पवित्र बाइबल

बंधुआई से मुक्ति की कुम्हार की कहानी

वह कुम्हार अपने खाली चाक के सामने बैठा था। हाथों में मिट्टी का स्पर्श महीनों से भूला हुआ था। दिन की गर्मी धीरे-धीरे ढलान पर थी, और खिड़की से आती हल्की रोशनी में धूल के कण नाच रहे थे। उसकी कार्यशाला में सन्नाटा था, बस चूहे दीवारों के पीछे कभी-कभी खरखराहट कर जाते। बाबुल की इस बंधुआई में समय एक लम्बी, बेरंग मिट्टी की तरह था, जिसमें न कोई आकार था, न कोई चमक।

एकाएक उसे अपने पिता की आवाज़ याद आई, जो सदियों पहले यरूशलेम की एक संकरी गली में कही गई थी: “तू मेरा है।” वाक्य इतना साधारण था, पर उसमें एक भारीपन था, जैसे कोई पक्की वाचा। उसने आँखें मूँद लीं। उस रात सपने में, वह एक नदी के किनारे खड़ा था। नदी उफान पर थी, पर पानी उसे छू नहीं रहा था, बल्कि दो भागों में बंट कर बह रहा था। आग की लपटें भी उसे घेरतीं, पर वह जलता नहीं था। एक गहरी, स्थिर आवाज़ हवा में गूँज रही थी – “डर मत, मैंने तुझे बुलाया है, तू मेरा है।”

अगली सुबह, जब जेल का रक्षक उसे बागान में काम पर ले गया, तो उसकी आँखों में एक नई चमक थी। हवा का एक झोंका, जो कल तक केवल गर्मी लाता था, आज उसके चेहरे पर एक स्मृति की तरह लगा – जंगल की सड़कों से गुजरते हुए, लाल सागर के पानी के फटने की कहानी। वह जानता था कि वह केवल एक बंदी नहीं था। उसका नाम बुलाया गया था। उसके लिए रास्ते बनाए गए थे। यहाँ तक कि जंगली जानवर – बबूल के जंगल में चीते और रात के भेड़िए – उसे नुकसान नहीं पहुँचाते थे, मानो उन्हें कोई आदेश मिला हो।

धीरे-धीरे, यह ज्ञान उसकी उँगलियों में लौटने लगा। उसने चोरी-छिपे, मिट्टी के छोटे-छोटे टुकड़े जमा किए। रात के अँधेरे में, वह अपनी कोठरी के एक कोने में बैठकर मिट्टी को गूँथने लगा। पहले तो उँगलियाँ अकड़ी हुई थीं, पर फिर स्मृति ने उनमें जान डाल दी। उसने एक छोटी सी कलशी बनाई, फिर एक दीपक। मिट्टी गीली थी, उसमें सहज गंध थी – वही गंध, जो यरदन नदी के किनारे की मिट्टी में होती है।

एक दिन, बाबुल के एक अधिकारी ने, जो क्रूर होते हुए भी कलाप्रेमी था, उसके बनाए एक बर्तन को देख लिया। उसकी आँखों में चमक आ गई। “तुम कुम्हार हो?” उसने पूछा। उस यहूदी बंदी ने सिर झुकाकर हाँ कहा। उस दिन से, उसे राजकीय कार्यशाला में भेज दिया गया। वहाँ उसके हाथों ने फिर से चाक को छुआ। पर अब वह साधारण बर्तन नहीं बनाता था। हर बर्तन पर, वह चुपके से कोई निशान छोड़ देता – कभी नदी की लहर की तरह एक रेखा, कभी आग की ज्वाला का एक अंश। ये निशान उसकी प्रार्थना थे, उसकी यादों के साक्षी।

वर्ष बीतते गए। साम्राज्य बदला। एक नए राजा के आने की अफवाह फैली, जो यहूदियों को मुक्त करने वाला था। लोगों के मन में एक अधीर उम्मीद जगी। कुम्हार अब बूढ़ा हो चला था, पर उसकी आँखों की चमक कम नहीं हुई थी। एक शाम, जब उसने अंतिम बर्तन चाक से उतारा, तो उसे लगा जैसे कोई उससे कह रहा हो – “देख, मैं नया काम करता हूँ, अब यह प्रगट होनेवाला है; क्या तू उसे जानता नहीं? मैं जंगल में मार्ग और बीहड़ में नदियाँ बनाऊँगा।”

और फिर वह दिन आया। फारस का राजा कुरुस का आदेश सुनाया गया। सभी यहूदी बंदी स्वतंत्र थे। वे अपने घर लौट सकते थे। आनन्द का कोहराम मच गया। लोग रोए, गले मिले, अपने थोड़े-बहुत सामान बाँधने लगे।

कुम्हार ने कोई सामान नहीं बाँधा। वह धीरे से अपनी कार्यशाला में गया। वहाँ, उसने वर्षों में बनाए हुए हर बर्तन को एक-एक करके तोड़ डाला। कोई भी उसकी इस हरकत को नहीं समझ पाया। तोड़ते हुए, उसके होठों पर एक मंद मुस्कान थी। ये बर्तन बंधुआई की याद थे। और अब, जब परमेश्वर नया कुछ करने जा रहा था, पुराने को रखने का कोई अर्थ नहीं था। उसने मिट्टी के ढेर को देखा, जो अब बेआकार था। फिर वह बाहर निकला, उस भीड़ में शामिल हो गया जो पश्चिम की ओर, यरूशलेम की ओर चल पड़ी थी।

रास्ते में, जब वे सूखे बीहड़ से गुज़र रहे थे, तो आकाश में बादल छा गए और एक अप्रत्याशित वर्षा होने लगी। रेगिस्तान में छोटी-छोटी नदियाँ बह निकलीं। लोग हैरान थे। बूढ़ा कुम्हार चुपचाप आगे बढ़ता रहा। उसे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वह तो बस उस आवाज़ को दोहरा रहा था, जो उसकी रगों में धड़क रही थी – “तू मेरे लिए बहुमूल्य है, मैं तुझसे प्रेम करता हूँ।”

वह जानता था कि यरूशलेम पहुँचकर वह फिर से चाक चलाएगा। नई मिट्टी लेगा। और इस बार, उसके बनाए हर बर्तन में, कोई गुप्त निशान नहीं होगा। बल्कि, पूरा का पूरा बर्तन ही एक गवाही होगा – उस ईश्वर की, जो बंधुआई में भी साथ रहता है, जो आग में भी जलने नहीं देता, और जो बीहड़ में भी रास्ता निकाल लेता है।

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