एक सर्द सुबह, यरूशलेम के पुराने तपस्वी याजक, एलीआजर, अपनी कुटिया की खिड़की से पूर्व की ओर देख रहे थे। धुंध के पार सूरज की पहली किरणें हल्की सुनहरी धारियाँ बिछा रही थीं। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। कल रात फिर वही स्वप्न आया था – नापने का डोरा, एक अद्भुत नदी, और भूमि के टुकड़े जो आकाश तक फैले प्रतीत होते थे। यह कोई साधारण सपना नहीं था; यह एक दर्शन था, और वह जानता था कि यह उस प्रवासी नबी यहेजकेल के वचनों से जुड़ा था, जिसकी पुस्तक वह बरसों से पढ़ता आया था।
उसने अपने मोटे कोट को कसकर लपेटा और बाहर निकल आया। हवा में नमी थी। वह शहर की ओर चल पड़ा, पर उसका मन उस दर्शन में ही अटका था। यहेजकेल का अंतिम अध्याय… जो भूमि का बँटवारा बताता है। लोग अक्सर इसे केवल नक्शे की तरह पढ़ लेते, पर एलीआजर को लगता था कि इसमें कोई गहरा रहस्य छिपा है। यह सिर्फ ज़मीन के टुकड़े नहीं थे। यह परमेश्वर की व्यवस्था का चित्र था। एक पवित्र व्यवस्था।
वह मन्दिर के पास एक पुराने जैतून के पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें बंद करके, उसने उस दर्शन को फिर से अपने सामने होते देखा। एक विशाल भूखण्ड, समुद्र से पूर्व दिशा तक फैला हुआ। और उसके बीचों-बीच, एक पवित्र भाग, जैसे किसी राजमहल का आँगन। उत्तर में दान, आशेर, नप्थाली… दक्षिण में शिमोन, इस्साकार, ज़बूलून… सबके सब, एक के बाद एक, सीमाओं से बँधे हुए। इतना सब कुछ, पर इतना सुव्यवस्थित। हर गोत्र का अपना स्थान। कोई झगड़ा नहीं, कोई हड़प नहीं। यह तो शांति का नक्शा था।
पर सबसे हैरान करने वाली बात थी वह पवित्र भाग। बिल्कुल बीच में। परमेश्वर के लिए अलग किया गया। और उस पवित्र भाग के भीतर, एक और छोटा वर्ग – याजकों के लिए। सादोक की संतानें, जो विश्वास में स्थिर रहीं। फिर लेवीयों का भाग। और अंत में, शहर की भूमि – यरूशलेम, सबके केंद्र में, सबके लिए सुलभ। एलीआजर के होठों पर एक मुस्कराहट फैल गई। यह कितना सुन्दर था। परमेश्वर का निवास स्थान सबके बीच में, और उसके चारों ओर, उसकी प्रजा, व्यवस्था और शांति में बसी हुई।
तभी उसकी कल्पना में एक और दृश्य उभरा। वह नदी, जो मन्दिर की देहली से निकलती थी। वह नदी जो पूर्व की ओर बहती हुई, अराबा से होकर मृत सागर में जाती थी। यहेजकेल ने लिखा था – वह जहाँ कहीं भी जाएगी, जीवन लाएगी। खारे पानी को मीठा कर देगी। और उसके किनारे जीवन के वृक्ष उगेंगे, जो महीने-महीने नए फल देंगे, और उनके पत्त लोगों के अर्श के काम आएंगे।
एलीआजर की आँखें खुल गईं। उसने देखा, सामने एक बच्चा अपनी भेड़ों को हाँकते हुए जा रहा था। उसका मन भर आया। यह दर्शन सिर्फ भविष्य की बात नहीं थी। यह एक सत्य था जो आज भी काम कर रहा था। परमेश्वर की व्यवस्था, उसका क्रम, उसकी पवित्रता का विचार… यह सब एक नदी की तरह था जो इतिहास में बहती आई थी और अभी भी बह रही थी। हर विश्वासी का जीवन, हर समुदाय, उस पवित्र केंद्र के आसपás बसा होना चाहिए। उसकी धार्मिकता के जल से सिंचित।
वह उठ खड़ा हुआ। शाम ढलने लगी थी। पश्चिम में आकाश नारंगी और बैंगनी रंगों में सनी हुई थी। उसे अचानक एहसास हुआ। यहेजकेल का यह बँटवारा, यह केवल भूमि का नहीं था। यह हृदय का बँटवारा था। हर एक का जीवन परमेश्वर के लिए पवित्र भाग, सेवा के लिए अलग किया गया भाग, और समुदाय के बीच रहने का भाग – इन सबसे मिलकर बना था। और जब वह जीवन की नदी – वह दिव्य जल – बहता है, तो हर चीज़ फलती-फूलती है। निर्जल मरुस्थल भी हरे-भरे बगीचे बन जाते हैं।
वह धीरे-धीरे अपनी कुटिया की ओर लौटा। रास्ते में उसने एक सूखा हुआ अंजीर का पेड़ देखा। पर उसकी आँखों में अब वह सूखा पेड़ नहीं था। उसने देखा कि कल्पना में उसकी जड़ों तक जीवन की नदी का पानी पहुँच रहा है, और वह फिर से हरा-भरा हो उठा है, महीने-महीने नए फल दे रहा है।
घर पहुँचकर उसने अपनी पुरानी यहेजकेल की पुस्तक खोली। अध्याय अड़तालीस के अंतिम शब्दों पर उसकी नज़र ठहर गई – “शहर का नाम उस दिन से ‘यहोवा वहाँ है’ होगा।” एलीआजर ने सिर हिलाया। यही तो बात थी। यह सब भूमि, यह बँटवारा, यह नदी, यह सब इसलिए था ताकि हर कोई जान सके – यहोवा वहाँ है। बीच में। केंद्र में। हर गोत्र के बीच। हर हृदय के भीतर।
बाहर अँधेरा हो चला था, और पहला तारा टिमटिमा रहा था। पुराने याजक ने दीपक जलाया। उसके चेहरे पर एक शांति थी। दर्शन अब सिर्फ शब्द नहीं रहा था। वह एक वास्तविकता बन चुका था – उसकी अपनी भूमि में, उसकी अपनी आत्मा के मानचित्र पर, जहाँ हर इंच जगह प्रभु के लिए पवित्र थी, और जीवन की नदी लहरा रही थी।




