वह दिन आज भी याद है, जब सब कुछ धुंधला सा लगने लगा था। घर की खिड़की से दिखता आम का पेड़, माँ की आवाज़, चूल्हे पर चढ़े बर्तन की खनक – सब कुछ मानो मेरे और दुनिया के बीच एक मोटे काँच के शीशे के पीछे चला गया था। डॉक्टर कुछ कहते, वैद्य कुछ, लेकिन शरीर तो जैसे धीरे-धीरे रेत हो रहा था। रातें सबसे लंबी होतीं। सन्नाटे में, अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनता, और उसके भीतर एक खामोश गूँज सुनाई देती – मृत्यु की दस्तक।
एक शाम, जब बुखार ने सिर को भारी कर दिया और आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा, तो मैंने हार मान ली। प्रार्थना करने का भी बल नहीं था। बस, मन ही मन एक चीत्कार सी उठी – “हे प्रभु, मैं बचना चाहता हूँ।” कोई शब्द नहीं, कोई मन्नत नहीं, बस यही टूटी हुई पुकार।
और फिर, धीरे-धीरे, जैसे कोहरा छँटता है। एक दिन सुबह, खिड़की से आती हवा में बासमती चावल की महक आई। माँ ने दलिया दिया, और वह गले से उतर गया। एक सप्ताह बाद, मैं आँगन में खड़ा हो सका। पैरों तले मिट्टी का स्पर्श… कितना सच्चा, कितना ठोस लगा। ऐसा लगा जैसे मैं नए सिरे से जन्म ले रहा हूँ, हर चीज़ को पहली बार देख रहा हूँ। पानी की एक बूँद, कपड़े पर पड़ी धूप, बिल्ली के बच्चे की म्याऊँ – सब कुछ अद्भुत था।
डर अभी भी था। कहीं यह सब सपना तो नहीं? कहीं फिर से वही दिन लौट तो नहीं आएँगे? लेकिन हृदय के भीतर एक आवाज़ गूँजती – “शांत हो। जीवित है तू। उसने तेरी सुनी।” मैं मंदिर नहीं गया। घर के छोटे से आँगन में ही, सूरज ढलते समय, मैंने अपने हाथ फैलाए। आँखें बंद करके बस खड़ा रहा। शब्द नहीं आ रहे थे, केवल आँसू थे जो गालों पर बह निकले। कृतज्ञता का यह भाव शब्दों से परे था।
अब जीवन का हर पल एक उपहार है। चाय की प्याली से उठती भाप, रास्ते में मिलते बच्चे का हँसना, रात को तारों का टिमटिमाना – ये सब छोटी-छोटी मुहरें हैं उस अनुग्रह की, जिसे मैंने भोगा है। लोग कहते हैं मेरा चेहरा बदल गया है। शायद बदल गया हो। जब तुम मृत्यु के मुँह से निकल आओ, तो जीवन की हल्की-फुल्की परेशानियाँ कितनी छोटी लगने लगती हैं।
मैं अब उसके घर के द्वार पर क्या चढ़ाऊँ? मेरे पास तो बस यही जीवन है, यही साँसें हैं। तो मैंने एक प्रतिज्ञा की है – जब तक यह श्वास चलेगी, उसके नाम का आह्वान करती रहूँगी। उसकी दया का वर्णन करती रहूँगी। बूढ़ी दादी को पानी पिलाना, रोते बच्चे को चुप कराना, थके पथिक को आश्रय देना – यही मेरी भेंट है। क्योंकि उसने मेरी पुकार सुनी, उसने मेरी आँखों के आँसू पोंछे, और मुझे इस मिट्टी पर वापस लाकर खड़ा कर दिया।
कभी-कभी रात में, जब वह पुराना डर छूने आता है, तो मैं उन शब्दों को दोहराता हूँ जो मेरे हृदय में अंकित हो गए हैं – “प्रभु की दृष्टि में उसके भक्तों की मृत्यु बहुमूल्य है।” और फिर मुझे याद आता है उस सुबह का स्वाद, चावल की महक, और मिट्टी का वह ठोसपन। मैं जीवित हूँ। और यह जीवन ही, अब मेरी प्रार्थना है।




