उस गाँव का नाम था शांतिनगर, जो पहाड़ियों की एक शृंखला की गोद में बसा था। वहाँ की हवा में अक्सर देवदार के पेड़ों की सुगंध रहती, और गली-गली में लोगों की बातचीत में एक अजीब सा मधुरपन था। पर एक बात थी जो शांतिनगर को और भी खास बनाती थी – वहाँ रहने वाले हर व्यक्ति में कोई न कोई अनोखी कला, कोई न कोई विशेष योग्यता थी, मानो सृष्टिकर्ता ने हर किसी को कुछ खास देकर भेजा हो।
रामलाल गाँव का बढ़ई था। उसके हाथ लकड़ी से ऐसे बात करते थे कि वह रोती-बिलखती तख्ती बनने से इनकार करती लकड़ी भी, उसकी छेनी-हथौड़े के सामने गीत गाने लगती। एक दिन की बात है, उसने गाँव के छोटे से मंदिर के लिए एक अलंकृत द्वार बनाया, जिस पर फूल-पत्तियों की नक्काशी इतनी सजीव थी कि लगता था वे हवा के झोंके से हिल रहे हों। सभी देखते रह गए।
वहीं सीता देवी थीं, गाँव की विद्यालय में शिक्षिका। उनके पास शब्दों का वरदान था। वे बच्चों को कहानियाँ सुनातीं तो ऐसा लगता मानो दाऊद का हारफ, रूत की विरासत, या प्रभु यीशु के दृष्टांत साक्षात् उनकी आँखों के सामने घटित हो रहे हों। उनकी आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण था कि बच्चे तो क्या, बड़े भी मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह जाते।
और थे भोला, जो खेती करते थे। उनकी विशेषता उनकी सहज समझ थी। कोई भी झगड़ा हो, कोई भी दुख की बात हो, भोला के पास पहुँचते ही एक सरल समाधान निकल आता। वे बहुत ज्यादा बोलते नहीं थे, पर उनकी दो टूक, निस्वार्थ सलाह में इतना बल होता था कि लोगों के मन का भारीपन हल्का हो जाता।
पर एक समय ऐसा आया जब इन विशेषताओं ने ही गाँव में दरार डालनी शुरू कर दी। लोग तुलना करने लगे। कुछ कहने लगे कि रामलाल का हुनर तो देखो, उसके बिना मंदिर का द्वार कभी इतना मनमोहक न बन पाता। दूसरे कहते, “पर सीता देवी का ज्ञान कहीं बड़ी बात है। वह तो लोगों के दिमाग और आत्मा को आकार देती हैं।” कुछ युवा भोला की सरल समझ को हल्के में लेने लगे, “यह तो बस थोड़ी-बहुत सलाह दे देते हैं, इसमें ऐसा क्या खास?”
यह बहस धीरे-धीरे एक गहरे मनमुटाव में बदलने लगी। गाँव की वह सामूहिक भलाई का भाव, जो कभी उसकी पहचान था, कहीं खो सा गया। लोग अलग-अलग समूहों में बैठने लगे, एक-दूसरे के काम को कम करके आँकने लगे। गाँव का वह सामंजस्य टूट रहा था।
एक रविवार की सुबह, जब गाँव के लोग मंदिर के आँगन में इकट्ठा हुए, तो बूढ़े पंडित जी ने, जो सबका बहुत सम्मान करते थे, कुछ अलग करने का सोचा। उन्होंने अपने हाथ में पुराने समय से सँभालकर रखी एक पांडुलिपि उठाई और शांत स्वर में कहना शुरू किया।
“सुनो, भाइयो और बहनो,” उनकी आवाज़ में एक गहरा, थकान भरा प्यार था, “हमारी इस दुविधा पर प्रेरित पौलुस ने बहुत पहले ही प्रकाश डाल दिया था। वह कहता है कि एक ही आत्मा है, पर उसके अनेक प्रकार के दान हैं। एक ही प्रभु है, पर सेवा करने के अनेक तरीके। एक ही परमेश्वर है, जो सब में सब कुछ करता है।”
आँगन में सन्नाटा छा गया। पंडित जी ने आगे कहा, “शरीर एक है, पर उसके अनेक अंग हैं। क्या आँख हाथ से कह सकती है कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं? या सिर पैरों से कह सकता है कि तुम मेरे किस काम के? बल्कि, जो अंग कमजोर दिखते हैं, वे तो और भी आवश्यक हैं। परमेश्वर ने इस शरीर, यानी हमारे समुदाय को, इस तरह रचा है कि हर अंग दूसरे की चिंता करे। अगर एक अंग दुखी होता है, तो सब अंग दुखी होते हैं। अगर एक अंग का सम्मान होता है, तो सब अंग खुश होते हैं।”
उनकी बातें हवा में तैरने लगीं, और लोगों के चेहरों पर एक नई समझ उतरने लगी। रामलाल ने देखा कि सीता देवी के ज्ञान के बिना, उसकी नक्काशीदार द्वार पर लगे प्रतीकों का अर्थ कोई नहीं समझ पाता। सीता देवी ने महसूस किया कि भोला की सुलझी हुई समझ के बिना, उनकी सुनाई कहानियाँ सिर्फ कहानियाँ बनकर रह जातीं, जिन्हें जीवन में उतारने का मार्गदर्शन न मिलता। और भोला को एहसास हुआ कि रामलाल जैसे कारीगरों के हुनर के बिना, गाँव में वह सुंदरता और व्यवस्था ही न होती जिसमें शांति से विचार किया जा सके।
उस दिन के बाद से शांतिनगर की कहानी फिर से बदल गई। अब कोई अपने उपहार पर गर्व नहीं करता था, बल्कि उसे एक सौगात मानकर, दूसरों की सेवा में लगाता था। जब गाँव में बाढ़ आई, तो रामलाल ने नावें बनाईं, सीता देवी ने लोगों को साहस के शब्द दिए और भोला ने राहत कार्य की योजना बनाई। सबने मिलकर काम किया, क्योंकि अब वे जानते थे कि वे एक ही शरीर के अंग हैं।
और इस तरह, एक गाँव की साधारण सी कहानी में, प्रेरित के उन शब्दों ने जीवन पा लिया – “पर यह सब एक ही आत्मा कराता है, और अपनी इच्छा के अनुसार हर एक को अलग-अलग बाँटता है।” शांतिनगर में अब भी हर किसी का उपहार अलग था, पर उन सबकी आत्मा एक थी, और उनकी यात्रा एक साझी थी – प्रेम की, सेवा की, और उस एकता की जो सभी भेदों से ऊपर, सृष्टिकर्ता की महिमा में बँधी हुई थी।




