मिसपा का किला सूरज की तिरछी किरणों में एक उदास सुनहराई लिए खड़ा था। यह वह स्थान था जहाँ बाबुल के हाकिम नबूजरदान ने गदल्याह को अधिकार सौंपा था—यहूदा के बचे-खुचे लोगों की बागडोर। हवा में धूल और हार का गंध था। किले के भीतर का आँगन, जहाँ अंगूर की एक बेल दीवार पर चढ़ी थी, उस दिन सन्नाटे से भरा हुआ प्रतीत होता था।
गदल्याह, शपन के पोते, एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके चेहरे पर शांति का भाव था, मानो उन्होंने विपदा को आत्मसात कर लिया हो। वे यहोवा के वचन को मानते थे, कि बाबुल के सामने झुकना ही इस समय की बुद्धिमानी है। पर उनकी इस शांति के आस-पास कई लोगों की आँखों में संदेह और चिड़चिड़ाहट की चिंगारी दहक रही थी। उनमें से एक था इश्माएल, नतन्याह का पुत्र, जो राजवंश से ताल्लुक रखता था। उसके मन में गदल्याह की नीति को लेकर कड़वाहट घर कर गई थी। वह इसे देशद्रोह समझता था, भगवान की सेवा नहीं।
वह दिन सातवें महीने का था। आँगन में कुछ लोग इकट्ठा थे। दूर से आते हुए दस पुरुषों को देखा जा सकता था, उनके हाथों में अन्न के बंधन और पुराने तेल के घड़े थे। वे शकर्याह के पुत्र येहोहानान के साथ आए थे, जो गदल्याह को बार-बार चेतावनी दे चुके थे। “इश्माएल के मनसूबे अच्छे नहीं हैं,” येहोहानान ने एक दिन गदल्याह से कहा था, “वह तुम्हारा खून करने आया है।” पर गदल्याह ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। शायद वे विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि कोई इतना नीचा गिर सकता है।
इश्माएल ने उस दिन एक मीठी मुस्कान के साथ स्वागत किया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चिकनाहट थी, जैसे कोई जानवर शिकार पर निकलने से पहले शांत रहता है। गदल्याह ने सबको भोजन के लिए आमंत्रित किया। लोग बैठे, बातचीत हुई। हवा में भुने हुए अन्न की खुशबू फैली। तभी अचानक इश्माएल ने एक तेज सीटी बजाई। यह संकेत था।
उसके साथ आए दस आदमियों ने अचानक अपने वस्त्रों के भीतर छिपे हथियार निकाल लिए। आँगन में चीखों का एक मंजर सा खड़ा हो गया। गदल्याह ने हैरानी से देखा, उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक गहरी पीड़ा थी, मानो वे कह रहे हों—’क्यों?’ इश्माएल का हाथ चमकती हुई तलवार लिए आगे बढ़ा। एक ही वार में वह भरोसा, वह शांति, टुकड़े-टुकड़े हो गई। गदल्याह के शरीर ने ज़मीन को छुआ। खून ने मिट्टी को गाढ़ा और लाल कर दिया।
पर वहाँ मौजूद और भी लोग थे—कुछ बाबुली सैनिक, कुछ अन्य यहूदी। इश्माएल की हिंसा की आग ठंडी नहीं हुई। उसने एक-एक कर सबको मार डाला। आँगन की दीवारें उस नरसंहार की गूँज सोखती रहीं। सूरज ने आकाश में अपनी आँखें फेर लीं, मानो वह भी यह दृश्य न देखना चाहता हो।
अगले दिन, शहर से लगभग पौन मील दूर, एक कुआँ था जिसे राजा आसा ने बनवाया था। वहाँ से अस्सी लोग आ रहे थे, उनके हाथों में अन्नबलि और धूप थी। वे मंदिर के खंडहरों की ओर जा रहे थे, दुखी मन से, अपने टूटे हुए दिल लिए। इश्माएल ने उन्हें देखा। उसने एक और चाल चली। रोते हुए बाहर निकला, मानो उसका भी दिल टूट गया हो। “आओ,” उसने कहा, “गदल्याह से मिलो।” जब वे बेखबर किले के भीतर पहुँचे, तो इश्माएल ने फिर वही किया। उनमें से सत्तर को कत्ल कर डाला। केवल दस बचे, जिन्होंने अपनी जान बचाने के लिए गेहूँ और जौ और तेल के अपने भंडार का लालच दिया।
मृतकों के शव उसी कुएँ में फेंक दिए गए, जिसे राजा आसा ने बनवाया था। एक समय का जीवनदायी स्रोत अब मौत का गड्ढा बन गया। इश्माएल ने बचे हुए लोगों को, राजकुमारियों सहित, जिन्हें बाबुली हाकिम ने गदल्याह को सौंपा था, बंदी बना लिया और रामा की ओर कूच करने लगा। उसका इरादा बाबुल के दुश्मनों के पास जाने का था।
पर यहोहानान और उसके साथी, जो इश्माएल से बच निकले थे, सब जानते थे। उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया। एक गहरी उदासी और क्रोध से भरी सेना तैयार हुई। उन्होंने इश्माएल का पीछा किया। गिबोन के बड़े तालाब के पास उससे जा भिड़े। जब बंदियों ने येहोहानान और उसके लोगों को देखा, तो उनमें से ख़ुशी की एक चीख निकली। वे इश्माएल के चंगुल से भागकर येहोहानान के पास आ मिले।
इश्माएल, अपने आठ आदमियों के साथ, भाग निकला। वह बेन-हिन्नोम की घाटी की ओर भागा, और फिर अम्मोनियों के पास। उसके पीछे छूट गया था केवल रक्त, धोखा, और एक सबक।
येहोहानान और उसके साथी बचे हुए लोगों को लेकर खिमाम के पास एक धर्मशाला में रुके। वे सभी डरे हुए थे। उनके सामने एक सवाल था—अब क्या? बाबुल का राज्यपाल जब यह सब सुनेगा, तो क्या प्रतिशोध नहीं लेगा? उनके मन में मिस्र जाने की इच्छा जागी, वह दूर का, सुरक्षित स्थान। पर वे भूल गए कि यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता अभी भी उनके बीच था, और यहोवा की आवाज़ चाहता था कि वे इस देश में ही बने रहें।
यह कहानी सिर्फ एक राजनीतिक हत्या की नहीं है। यह उस अविश्वास की कहानी है जो भगवान की योजना को नहीं समझ पाता। गदल्याह की शांति और इश्माएल की हिंसा के बीच का यह टकराव, दिखाता है कि कैसे मनुष्य अपने छोटे-छोटे षड्यंत्रों में उलझ कर, एक बड़ी प्रभुता को नज़रअंदाज़ कर देता है। वह कुआँ, जहाँ शव पड़े थे, आज भी एक गवाह है—हर विश्वासघात की कीमत आखिरकार, उसी धरती को चुकानी पड़ती है, जिसे छोड़कर भागने का मन होता है।




