र बाइबल

युद्ध की पूर्व संध्या पर दाऊद की प्रार्थना

यरूशलेम की सुबह धुंधली और ठंडी थी। पूर्वी आकाश में हल्की सफेदी फैलने लगी थी, पर अभी भी रात की कालिमा पहाड़ियों की तलहटी में छिपी हुई थी। राजभवन की छत पर खड़ा दाऊद ठंडी हवा को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था। उसकी सांसें हल्की धुंध बनकर हवा में विलीन हो रही थीं। कल सूरज ढलते ही वह और उसके सैनिक उत्तर की ओर कूच करने वाले थे – अरामियों और अम्मोनियों की संयुक्त सेना का सामना करने।

उसके मन में कोई उल्लास नहीं था, न ही युद्ध का कोई गर्व। बस एक गहरी, भारी शांति थी, जो संभवतः प्रार्थना से आती है। वह नीचे आंगन की ओर देखने लगा। धीरे-धीरे, लोगों के आने-जाने की आवाज़ें आनी शुरू हुईं। सबसे पहले महायाजक सादोक आए, उनके हाथों में धूप की सुगंधित लकड़ी की थैली थी। फिर अबीय्यार, दाऊद का बड़ा पुत्र, कवच पहने, पर चेहरे पर एक अजीब सी ऊहापोह लिए। वह अभी अनुभवी नहीं था। दाऊद ने एक गहरी सांस ली। यह उसका पहला बड़ा युद्ध होगा।

दिन चढ़ने लगा। सूरज की पहली किरणें मोरियाह पर्वत पर पड़ी हुई उस भूमि को छूने लगीं, जहां भविष्य में मंदिर बनना था। अभी वहां केवल एक ऊंचा चबूतरा था, और एक बलि-वेदी। दाऊद ने वहां अपनी नज़रें टिका दीं। उसकी प्रार्थना सरल थी, बिना शब्दों के। कई बार ऐसा होता है, जब हृदय की पुकार, जुबान से निकले शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है।

तभी नीचे से स्वर उठा। सादोक ने हाथ उठाए थे। लेवीय गाते हुए आ रहे थे। उनका गीत नया नहीं था, पर उस सुबह उसकी ध्वनि में एक नया ही संकल्प था।

“तुम्हारी सहायता के लिए यहोवा तुम्हें संकट के दिन में सुन ले। याकूब के परमेश्वर का नाम तुम्हें ऊंचा स्थान दे।”

दाऊद की आंखें बंद हो गईं। वह शब्द उसकी रग-रग में उतर रहे थे। ‘संकट के दिन’ – क्या आज ही वह दिन नहीं था? शत्रु संख्या में अधिक थे, हथियारों से सुसज्जित। यरूशलेम की दीवारों के पीछे सुरक्षित बैठा कोई भी राजा शायद टक्कर न लेता। पर दाऊद चुनाव नहीं कर सकता था। प्रतिज्ञा, सम्मान, और उन लोगों की सुरक्षा का प्रश्न था, जो उसके शासन में थे।

गीत आगे बढ़ा। “वह अपने पवित्रस्थान से तुम्हारी सहायता करे, और सिय्योन से तुम्हें समर्थन दे।”

सिय्योन। वह पहाड़ी जहां से उसने इस नगर को जीता था। वह स्थान जहां यहोवा की उपस्थिति विद्यमान थी। दाऊद का मन उस तम्बू की ओर गया, जहां वह सोने-चांदी के पात्र नहीं, बल्कि एक साधारण लकड़ी के संदूक को रखवाया था। वही उसकी शक्ति का असली स्रोत था। रथों और घोड़ों की गिनती नहीं। उसने कभी नहीं की थी। उसका भरोसा तो उस नाम पर था, जिसने गोलिय्यत के सामने एक चरवाहे के लड़के को विजय दिलाई थी।

लेवीयों की आवाज़ और ऊंची हुई, मानो वे केवल गा नहीं रहे, बल्कि एक सामूहिक प्रार्थना कर रहे हों। राजभवन का आंगन अब लोगों से भर चुका था – बूढ़े, जवान, महिलाएं, बच्चे। सबकी आंखें उस ऊंचे चबूतरे पर टिकी थीं।

“वह तुम्हारी सब भेंट स्मरण करे, और तुम्हारी होमबलि ग्रहण करे।”

दाऊद ने सोचा, कल शाम को उसने एक बैल और एक मेमने की बलि दी थी। यह रीति थी। पर क्या परमेश्वर वास्तव में पशुओं के मांस से प्रसन्न होता है? उसका मन कहता था कि नहीं। वह तो टूटा हुआ हृदय चाहता है, पश्चाताप की एक गहरी चीख। और आज उसका हृदय टूटा हुआ ही था। अपने पुत्रों को युद्ध में भेजने का भार, अपने सैनिकों के प्राणों की जिम्मेदारी – यह सब उसे दबोचे हुए था।

