पवित्र बाइबल

अय्यूब का हृदय-विलाप

(यह कहानी अय्यूब के शब्दों और उसके हृदय की पीड़ा को, उसी के मुख से सुनाने का प्रयास करती है। यह साहित्यिक कल्पना है, परन्तु पवित्रशास्त्र के आधार पर।)

मेरी स्थिति अब ऐसी है कि जिनके बापों को मैंने अपने कुत्तों के संग रखने के योग्य भी न समझा था, आज उनके बेटे मुझ पर थूकते हैं। वे निकम्मे, दुर्बल, भूख से बिलबिलाते लोग – जिनकी झोंपड़ियाँ रेगिस्तान के विषैले झाड़ों और पथरीली खड्डों के बीच टूटी-फूटी पड़ी रहती थीं। वे जंगली गधेचारों की तरह रहते, घास की जड़ें चबाते, चोरों की तरह छिपते। अब वे मेरे विरुद्ध गीत गाते हैं, मेरा नाम कहावत बना देते हैं।

आज सुबह फिर वे आए। दूर से ही पत्थर उछालते हुए, चिल्लाते हुए। “देखो यह ‘धर्मी’ अय्यूब! देखो इसे, जिस पर ईश्वर की मार पड़ी!” उनके चेहरे गंदगी से सने, कपड़े फटे हुए। एक ने तो मेरे सामने ही, धूल में लोट-पोट करनी शुरू कर दी, मानो मैं कोई अशुभ स्थान हूँ। मैं चुपचाप सब सहता रहा। मेरी त्वचा पर से काले पड़ते हुए छाले, जो फटकर मवाद बहाते, उन्हें देखकर वे और उत्तेजित हो जाते।

परमेश्वर ने मेरी कमर का डोर ढीला कर दिया है और मुझे दुर्बल कर दिया है। वह मुझे अपने हाथों से पकड़कर, उसी धूल के ढेर पर खड़ा कर देता है, जहाँ से मैं उठकर भागना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि वही है। उसकी छड़ मेरी पीठ पर पड़ती है, उसके तीर मेरे तन-मन को छलनी कर देते हैं। मेरे भीतर का सारा संगठन टूट गया है, मानो किसी सेना ने मेरे शिविर को रौंद डाला हो। भय, एक निरंतर साथी बन गया है। मेरा गौरव रेत के महल की तरह बह गया, मेरी प्रतिष्ठा बादलों की तरह विलीन हो गई।

अब मेरे दिन दुःख से भरे हुए बीतते हैं। रातें – हे प्रभु, वे रातें कैसी यातना हैं! पीड़ा मुझे बाँधकर सोने नहीं देती। वह इतनी प्रबल है कि मेरे वस्त्र, जो इस फफोलेदार त्वचा से चिपक जाते हैं, उन्हें भी उतार पाना एक संघर्ष बन जाता है। मैं उससे लड़ता हूँ, और वह मुझे धकेलकर, गिराकर, धूल-धूसरित कर देती है।

तेरी आवाज, हे परमेश्वर, अब मुझे डराती है। जब तू मेरे सामने आता है, तो मैं काँप उठता हूँ। पहले जो तेरा स्मरण मेरी शरण था, आज वही मेरा भय बन गया है। तू मुझे हवा के झोंके की तरह उड़ा ले जाता है, तूरे तूफान में मेरा अस्तित्व विलीन हो जाता है। मैं जानता हूँ कि तू मुझे मृत्यु के घर तक, सबके साझा घर तक, ले जाएगा।

परन्तु क्या मैं किसी दुखी की सहायता के लिए हाथ नहीं उठाता था? क्या मैंने कभी किसी विधवा को रोते देखकर आँखें फेर ली थीं? मेरे दुःख ने मुझे भक्षक बना दिया है। विपत्ति, जो मेरे सामने खड़ी है, उसने मेरा सारा साहस चूस लिया है। एक भयानक आशंका हर पल मेरा पीछा करती है। मेरी प्रार्थनाएँ खाली हाथ लौट आती हैं। मैं शोक मनाने वालों के बीच बैठता हूँ, मैं उनकी धुन में अपना विलाप मिला देता हूँ।

मेरा हृदय सूखकर काला पड़ गया है। मेरी आँखें, जो कभी उज्ज्वल थीं, अब शोक और थकान से धुँधली हैं। मेरे शरीर पर केवल हड्डी और खाल शेष है। और मेरी त्वचा – काली पड़कर झड़ रही है, मेरी हड्डियाँ जलन से जल रही हैं।

मेरी वीणा शोक के स्वर लेने लगी है, मेरा बाँसुरी विलाप की आवाज़ उठाने लगा है। सब कुछ उलट गया। जो लोग कभी मेरे दरवाज़े पर नज़र नहीं रखते थे, आज वे मेरे लिए गालियों के गीत गाते हैं। जिनकी निगाह में मैं कभी तुच्छ था ही नहीं, आज वे मुझ पर थूकते हैं। यह सब… यह सब तेरे हाथों से है।

और मैं यहाँ बैठा हूँ, इस राख के ढेर पर। धूप मेरे घावों को चिढ़ाती है, रात की ठंडी हवा मेरी हड्डियों में दर्द भर देती है। मेरा गाना विलाप में बदल गया है, और मेरा सारा सुर मातम का सुर हो गया है। हे परमेश्वर, मैं तेरे सामने धूल और राख हूँ। केवल इतना ही जानता हूँ कि तू है… और यह दुःख भी तेरे हाथ से ही आया है। शब्द अब ख़त्म हो रहे हैं। केवल एक कराहट शेष है, जो हृदय के गहरे कुएँ से निकलती है, और इस निर्जन स्थान में लुप्त हो जाती है।

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