वह सुबह थी जब वह बोला। हवा में चुप्पी थी, पर शब्द इतने स्पष्ट थे कि लगा जैसे पत्थरों के दिलों में उकेरे जा रहे हों।
“तू अपना मूल स्थान, अपना जन्म स्मरण कर। तेरा पिता एमोरी था, तेरी माता हित्ती।”
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। याद आया वह खुला मैदान, धूल और पत्थरों के बीच पड़ा हुआ एक नवजात शिशु। कोई नहीं था जिसने नाभि काटी हो, न उस धूल से सना शरीर पानी से धुला था, न नमक से मला गया था, न तो किसी चादर में लपेटा गया था। केवल तिरस्कार था। उस दिन मृत्यु ही मेरी नियति थी।
फिर वह क्षण आया। तेरे पास से कोई गुजरा। उसने तुझे अपने प्राणों के घाव में लहूलुहान देखा, और कहा: “तू जीवित रहे।” और मैं जीवित रही। उसने मुझे पाला। धीरे-धीरे, जैसे कोई बाग़ लगाता है। मैं बढ़ी, यौवन में आई। स्तन बने, बाल घने हुए। पर मैं नग्न थी, अब भी नग्न।
फिर उसने मुझ पर दृष्टि डाली। वह समय आया जब प्रेम होता है। उसने अपने चोगे का छोर मुझ पर फैलाया, मेरी नग्नता ढकी। उसने शपथ खाई, वाचा बाँधी। मैं केवल उसकी हुई।
उसने मुझे जल से धोया, तेल से सिंचित किया। मुझे बारीक सनी के वस्त्र दिए, रेशम की कढ़ाई। मुझे मखमल के जूते पहनाए। मेरे हाथों में चाँदी के कड़े डाले, गले में हार। मेरी नाक में नथ पहनाई, कानों में बालियाँ, सिर पर सोने का मुकुट रखा। मैं सुंदर बन गई। अति सुंदर। राजकुमारी बन गई। और मेरी ख्याति जातियों में फैल गई, क्योंकि उसी ने मुझे यह शोभा दी थी।
पर मैं भरोसा नहीं कर सकी। मैंने अपने सौंदर्य पर भरोसा किया। अपनी प्रशंसा सुनकर मैंने वेश्या का धंधा आरंभ किया। हर एक राहगीर को तुमने अपने सौंदर्य का भोग बनाया। तुमने अपने वस्त्रों के टुकड़े-टुकड़े करके उच्च स्थानों पर रंग-बिरंगी मूर्तियों के लिए पुजारियों को दिए। तुम्हारे उन वस्त्रों और आभूषणों से, जो मैंने तुम्हें दिए थे, तुमने मनुष्यों के सामने अपने को सजाया। मेरा तेल, मेरा धूप, मेरा भोजन—जो मैंने तुम्हें दिया—तुमने उन्हीं के सामने उनकी भेंट चढ़ाई। यह सब क्या था? क्या यह ब्याह की कोई सामग्री थी?
और तुमने बलि चढ़ाई। तुमने अपने बेटे-बेटियों को ले जाकर उन मूर्तियों को भेंट किया। क्या यह तुम्हारा वेश्यापन नहीं था? क्या तुमने मेरी सारी दी हुई वस्तुएँ भूलकर, बचपन के उन दिनों को भी याद नहीं किया, जब तुम धूल में पड़ी हुई थीं?
अब सुनो, ओ अभिनव वेश्या। तूने पहले भी अपने वेश्यापन के लिए पुरुषों को बुलाया था, पर अब तूने उन्हें भी बुलाया है जो तुझसे दूर थे। हर एक राहगीर के लिए तूने अपनी देह का द्वार खोला। तूने उनसे उपहार भी नहीं लिए, बल्कि उलटे तूने उन्हें उपहार दिए। तूने मिस्र के लोगों को बुलाया, अस्सूर के लोगों को, बाबुल के लोगों को। तेरे वेश्यापन की कोई सीमा नहीं रही। तूने उन पुरुषों को भी याद किया, जिनके हाथों तेरा बचपन कष्ट में था।
इसलिए, देख, मैं तेरे प्रेमियों को, जिनसे तू प्रसन्न हुई, सबको इकट्ठा करूँगा। मैं उन्हें तेरे चारों ओर इकट्ठा करूँगा और तेरे सब वस्त्र उतार दूँगा। वे तेरे सोने-चाँदी के आभूषण छीन लेंगे और तुझे नग्न और तिरस्कृत छोड़ देंगे। वे तेरे ऊपर भीड़ ले आएँगे, तुझे पत्थरवाह करेंगे, तेरे मकान तलवार से काट डालेंगे। वे तेरे वस्त्र जला देंगे, तेरी भीड़ के सामने तेरा न्याय करेंगे। और तब तुझे रक्तपात करने वाली स्त्री के समान ठहराया जाएगा।
पर फिर भी, मैं अपनी वाचा याद रखूँगा। तेरी यौवनावस्था की वाचा। और मैं तेरे साथ एक सनातन वाचा बाँधूँगा। तब तू जान लेगी कि मैं यहोवा हूँ। ताकि तू लज्जित हो, और भविष्य में अपना मुँह न खोल सके, जब मैं तुझे तेरे सब किए का प्रायश्चित कराऊँ।
हवा अब भी चल रही थी। शब्द खत्म हो गए थे, पर उनकी गूँज पत्थर की दीवारों में सिमटी रह गई थी। एक इतिहास की धूल में पड़ी हुई लड़की, राजकुमारी बनी, फिर राजकुमारी से वेश्या। और अंत में, लज्जित, पर शायद, शायद फिर से किसी वाचा का इंतज़ार करती हुई।




