पवित्र बाइबल

पहाड़ पर यीशु का रूपान्तरण

पहाड़ की हवा में एक तरोताज़ा करने वाली ठंडक थी, ठीक उस सुबह जब यीशु ने पतरस, याकूब और उसके भाई यूहन्ना को साथ लिया और उन्हें एक ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने के लिए कहा। चढ़ाई आसान नहीं थी। पैरों के नीचे की छोटी पत्थरियाँ फिसलतीं, काँटेदार झाड़ियाँ चोटिल करतीं। याकूब ने अपने मोटे कपड़े से पसीना पोंछा, और पतरस ने एक लम्बी साँस भरी—”उफ़, अब कितना और?” यीशु चुपचाप आगे बढ़ रहे थे, उनकी नज़रें किसी दूरस्थ लक्ष्य पर टिकी हुईं, मानो वे किसी निमंत्रण का जवाब दे रहे हों।

जब वे शिखर के करीब पहुँचे, तो दिन का प्रकाश एक अजीब सी मुलायम चमक में बदलने लगा। हवा भी स्थिर हो गई, जैसे सारी सृष्टि साँस रोके खड़ी हो। और फिर वह हुआ—एक क्षण में, यीशु का चेहरा सूर्य की भाँति चमक उठा, और उनके वस्त्र इतने उजले हो गए कि आँखें चौंधिया गईं, जैसे बर्फ़ पर पड़ती धूप। पतरस की साँस अटक गई। उसने कभी ऐसा कुछ नहीं देखा था। और तभी, वहाँ, यीशु के साथ, मूसा और एलिय्याह प्रकट हुए, धुंधली-सी पर स्पष्ट आकृतियाँ, वे यीशु से बातें कर रहे थे, उनके मुख पर गम्भीरता थी, मानो कोई गूढ़, अत्यंत महत्वपूर्ण बातचीत हो रही हो।

पतरस का मन भावनाओं से उमड़ पड़ा। डर, आश्चर्य, एक अद्भुत आनन्द—सब कुछ मिला-जुला। उसने बिना सोचे कहा, “हे प्रभु, यहाँ रहना कितना अच्छा है! यदि तू चाहे, तो मैं यहाँ तीन डेरे बनाऊँ—एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए, और एक एलिय्याह के लिए।” वह और कुछ कहता, इससे पहले ही एक चमकती हुई बादल ने उन सबको ढक लिया। और उस बादल से एक वाणी सुनाई दी—गम्भीर, कोमल, पर सब कुछ हिला देने वाली: “यह मेरा प्यारा पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ; इसी की सुनो।”

तीनों शिष्य मुंह के बल गिर पड़े, अत्यंत भय से काँपते हुए। कितनी देर वे वैसे पड़े रहे, पता नहीं। फिर एक हल्का सा स्पर्श हुआ। यीशु ने उन्हें छुआ और कहा, “उठो, डरो मत।” जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो केवल यीशु अकेले खड़े थे, साधारण वस्त्रों में, वही स्नेह से भरी मुस्कान चेहरे पर। आकाश फिर से साफ़ था, पक्षी चहचहा रहे थे।

उतरते समय का रास्ता सुनसान लग रहा था। यीशु ने शान्त भाव से कहा, “जब तक मनुष्य के पुत्र मरे हुओं में से न जी उठें, तब तक इस दर्शन की चर्चा किसी से न करना।” वे सोच में पड़ गए—”मरे हुओं में से जी उठना”? इसका क्या अर्थ हो सकता है? पर उनमें इतना साहस नहीं था कि पूछ सकें।