फिर गीत का स्वर बदला। वह प्रार्थना से सीधे आशीष में बदल गया।

“यहोवा तुम्हारे मन की सब कामना पूरी करे, और तुम्हारी सब योजनाएं सफल करे।”

दाऊद ने अपनी आंखें खोलीं। उसकी योजना स्पष्ट थी – शत्रु को हराना, अपने लोगों की रक्षा करना। पर उसके मन की कामना? शायद शांति की। एक ऐसा दिन जब लोहे की चमक तलवारों की नहीं, बल्कि हलों की हो। पर वह दिन अभी दूर था।

“हम तो तुम्हारे विजय के कारण जयजयकार करेंगे, और हम अपने परमेश्वर के नाम पर झंडे फहराएंगे। यहोवा तुम्हारी सब प्रार्थनाएं पूरी करे।”

आंगन में खड़े लोगों में से कईयों ने “आमेन” कहा। यह स्वर एक गूंज की तरह हवा में तैर गया। दाऊद ने अपने सेनापति योआब की ओर देखा, जो द्वार पर खड़ा था। उसकी आंखों में एक दृढ़ संकल्प था। योआब शायद गीत के शब्दों को सैन्य रणनीति में तब्दील कर रहा था। पर दाऊद कुछ और सोच रहा था। वह जानता था कि विजय का झंडा फहराना महत्वपूर्ण है, पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह नाम, जिसके कारण वह झंडा फहराया जाएगा।

अचानक गीत समाप्त हो गया। एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। फिर सादोक ने अपना हाथ दाऊद की ओर बढ़ाया। उनकी आवाज़ गंभीर और स्पष्ट थी। “अब मैं जानता हूं कि यहोवा अपने अभिषिक्त की रक्षा करेगा। वह उसे अपने स्वर्गीय पवित्रस्थान से उत्तर देगा, और अपनी दाहिनी बाजू की पराक्रमी शक्ति से बचाएगा।”

यह वचन तीर की तरह दाऊद के हृदय में उतरा। ‘अभिषिक्त’ – मसीहा। क्या वह सच में था? उसने हमेशा स्वयं को एक अधूरा पात्र ही माना था। पापी, गलतियां करने वाला, कमजोर। पर शायद परमेश्वर की दृष्टि में, एक ऐसा हृदय जो लौट-लौट कर उसी की ओर आता है, वही ‘अभिषिक्त’ होता है।

गीत ने एक नया मोड़ लिया। अब यह चुनौती बन गया था। “कोई रथों पर भरोसा रखता है, और कोई घोड़ों पर। परन्तु हम तो अपने परमेश्वर यहोवा के नाम का स्मरण करेंगे।”

दाऊद के होंठों पर एक मुस्कान आ गई। यह सच था। अरामी अपने रथों पर घमंड करते थे। अम्मोनी अपने सैनिकों की संख्या पर। पर उसकी सेना? उसकी शक्ति एक नाम में समाई हुई थी। यहोवा-सबाओत, सेनाओं का परमेश्वर।

“वे झुक कर गिर गए हैं, परन्तु हम उठे और सीधे खड़े रहे।”

ये शब्द भविष्यवाणी जैसे लगे। दाऊद ने अपने कंधे सीधे किए। उसकी पीठ में जो भार था, वह अब हल्का लग रहा था। भय की जगह एक अटल विश्वास ने ले ली थी। यह विश्वास भावुकता नहीं थी। यह उस पत्थर जैसा ठोस था, जिसे उसने गोलिय्यत की कनपटी पर मारा था।

अंतिम पंक्तियां आईं। लेवीयों ने अपना सिर ऊंचा किया, और उनका स्वर राजभवन की दीवारों से टकराकर लौट आया।

“हे यहोवा, राजा को बचा ले! हम पुकारते समय तू हमें उत्तर दे!”

एक सामूहिक करुणा की पुकार। यह सिर्फ दाऊद के लिए नहीं थी। यह पूरी प्रजा के लिए थी। राजा के बचने में ही उनका बचाव था। दाऊद ने पहली बार उस दिन आंसू महसूस किए। वे उसकी आंखों में नहीं आए, पर उसकी छाती के भीतर कहीं गर्माहट फैल गई। वह अकेला नहीं था। यह संघर्ष सिर्फ उसका नहीं था। पूरा यरूशलेम, पूरी यहूदा, उसके साथ खड़ी थी।

प्रार्थना समाप्त हुई। सूरज अब पूरी तरह निकल आया था। नगर सुनहरी रोशनी में नहा उठा था। दाऊद ने नीचे उतरकर अपने लोगों के बीच जाने का निश्चय किया। जाते-जाते उसने एक बार फिर उ

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