पवित्र बाइबल

पाप से पवित्रता की ओर

यरूशलेम की वह सुबह ठंडी और धुंधली थी। हवा में नमी थी, और टूटे हुई शहर की दीवारों के पत्थरों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। बाबुल की लंबी गुलामी से लौटे लोगों के चेहरों पर थकान और एक अधूरी आशा दोनों थे। मंदिर के खंडहर अभी भी वहीं थे, चुपचाप यह गवाही दे रहे थे कि पुनर्निर्माण का काम धीरे-धीरे ही आगे बढ़ रहा था।

और इसी बीच, महायाजक यहोशू अपनी छोटी सी कोठरी में बैठे थे। उनके सामने रखे थे याजकीय वस्त्र, पर वे वस्त्र अब पहनने लायक नहीं थे। उन पर मैल की परत जम गई थी, धूल और राख से सने हुए, फटे और जले हुए। वे वस्त्र केवल कपड़े नहीं थे, वे एक प्रतीक थे। पूरे इस्राएल के पाप का प्रतीक, उसकी विफलता और गिरावट का प्रतीक। यहोशू ने अपने हाथों को देखा। वे भी मैले थे। वह जानता था कि उसके पूर्वजों ने क्या किया था, और वह स्वयं भी कितना लाचार महसूस करता था। परमेश्वर की सेवा करने वाला यह पद कितना भारी था। उसकी आँखों के आगे धुंध छा गई, और एक गहरी, दबी हुई आह उसके सीने से निकली। प्रार्थना के शब्द उसके होंठों तक आकर रुक गए। क्या कहता? किस मुँह से पुकारता?

तभी, बिना किसी चेतावनी के, वह स्थान बदल गया। कोठरी की दीवारें धुँधली पड़ गईं, मानो कोहरे में लिपट गई हों। हवा में एक कंपन था, एक सनसनी जैसे कोई सुनने के लिए तैयार बैठा हो। यहोशू ने अपने आप को एक विशाल, पत्थर से बने हुए आंगन में पाया। वह आंगन परिचित था, पर अजनबी भी। वह परमेश्वर के स्वर्गीय न्यायालय के द्वार पर खड़ा था। उसकी चेतना एकदम सजग हो उठी, और उसने स्वयं को देखा – वही मैले, घिनौने वस्त्र पहने हुए, जो उसकी कोठरी में पड़े थे। उसे अपने शरीर से बदबू आ रही थी – पाप की बदबू, असफलता की दुर्गंध।

और वहाँ, उसके दाहिने हाथ की ओर, एक और प्राणी खड़ा था। उसकी उपस्थिति से हवा जहरीली हो गई। वह दृश्यमान नहीं था पूरी तरह से, बस एक भयावह छाया थी, एक ऐसी नज़र जो चुभती थी। वह शैतान था, अभियोग लगाने वाला। उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दी, पर उसके आरोप हवा में गूँजने लगे, जैसे सियार की हँसी। “देखो,” वह कह रहा था, मानो सारे स्वर्ग को संबोधित कर रहा हो। “इसे देखो। यह है परमेश्वर का चुना हुआ महायाजक। उसके वस्त्रों को देखो। उसके हृदय को देखो। क्या यही है वह पवित्रता जिसकी तुम्हें अपेक्षा है? यह तो मानवता के पाप में लथपथ है। यह अयोग्य है। यह निन्दनीय है।”

यहोशू सिर झुकाए खड़ा रहा। आरोप सच थे। उसके पास कहने को कुछ नहीं था। वह निरुत्तर था। उसकी आत्मा भारी थी, और वह अपनी शर्म के सामने झुक गया। उसने परमेश्वर के सिंहासन की ओर देखने का साहस नहीं किया।

तभी एक आवाज़ गूँजी। वह आवाज़ सिंहासन से आई, गरजती हुई पर दया से भरी, ऐसी आवाज़ जो ब्रह्मांड की नींव रखते समय सुनाई दी होगी। “हे शैतान,” प्रभु ने कहा। “प्रभु तुझे डाँटे। हे शैतान, यहोशू को डाँटे प्रभु, जिसने यरूशलेम को चुन लिया है। क्या यह लकड़ी में से निकाली हुई जलती हुई लुकाठी नहीं है?”