पहाड़ के तलहटी में पहुँचते ही, एक अलग ही दृश्य मिला। भीड़ का एक झुंड, कुछ शास्त्री उनके शेष शिष्यों से बहस कर रहे थे। चिल्लाहट, हताशा से भरे चेहरे। एक आदमी, उसका चेहरा बेदम दौड़ने से लाल, यीशु के पास दौड़ा आया और घुटनों के बल गिर पड़ा। “हे प्रभु, मेरे पुत्र पर दया कर! वह चन्द्रग्रहण से पीड़ित है, और बड़ा कष्ट उठाता है। वह कभी आग में गिर जाता है, कभी पानी में। मैंने तेरे चेलों के पास लाया, पर वे उसे ठीक नहीं कर सके।”

यीशु के चेहरे पर एक क्षण की झलक दिखी—थकान की? दुख की? उन्होंने एक लम्बी साँस ली और कहा, “हे अविश्वासी और टेढ़ी जाति, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूँगा? कब तक तुम्हारी सहूँगा? लड़के को यहाँ लाओ।”

लड़के को लाया गया। वह तुरन्त ही एक भयानक दौरे में पड़ गया, ज़मीन पर लुढ़कने लगा, मुँह से झाग निकलने लगा। पिता की आँखों में आँसू थे। यीशु ने पिता से पूछा, “उसे यह कब से है?” पिता ने हिचकिचाते हुए कहा, “बचपन से। कई बार वह आग में या पानी में गिर जाता है, जान बचाना मुश्किल हो जाता है। परन्तु यदि तू कुछ कर सकता है, तो हम पर दया कर, हमारी सहायता कर।”

यीशु ने उसकी ओर देखा, और उनकी आवाज़ में एक विशेष दृढ़ता थी, “यदि तू विश्वास कर सकता है, तो सब कुछ उसके लिए जो विश्वास करता है, संभव है।” पिता तुरन्त चिल्लाया, और उसकी आवाज़ टूटी हुई थी, “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ! मेरे अविश्वास का उपचार कर!”

भीड़ और भी इकट्ठी हो गई थी। यीशु ने फिर उस अशुद्ध आत्मा को डाँटा, “हे गूँगी और बहरी आत्मा, मैं तुझे आज्ञा देता हूँ, इस में से निकल आ, और फिर कभी इसमें प्रवेश न करना।” एक भयानक चीख़ निकली, लड़का एक ज़ोरदार झटके के साथ अचेत-सा होकर गिर पड़ा। लोग फुसफुसाने लगे, “वह मर गया।” पर यीशु ने उसका हाथ पकड़कर उसे उठा दिया। और लड़का उठ खड़ा हुआ, पूरी तरह स्वस्थ, उसकी आँखों में स्पष्टता लौट आई थी। पिता ने उसे गले लगा लिया, उसके कंधे रोने से हिल रहे थे।

बाद में, घर के भीतर, शिष्य एकत्र हुए। वे उदास थे। उनमें से एक ने धीरे से पूछा, “हम उसे क्यों नहीं निकाल सके?” यीशु ने उनकी ओर देखा, “तेरे अविश्वास के कारण। मैं तुम से सच कहता हूँ, यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो, तो तुम इस पहाड़ से कहोगे, ‘यहाँ से उठकर वहाँ चला जा,’ और वह चला जाएगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव न होगा। पर यह जाति प्रार्थना और उपवास के बिना नहीं निकलती।”

उन शब्दों ने उनके हृदय में गहराई तक उतरकर चोट पहुँचाई। वे समझ गए कि यह केवल बाहरी शक्ति का प्रश्न नहीं था। यह आत्मा की एक ऐसी स्थिति थी जो निरन्तर समर्पण और संयम माँगती थी। पहाड़ पर जो कुछ देखा था, वह और इस लड़के का चंगा होना—दोनों एक ही सत्य के दो पहलू थे। एक तरफ़ महिमा, दूसरी तरफ़ क्रूस का छायापथ। और इन दोनों के बीच में खड़ा था वह एकमात्र आधार—विश्वास, जो राई के दाने जितना छोटा भी हो, पर जीवित हो। शाम ढल रही थी, और उनके मन में एक नया, गम्भीर विचार धीरे-धीरे जगह बना रहा था।

LEAVE A RESPONSE

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *