पवित्र बाइबल

पाँव धोने का पाठ

कमरा बड़ा था, पर उस रात हवा में एक तनाव सा भरा था, जैसे कोई भारी बादल छत के ऊपर मंडरा रहा हो। चारों ओर फैली हल्की सी जैतून की लकड़ी की खुशबू, मोमबत्तियों के टिमटिमाते लौ से मिलकर, दीवारों पर लंबी-लंबी परछाइयाँ नचा रही थी। यीशु मेज़ के सिरहाने बैठे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सा भार था, एक गहरा ज्ञान जो शायद ही किसी ने पहले देखा हो। वह जानते थे कि उनका वक्त करीब आ गया है। पासखा का भोजन चल रहा था, पर बातचीत में वह उत्सवी रंग नहीं था। हर कोई, बारहों, किसी न किसी अपनी उलझन में डूबा हुआ था।

तभी यीशु ने धीरे से उठकर अपना ऊपरी वस्त्र एक ओर रख दिया। एक साधारण चीर लपेटकर, वह एक बर्तन में पानी ले आए और तौलिया कंधे पर डाल लिया। चेले हैरानी से देख रहे थे। उनके दिमाग में तरह-तरह के सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे। शायद वह कुछ विशेष प्रार्थना करने जा रहे हैं? या फिर मेज़ सजाने का कोई और काम?

पर जो हुआ, वह किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।

यीशु एक-एक करके उनके पास गए, और उनके पाँव धोने लगे।

यह कोई प्रतीकात्मक कार्य नहीं था। यह बहुत ही मूर्त, बहुत ही साधारण, और उस समय की दुनिया में दासों का काम था। ठंडे पानी की आवाज़, उनके हाथों की कोमल पकड़, और धूल-मिट्टी से सने पाँवों का साफ़ होना… कमरा स्तब्ध था। सिर्फ पानी की छप-छप और मोमबत्ती की बत्ती के चटचटाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

शमौन पतरस तो जैसे स्थिर हो गया। जब यीशु उसके पास पहुँचे, तो वह बैठा न रह सका। “प्रभु!” उसकी आवाज़ फटी हुई थी, भावनाओं से दबी हुई। “क्या आप मेरे पाँव धोएँगे?”

यीशु ने सिर उठाकर देखा। उनकी नज़रों में दया थी, एक सहज स्वीकारोक्ति। “जो मैं कर रहा हूँ, तू अभी इसका अर्थ नहीं समझेगा,” उन्होंने कहा, “पर बाद में समझ जाएगा।”

पतरस का सिर जिद से हिल गया। उसका गर्व, उसकी भक्ति, इस दृश्य को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। “नहीं,” उसने दृढ़ता से कहा, “आप कभी मेरे पाँव नहीं धोएँगे।”

यीशु की आवाज़ में एक हल्की सी कठोरता आई, वह कठोरता जो प्रेम से पैदा होती है। “यदि मैं तुझे न धोऊँ, तो तुझे मेरे साथ कोई भाग नहीं।”

यह वाक्य पतरस के दिल पर गिरा जैसे कोई पत्थर गिरे। उसकी आँखें चौंधिया गईं। फिर, अपनी पूरी तीव्रता के साथ, उसने कहा, “प्रभु, तो केवल पाँव ही नहीं, बल्कि हाथ और सिर भी धो डालिए!”

यीशु मुस्कुराए, वह मुस्कुराहट जिसमें एक पूरी शिक्षा समाई हुई थी। “जो नहा चुका है,” उन्होंने समझाते हुए कहा, “उसे केवल पाँव धोने की ज़रूरत है, वह पूरा शुद्ध है। और तुम शुद्ध हो… पर सब नहीं।”

उन्होंने यह कहा तो सबके सामने, पर उनकी नज़रें कहीं और थीं। एक ऐसा ज्ञान, जो दिल को चीर देने वाला था। वह जानते थे कि उन्हें धोखा देने वाला कौन है। पर उन्होंने नाम नहीं लिया।

फिर वह अपना काम करते रहे। एक के बाद एक। पानी गर्म होता गया, पर उनके हाथों का स्पर्श वैसा ही कोमल बना रहा। यूहन्ना, जो उनके सबसे करीब बैठा था, देखता रहा। उसे लगा जैसे यह कोई दृश्य नहीं, बल्कि एक जीवित दृष्टांत है, जो उसकी आँखों के सामने घट रहा है। अन्द्रियास, फिलिप्पुस, और बाकी सब… हर एक के चेहरे पर अलग-अलग भाव उतरते-चढ़ते रहे। हैरानी, शर्म, एक गहरी चुप्पी, और फिर एक अद्भुत हल्कापन, जैसे कोई बोझ उतर गया हो।

जब वह अपने स्थान पर वापस बैठे, तो उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक गहरी संतुष्टि थी। “क्या तुम समझते हो मैंने तुम्हारे साथ क्या किया है?” उन्होंने पूछा। “तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो, और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ। यदि मैंने तुम्हारे पाँव धोए, जो तुम्हारा प्रभु और गुरु हूँ, तो तुम्हें भी एक-दूसरे के पाँव धोने चाहिए। मैंने तुम्हें एक आदर्श दिया है, कि जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया, तुम भी वैसा ही करो।”

उनके शब्द कमरे की हवा में लटक गए। यह कोई नया नियम नहीं था। यह उसकी गहराई में जाने वाली एक बुनियादी सच्चाई थी। प्रभुत्व सेवा में है। महानता दीनता में है। प्रेम वह है जो झुकता है, धोता है, साफ करता है।

पर फिर, उस पवित्र क्षण के बीच, एक कड़वाहट घुल गई। यीशु ने कहा, “जो सब कुछ जानता है, उस पर मैं भरोसा नहीं करता। मैं जानता हूँ कि मैंने किसे चुना है। परन्तु यह इसलिए है कि जो लिखा है, वह पूरा हो: ‘जो मेरी रोटी खाता है, उसने मेरे विरुद्ध अपनी एड़ी उठाई।'”

हवा में सन्नाटा लटक गया। चेले एक-दूसरे की ओर देखने लगे, उनकी आँखों में सवाल था: ‘कौन?’ यहूदा इस्करियोती चुपचाप बैठा था। उसके हाथ में वह रोटी का टुकड़ा था, जो यीशु ने डुबोकर उसे दिया था। वह टुकड़ा अब जहर लग रहा था। उसने यीशु की आँखों में देखा, और उन आँखों में उसे कोई आश्चर्य नहीं, कोई क्रोध नहीं, सिर्फ एक असीम दुख दिखाई दिया, एक ऐसा दुख जो सब कुछ जानता था, और फिर भी प्रेम करता था।

“जो तुम करने जा रहे हो, जल्दी करो,” यीशु ने धीरे से कहा।

और वह व्यक्ति, अंधेरी रात में घुल जाने के लिए, उठकर चला गया। दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। बाहर अँधेरा गहरा था।

पर कमरे के भीतर, एक नई बात पैदा हो गई थी। भले ही विश्वासघात की छाया दरवाज़े से बाहर निकल चुकी थी, पर जो बात यीशु ने कही थी, वह वहीं रह गई थी। “मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ: एक-दूसरे से प्रेम रखो। जैसा मैंने तुमसे प्रेम रखा, वैसे ही तुम भी एक-दूसरे से प्रेम रखो।”

यह आज्ञा नहीं थी। यह एक नई सृष्टि का आधार था। पाँव धोने का पानी अब सूख चुका था, पर उसकी नमी उनके दिलों में समा गई थी। रात आगे बढ़ी, और जो कुछ होना था, वह होने को था। पर उस कमरे में, उस घड़ी में, एक ऐसा बीज बो दिया गया था जिसकी जड़ें समय और मृत्यु से भी गहरी थीं। सेवा। समर्पण। प्रेम। यही निशानी होगी। हमेशा के लिए।

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