पवित्र बाइबल

एक तीर्थयात्री की अंतिम यात्रा

यह कहानी एक बूढ़े यहूदी तीर्थयात्री की है, जिसका नाम एलीशेफ था। उसकी उम्र के साथ पैरों में एक स्थायी पीड़ा बस गई थी, पर हर साल, जब भी निसान का महीना आता, उसका मन सिय्योन की ओर बेचैन हो उठता। वह यरूशलेम की धरती पर, परमेश्वर के भवन के आंगन में खड़े होने के लिए तरस जाता। इस बार की यात्रा उसके लिए विशेष थी, क्योंकि डॉक्टरों ने कह दिया था कि अगली बार चल पाना मुश्किल होगा।

उसका घर यरदन नदी के पूर्व की ओर, गिलाद की हरी-भरी पहाड़ियों में था। यात्रा का पहला चरण उसके लिए सबसे कठिन था। गर्मी की शुरुआत हो चुकी थी और सूरज की तपिश रास्ते की धूल को चमकदार बना देती थी। उसने अपना थैला उठाया, एक साधारसी लाठी टेकी, और पश्चिम की ओर चल पड़ा। हर कदम पर जोड़ों में चुभन होती, पर हर कदम के साथ उसके दिल में एक गीत गूंजता – “कैसे ही प्रिय हैं तेरे निवास स्थान, हे सेनाओं के यहोवा!”

रास्ते में वह उन घाटियों से गुजरा जो सूखी और नीरस लगती थीं। बाक्का की घाटी। वहां काँटेदार झाड़ियाँ और चट्टानें थीं, धरती फटी हुई थी जैसे प्रार्थना के लिए प्यासी हो। पर एलीशेफ जानता था कि यही वह स्थान है जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति बरसात के आगमन की तरह अचानक प्रकट हो सकती है, सूखी धरती को आशीष में बदल सकती है। उसने देखा कि एक कठोर चट्टान की दरार में, एक छोटा सा कीड़ा रेंग रहा था, और उस दरार में नमी के चिन्ह थे। उसने मुस्कुराते हुए सोचा – हाँ, वह जल स्रोत यहीं है, उसी कीड़े के बिल में, जब यहोवा की शक्ति इस घाटी को आशीष में बदल देती है।

कई दिनों की यात्रा के बाद, वह अन्य तीर्थयात्रियों के काफिले में शामिल हो गया। उनमें युवा भी थे, जो जोश से भरे हुए थे, और बूढ़े भी, जिनके चेहरों पर एलीशेफ जैसी ही थकान और उम्मीद दोनों झलकती थी। रातें वे रास्ते में बने छोटे-छोटे गाँवों में बिताते, आग के चारों ओर बैठकर पुराने भजन गाते। एक रात एक युवक ने पूछा, “एलीशेफ दादा, आप इतनी कठिनाई क्यों उठाते हैं? परमेश्वर तो हर जगह विद्यमान है।” बूढ़े ने आग की लपटों को देखते हुए कहा, “बेटा, हाँ, वह हर जगह है। पर उसका भवन… वह विशेष है। वहाँ एक पल खड़े होने का अनुभव ऐसा है जैसे समय ठहर जाता है, और तुम्हारी सारी यात्रा, सारी पीड़ा, सब कुछ सार्थक हो उठता है। वहाँ तो एक दिन, बाहरी आंगन में खड़े होने का एक पल भी, हजारों दिनों के सुखों से बढ़कर है।”

जैसे-जैसे वे यरूशलेम के निकट पहुँचने लगे, परिदृश्य बदलने लगा। हवा में एक ताजगी आई, जैसे पहाड़ियाँ स्वयं प्रार्थना कर रही हों। और फिर एक सुबह, ऊपर चढ़ते हुए, एक मोड़ पर, उसने देखा। दूर, धुंधली धूप में, शहर के शिखर दिखाई दिए, और उनके बीच, परमेश्वर के भवन का श्वेत सोने जैसा चमकता हुआ शिखर। एलीशेफ का सांस रुक गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए, वे आँसू नहीं थे जो पीड़ा से आते, बल्कि वे आँसू थे जो एक लम्बे विछोह के बाद मिलन की प्रतीक्षा में आते हैं।

शहर में प्रवेश करते ही भीड़ बढ़ गई। असंख्य यात्री, भेड़ों और बछड़ों का शोर, बैलगाड़ियों की रफ्तार। पर एलीशेफ के लिए सब कुछ धुंधला सा था। उसकी नजर केवल उस पहाड़ी पर टिकी थी। कदम-दर-कदम, सीढ़ी-दर-सीढ़ी, वह ऊपर चढ़ता गया। उसके पैर अब जलते हुए अंगारों जैसे लग रहे थे, पर उसके हृदय में एक अद्भुत शक्ति का संचार हो रहा था, जैसे कोई उसे ऊपर खींच रहा हो।

और फिर वह क्षण आया। वह पवित्र आंगन के द्वार पर पहुँच गया। उसने अपनी चप्पलें उतारीं। नंगे पाँव, ठंडे पत्थरों पर, वह आगे बढ़ा। वह स्वर्णिम द्वार से अंदर नहीं जा सकता था, केवल याजक ही जा सकते थे, पर यहीं, इस स्थान पर भी, वह उपस्थिति महसूस कर सकता था। उसने अपना सिर झुकाया। आसपास का सारा शोर मानो दूर कोई सागर की लहर बनकर रह गया। उसने अपने जीवन के सारे दिन, सारे दुःख, सारे छोटे-बड़े आनंद, सब कुछ उस आँगन में रख दिया। एक गहरी शांति, एक ऐसा सुख जिसे शब्दों में बाँधना असंभव है, उसके भीतर उमड़ आया। वह जानता था कि सेनाओं के यहोवा, उसका परमेश्वर और राजा, यहीं है। एक चिड़िया ने उड़ान भरी और मन्दिर के एक छज्जे पर जा बैठी, और वहीं अपना घोंसला बना रही थी। एलीशेफ ने देखा और मन ही मन प्रार्थना की — हे प्रभु, मैं भी तो वही चिड़िया हूँ। मेरा घर यहीं है, तेरे पवित्रस्थान के एक कोने में।

वह घंटों वहाँ खड़ा रहा, समय का बोध खोकर। जब वह लौटा, तो उसका चेहरा एक अलग ही तेज से चमक रहा था। वापसी की यात्रा अब भी लम्बी थी, पर अब वह एक भिन्न मनुष्य था। उसे पता था कि यह शायद उसकी अंतिम भौतिक तीर्थयात्रा है, पर उसने एक नई सच्चाई पा ली थी। परमेश्वर का भवन अब केवल पत्थर और लकड़ी नहीं रहा, वह उसके हृदय में बस गया था। एक मनुष्य जो तुझ पर भरोसा रखता है, हे सेनाओं के परमेश्वर, उसके लिए आशीष के द्वार हमेशा खुले हैं। और एलीशेफ के लिए, गिलाद लौटते हुए, हर कदम पर वह आशीष उसके साथ चल रही थी, जैसे सूरज की किरणें उसके रास्ते को रोशन कर रही हों।

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