वह एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे बैठा था, जिसकी जड़ें पहाड़ी की चट्टानों में उलझी हुई थीं। नीचे, कीद्रोन की घाटी में साया लम्बा हो रहा था, और यरूशलेम की दीवारों पर सूरज की आखिरी किरणें सोने जैसा पीपल छिड़क रही थीं। पर यिर्मयाह की आँखों में वह सोना नहीं था। उसकी आँखों में तो एक गहरा, काला पानी भरा था, जैसे कोई कुआँ जिसकी तलहटी में दुख के पत्थर पड़े हों।
हवा में धुआँ था – नहीं, यह भेंट चढ़ाने का पवित्र धुआँ नहीं था। यह वह धुआँ था जो घाटियों में स्थित ‘टोपेत’ की उच्च पहाड़ियों से उठता था, जहाँ लोग मोलेक के लिए, एक दुष्ट स्वप्न के लिए, अपने बच्चों की आहुति देते थे। धुआँ उसकी नासिकाओं में चिपक गया, एक मीठी-सी दुर्गन्ध की तरह, जो उसके गले को जकड़ रही थी।
उसका मन चीख़ उठा। काश मेरे पास पानी के स्रोतों से भरी एक मरुभूमि होती, वह सोचने लगा। एक ऐसा स्थान जहाँ से मैं अपनी जनता के लिए रोते-रोते अलग हो सकता। क्योंकि जो कुछ उसने देखा, वह तोड़ देने वाला था। वे झूठ के धनुष पर तीर चढ़ाए बैठे थे, और सच्चाई के नाम पर केवल धोखेबाज़ी की गोली चलाते थे। यहूदा से लेकर इस्राएल तक, एक सिरे से दूसरे सिरे तक, विश्वासघात ही विश्वासघात फैला था। पड़ोसी पड़ोसी से सावधान रहता, भाई भाई पर भरोसा नहीं करता। हर कोई अपने भाई की चुगली करने में मग्न, हर जुबान एक भटकी हुई तीर की तरह।
“वे एक दूसरे को सिखाने के लिए झूठ सीखते हैं,” यिर्मयाह ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ पत्तों की सरसराहट में खो गई। “वे इस दुष्टता में निपुण होने के लिए अपनी जीभ को थकाते हैं।”
शहर से आवाज़ें आ रही थीं – हँसी, व्यापारियों की चिल्ल-पौं, बच्चों के खेलने की आवाज़। सामान्य जीवन का शोर। पर उसे तो उन आवाज़ों के पार दिख रहा था। उसे दिख रहा था कि कैसे हर घर एक घात स्थल बन गया है, हर मित्रता एक जाल। उन्होंने सच्चाई को जानबूझकर भुला दिया था। उन्होंने शांति के नाम पर झूठ को गले लगा लिया था, और अब उस झूठ ने उनके बीच की हर नस को ज़हर से भर दिया था।
तब यहोवा का वचन, एक भारी पत्थर की तरह, उसके भीतर उतरा।
“देख, मैं उन्हें शुद्ध करूँगा और उनकी परीक्षा लूँगा। एक ऐसी कौम के साथ और क्या किया जाए? उनके कार्य तो सब दुष्ट हैं।”
भगवान की आवाज़ में कोई गरज नहीं थी, बल्कि एक थकी हुई, अनंत दुख से भरी हल्की-सी पुकार थी, जो पहाड़ियों के बीच गूँज रही थी। यह वह दुख था जिसने यिर्मयाह के अपने दिल को चीर दिया।
“तू उनके लिए विलाप कर। उनकी मृत्यु के लिए शोकगीत गा। क्योंकि हमारी ज़मीन उजाड़ हो गई है। चरागाहें सूनी पड़ी हैं। जंगली गधे और भेड़ बकरियों के झुण्ड के बिना, आवाज़ें सुनाई नहीं देतीं। यरूशलेम खंडहर बन जाएगा, शहरियों का अड्डा बन जाएगा।”
यिर्मयाह ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसने कल्पना की – वे सुन्दर महल, वे संकरी गलियाँ जहाँ अभी भी जीवन स्पंदित था, सब खंडहर। केवल काँटेदार झाड़ियाँ, उल्लुओं का बसेरा, और एक भयानक खामोशी। और ऐसा क्यों? क्योंकि उन्होंने उस व्यवस्था को त्याग दिया था जो उन्हें जीवन देती थी। उन्होंने अपने हृदय की जिद का अनुसरण किया था, और बाल देवताओं के पीछे-पीछे भटक गए थे, जो देवता नहीं, बल्कि मिट्टी के पुतले मात्र थे।
