कई दिनों की यात्रा के बाद, समुद्र की हवा में एक खास नमकीनपन और एक ठंडी सी गंध थी। केसरिया। वह शहर जो समुद्र किनारे रोमन शक्ति की धमक की तरह खड़ा था। पौलुस, अभी भी जंजीरों से बंधा हुआ, अपनी सुरक्षा में चल रहे सैनिकों के बीच, उस विशाल गवर्नर-भवन के सामने खड़ा था। उसकी आँखों में थकान थी, पर आत्मा में एक अजीब सी शांति। यरूशलेम की गलियों में उस पर जो जानलेवा हमला हुआ था, उसकी याद अभी ताज़ा थी। परमेश्वर का दूत खड़ा हुआ था रात में, यह कहते हुए कि उसे रोम के सामने भी गवाही देनी है। और अब वह यहाँ था।
पाँच दिन बीत चुके थे। महायाजक अननियास, कुछ प्राचीनों और एक वकील के साथ, तेजी से आया। वकील, तुल्लुस नाम का, अपने महीन ऊनी वस्त्रों में, बहुत ही रोमन ढंग से ठाठ से सजा हुआ। उसकी आवाज़ में एक चिकनाहट थी, जो अदालत की भाषा में बोलने का अभ्यस्त था।
“हे महामहिम फेलिक्स,” उसने आदरपूर्वक सिर झुकाते हुए शुरुआत की, “आपकी वजह से हम लोग बड़े सुख से रह रहे हैं, और आपके विवेक से इस जाति के लिए बहुत से सुधार हुए हैं… हम इस आदमी को, जो पूरे संसार में यहूदियों में बवंडर मचाने वाला है, और नासरी के सम्प्रदाय का सरदार है, पकड़ लाए हैं।”
पौलुस ने धीरे से अपनी साँस ली। आरोप बहुत भारी थे। राजद्रोह का इल्ज़ाम। वह जानता था कि फेलिक्स, गुलाम से गवर्नर बना यह आदमी, बहुत चालाक और क्रूर था। पर उसने भरोसा किया। जब उसे बोलने का अवसर मिला, तो उसकी आवाज़ में नम्रता थी, पर दृढ़ता भी।
“मैं इस बात को जानता हूँ कि बहुत वर्षों से आप इस जाति के न्यायी हैं,” उसने कहा, “इसलिए मैं अपने बचाव में उत्तर देने के लिए हियाव बाँधता हूँ।” उसने स्पष्ट शब्दों में कहा – वह मात्र बारह दिन पहले यरूशलेम आया था, मन्दिर में उपासना करने। न कोई बहस की, न ही भीड़ जमा की। “पर जो बातें वे मुझ पर दोष लगाते हैं, उनमें से एक भी वे साबित नहीं कर सकते। पर यह बात मैं आप से कबूल करता हूँ, कि जिस मार्ग को वे ‘सम्प्रदाय’ कहते हैं, मैं उसी के अनुसार अपने पूर्वजों के परमेश्वर की उपासना करता हूँ… और मेरी आशा भी परमेश्वर पर है, जैसी इन्हीं की भी है, कि धर्मी और अधर्मी दोनों फिर जी उठेंगे।”
यह अंतिम बात थी जिसने कुछ उथल-पुथल मचा दी। दूर खड़े कुछ लोगों में फुसफुसाहट हुई। पुनरुत्थान का सिद्धांत। फेलिक्स, जो इस मामले को अच्छी तरह जानता था – उसकी पत्नी द्रुसिल्ला यहूदी थी – उसने कार्यवाही स्थगित कर दी। “जब लुसियास सहस्रपति नीचे आ जाएगा, तो मैं तुम्हारे मामले का निर्णय करूँगा,” उसने कहा, पर उसकी आँखों में कोई उत्सुकता नहीं थी।
पर फेलिक्स ने पौलुस को पूरी तरह मुक्त नहीं किया। उसे एक सैनिक की देखरेख में रखा गया, पर उसके मित्रों को उसकी सेवा करने की आज्ञा दी गई। कुछ दिनों बाद, फेलिक्स अपनी पत्नी द्रुसिल्ला के साथ आया। वह जानना चाहता था। “हमें मसीह यीशु के विषय में सुनना अच्छा लगेगा,” उसने कहा, पर उसके स्वर में राजनीतिक चतुराई झलक रही थी।
पौलुस ने बिना डरे बात रखी। धार्मिकता पर, संयम पर, और आने वाले न्याय पर। उसकी बातें इतनी सीधी और तीक्ष्ण थीं कि फेलिक्स व्याकुल हो उठा। “अभी जा,” उसने कहा, “सुविधा के समय मैं तुझे बुलवाऊँगा।” पर वह सुविधा का समय कभी नहीं आया।
बल्कि, उसके बाद तो फेलिक्स अक्सर बुलाता रहा। बातचीत के लिए नहीं, बल्कि इस आशा में कि शायद पौलुस का कोई मित्र उसके लिए कुछ धन ले आए। दो साल का लम्बा समय इसी तरह बीत गया। केसरिया की हवा में पौलिकों की खुशबू आती, समुद्र की लहरें एक ही लय में टकरातीं, और पौलुस उसी कैद में रहा। एक ऐसी कैद जो न तो पूरी तरह कारावास थी, न ही स्वतंत्रता। फेलिक्स के मन में डर था – यहूदियों का, और शायद अपने अंतःकरण का भी।
जब फेलिक्स का कार्यकाल समाप्त हुआ, तो उसने पौलुस को बंदी बनाए रखा। यहूदियों को खुश करने की एक और कोशिश। एक निर्णयहीनता जिसने एक आदमी की दो साल की ज़िंदगी ले ली। पर पौलुस के पत्रों में, जो उसने उन्हीं दिनों लिखे, एक अद्भुत स्वतंत्रता की बात मिलती है। उसकी देह बंधी थी, पर उसकी गवाही मुक्त थी। और शायद, केसरिया के उन दो वर्षों में, समुद्र की हवा सुनती रही होगी एक ऐसे व्यक्ति की प्रार्थनाएँ, जिसकी जंजीरें भी, उसके प्रभु के लिए साक्ष्य बन गई थीं।