शब्दों में एक ताड़ना थी, एक अधिकार था। अभियोग लगाने वाली वह छाया पीछे हट गई, मानो उस पर कोई भारी हाथ पड़ा हो। उसकी फुसफुसाहट बंद हो गई। और फिर प्रभु ने अपने सामने खड़े स्वर्गदूतों से कहा, जिनके चेहरे प्रकाश से झिलमिला रहे थे, “इसके मैले वस्त्र उतार डालो।”

यहोशू ने महसूस किया कि अदृश्य हाथ उसे छू रहे हैं। वे हाथ कोमल थे, पर शक्तिशाली। उसके शरीर से वे गंदे, फटे कपड़े निकाले जा रहे थे। हर परत के उतरने के साथ, वह हल्का महसूस करने लगा। उस शर्म की गाँठ, उस दोष का भार, जो उस पर चिपका हुआ था, वह छूट रहा था। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे रोना आ रहा था।

और तब प्रभु की आवाज़ फिर आई, अब और अधिक कोमल, एक पिता की आवाज़ की तरह। “देखो, मैंने तेरा अधर्म तुझसे दूर किया है, और तुझे महंगे वस्त्र पहनाए हैं।”

नए वस्त्र लाए गए। वे किसी ऐसे मुलायम सूत के बने थे जैसा यहोशू ने कभी नहीं देखा था। सफेद, चमकदार, बिना किसी दाग के। उन पर सुनहरी किनारी थी, और वे हल्के थे मानो हवा के बने हों। स्वर्गदूतों ने उसे वे वस्त्र पहनाए। उस सफेद चोगे का स्पर्श उसकी त्वचा पर एक शांति की लहर छोड़ गया। वह भूल गया कि मैल क्या होता है। वह भूल गया कि दाग क्या होता है। उसकी साँसें आसान हो गईं।

पर दृष्टांत अभी खत्म नहीं हुआ था। स्वर्गदूतों के प्रमुख, जिसके मुखमंडल से एक अद्भुत प्रकाश निकल रहा था, यहोशू के पास आया और बोला, “यदि तू मेरे मार्गों पर चलेगा, और मेरी व्यवस्था का पालन करेगा, तो तू मेरे भवन की देखभाल करेगा, और मेरी आँगनों में रक्षक का काम करेगा, और मैं तुझे इनके बीच जाने आने का अधिकार दूंगा जो यहाँ खड़े हैं।”

शब्द स्पष्ट थे, और एक शर्त भी थी। यह केवल कपड़े बदलने का नहीं, बल्कि जीवन बदलने का आह्वान था। अनुग्रह मुफ्त में मिला था, पर उसके साथ एक पवित्र जिम्मेदारी भी आई थी। यहोशू का हृदय धड़क रहा था – अब डर से नहीं, बल्कि कृतज्ञता और एक नए संकल्प से।

और तब प्रभु ने फिर कहा, जैसे कोई महत्वपूर्ण रहस्य बता रहा हो। “सुन, हे महायाजक यहोशू, तू और तेरे साथी जो तेरे सामने बैठते हैं, क्योंकि वे आनेवाले चिन्ह हैं। देख, मैं अपने सेवक, जिसका नाम अंकुर है, को ले आऊँगा।”

यहोशू ने समझ लिया। यह केवल उसके बारे में नहीं था। वह स्वयं एक प्रतीक था। वह मसीहा का, उस अंकुर का साया था जो एक दिन आएगा। वह जिस पवित्रता से अब ढका हुआ था, वह उसकी अपनी नहीं थी। वह आने वाले उस एक की धार्मिकता थी, जो पाप को सदा के लिए दूर कर देगा। उसकी आँखों में आँसू आ गए। यह उसके लिए बहुत बड़ी बात थी, बहुत गहरी।

वह दृष्टांत धीरे-धीरे समाप्त हुआ। स्वर्गीय आँगन का प्रकाश मद्धिम पड़ने लगा। यहोशू ने अपने आप को फिर उसी कोठरी में पाया, जहाँ वह बैठा था। सुबह का पहला सूरज की किरण खिड़की से आ रही थी, और वह धूल के कणों में नाच रही थी। उसकी आँखें नम थीं, पर उसके चेहरे पर एक नई दृढ़ता थी। वह उठा। बाहर, यरूशलेम की सड़कें जाग रही थीं। लोगों की आवाज़ें आ रही थीं। मंदिर के पुनर्निर्माण का काम फिर शुरू होने वाला था।

यहोशू ने अपने साधारण वस्त्र पहने, पर अब वह जानता था कि उसके भीतर कुछ बदल गया था। उसे न्यायालय से एक वस्त्र मिला था, एक ऐसा वस्त्र जो कभी मैला नहीं होगा। और उसे एक वादा मिला था – न केवल अपने लिए, बल्कि अपने सब लोगों के लिए, कि एक दिन अंकुर आएगा, और सब कुछ साफ हो जाएगा। उसने दरवाज़ा खोला, और सीधी, स्पष्ट धूप में कदम रखा। आगे का काम बहुत था, पर अब वह अकेला नहीं था।

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