एक अचानक आवेग में, उसने मिट्टी उठाई और अपनी हथेली में मल दी। यह सूखी, बंजर थी। उसने सुना था कि मिस्र की मिट्टी कैसी होती है – काली और उपजाऊ, नील नदी का उपहार। पर यह मिट्टी… यह तो शापित लग रही थी।
“इसलिए,” यहोवा का स्वर फिर गूँजा, “मैं उन्हें घास खिलाऊँगा, और उन्हें विष का पानी पिलाऊँगा। मैं उन्हें ऐसी जातियों के बीच बिखेर दूँगा जिन्हें न तो वे जानते हैं और न ही उनके पुरखे जानते थे। मैं उनके पीछे तलवार भेजूँगा, जब तक कि मैं उनका सर्वनाश न कर दूँ।”
यह एक भयानक न्याय था। एक ऐसी कटाई जो जड़ों तक को उखाड़ दे। यिर्मयाह का शरीर एक झटके से काँप उठा। उसने नीचे घाटी में देखा, जहाँ एक युवा लड़का पेड़ पर चढ़ा एक घोंसला लूट रहा था, चिड़िया चीं-चीं करके उसके सिर के ऊपर मंडरा रही थीं। क्या मानवीय हृदय भी उसी तरह लूटा जा चुका था? क्या उनकी सहज दया और न्याय की भावना, परमेश्वर द्वारा दी गई वह मधुर चहचहाहट, हमेशा के लिए चुप हो गई थी?
उसने अपना सिर हिलाया। नहीं। सब कुछ खत्म नहीं हुआ था। वचन अभी पूरा नहीं हुआ था।
“यहोवा यों कहता है,” उसने अपने होठों से शब्द बाहर निकाले, जैसे कोई प्रार्थना बोल रहा हो। “बुद्धिमान अपनी बुद्धि पर घमण्ड न करे। बलवान अपने बल पर घमण्ड न करे। धनी अपने धन पर घमण्ड न करे। बल्कि जो घमण्ड करे, वह इस बात पर करे कि वह मुझे जानता है। कि मैं यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धार्मिकता का व्यवहार करता हूँ। क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न होता हूँ।”
ये शब्द एक ठंडी हवा के झोंके की तरह थे, जो उस धुएँ और मृत्यु की गंध को क्षण भर के लिए हटा रहे थे। घमण्ड नहीं। ज्ञान नहीं। बल नहीं। केवल यह जानना – वह जानना जो हृदय को बदल दे, जो झूठ के धनुष को तोड़ दे, जो विश्वासघाती जीभ को सच्चाई की कली में बदल दे।
पर वह दिन अभी दूर था। उसके सामने तो अभी विलाप का काम था। उसे लोगों को बुलाना था कि वे विलाप करने वालियों को बुलाएँ। वे आएँगी, कुशल शोक मनाने वाली महिलाएँ, जो मृत्यु के गीत गा सकती थीं। और वे गाएँगी, क्योंकि मृत्यु नगर की गलियों में उतर आई थी। वह घरों में घुस गई थी, सिंहासन पर बैठ गई थी।
सूरज अब डूब चुका था। यरूशलेम में दीये जलने लगे थे, टिमटिमाते हुए बिंदु, जैसे आखिरी उम्मीद की चिंगारियाँ। यिर्मयाह उठा। उसके वस्त्रों पर मिट्टी लगी थी, उसके गालों पर धूल और आँसू मिले हुए थे। वह जानता था कि उसे उतरना होगा। उस नगर में, उन लोगों के बीच, जो सुनना नहीं चाहते थे। उसे उस सत्य को बोलना होगा, भले ही वह एक कब्र पर खड़े होकर बोलना हो।
उसने एक आखिरी नज़र उस पहाड़ी पर डाली, जहाँ से धुआँ अब भी, बारीक सफेद धागे की तरह, अँधेरे आकाश में उठ रहा था। फिर वह मुड़ा, और उतरने लगा। उसके कदमों की आवाज़, पथरीली जमीन पर, एकल विलाप की तरह सुनाई दे रही थी। उसके मन में, भविष्य के उन खंडहरों के बीच, एक ही प्रश्न गूँज रहा था : क्या कोई, कहीं, अपनी बुद्धि या बल पर नहीं, बल्कि केवल उस ज्ञान पर घमण्ड करेगा जो हृदय को नम्र बनाता है? उस रात के अँधेरे में, उत्तर केव




