यह कहानी उस समय की है जब याकूब अपने भाई एसाव के क्रोध से बचकर दूर, अपने नाना लाबान के घर की ओर जा रहा था। वह बेरशेबा से हरान के लिए निकला था, और रास्ता सुनसान और लंबा था। धूल उसके चेहरे पर जम गई थी, और उसके पैरों में चुभन सी हो रही थी। आखिरकार, हरान के पास के मैदानों में पहुँचकर उसने दूर से देखा—एक कुआँ, और उसके आसपास तीन झुंड की भेड़ें बैठी थीं। सूरज ढलने को था, और चरवाहे इकट्ठा हो रहे थे।
याकूब ने उनसे पूछा, “भाइयो, तुम कहाँ के हो?”
एक बूढ़े चरवाहे ने सिर उठाकर कहा, “हम हरान के हैं।”
“तुम लाबान बेतूएल के बारे में जानते हो?” याकूब का गला सूखा हुआ था, पर उम्मीद उसकी आँखों में थी।
“हाँ, जानते हैं,” चरवाहे ने कहा। “देखो, वह रही उसकी बेटी राहेल, अपनी भेड़ों के साथ आ रही है।”
याकूब ने देखा। एक युवती, हाथ में लकड़ी का फरसा लिए, भेड़ों को हाँकते हुए धीरे-धीरे कुएँ की ओर बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर यात्रा की धूल नहीं, एक ताजगी थी। उसकी चाल में एक लय थी। याकूब का दिल एकदम धड़क उठा। वह चरवाहों से बोला, “देखो, अभी दिन का उजाला बाकी है। अभी भेड़ों को चराई के लिए बाहर ले जाने का समय है। पानी पिलाकर जल्दी क्यों लौटा रहे हो?”
उन्होंने कहा, “नहीं, ऐसा नहीं है। जब तक सारे झुंड यहाँ नहीं इकट्ठे हो जाते, तब तक हम कुएँ का मुँह नहीं खोल सकते। यह पत्थर बहुत भारी है, सब मिलकर हटाते हैं।”
इतने में राहेल अपनी भेड़ों के साथ आ पहुँची। याकूब ने उसे देखा, फिर उस भारी पत्थर की ओर देखा जो कुएँ के मुँह पर रखा था। एक अजीब सा जोश उसमें भर आया। वह आगे बढ़ा, अकेले ही उसने पत्थर को किनारे सरका दिया। चरवाहे हैरान रह गए। फिर उसने राहेल की भेड़ों को पानी पिलाया।
इसके बाद, याकूब ने राहेल के पास जाकर उसे गले लगा लिया। वह फूट-फूट कर रोने लगा। राहेल समझ नहीं पा रही थी। याकूब ने रोते हुए कहा, “मैं तेरे पिता लाबान का भांजा हूँ। रिबका की संतान हूँ।”
राहेल यह सुनकर दौड़ी-दौड़ी घर गई और सब कुछ अपने पिता को सुनाया। लाबान सुनकर तुरंत दौड़ा आया। उसने याकूब को गले लगाया, चूमा, और घर ले आया। याकूब ने सारी कहानी सुनाई—कैसे उसके भाई ने उससे धोखा किया, और कैसे परमेश्वर ने उसे सुरक्षित यहाँ तक पहुँचाया।
लाबान ने कहा, “तू मेरा हड्डी-माँस है। मेरे पास रह।”
एक महीना बीत गया। याकूब खूब मेहनत से काम करता। लाबान के खेतों में, उसके जानवरों के साथ। एक दिन लाबान ने पूछा, “क्या तू मेरे लिए मुफ्त में काम करेगा? बता, तेरी मजदूरी क्या होगी?”
लाबान की दो बेटियाँ थीं। बड़ी लेआ, जिसकी आँखें कोमल थीं पर चेहरे पर वह चमक नहीं थी। और छोटी राहेल, जो सुंदर और मनमोहक थी। याकूब राहेल से प्रेम करता था। उसने कहा, “मैं तेरे छोटी बेटी राहेल के लिए सात साल तक तेरे यहाँ काम करूँगा।”
लाबान ने सोचा। उसकी आँखों में एक चमक आई। उसने कहा, “उसे तुझे देना, किसी और को देना से बेहतर है। मेरे पास रह।”
और यूँ याकूब ने राहेल के लिए सात साल काम किया। पर उसे वे सात सान कुछ दिनों के समान लगे, क्योंकि वह राहेल से बहुत प्रेम करता था। समय पूरा हुआ तो याकूब ने लाबान से कहा, “मेरी पत्नी को मुझे दे दो, क्योंकि मेरा समय पूरा हो गया है।”
लाबान ने एक भोज का आयोजन किया। पूरे इलाके के लोग इकट्ठे हुए। रात हुई, शराब पी गई, नाच-गान हुआ। फिर लाबान ने अपनी बेटी लेआ को, जिसका चेहरा घूँघट से ढका था, याकूब के कक्ष में भेज दिया। अँधेरे में, याकूब ने कुछ नहीं देखा। सुबह हुई तो वहाँ लेआ थी।
याकूब का दिल टूट गया। वह गुस्से से लाबान के पास गया। “तुमने मेरे साथ क्या किया? क्या मैंने राहेल के लिए तुम्हारे यहाँ काम नहीं किया? फिर तुमने मुझे धोखा क्यों दिया?”
लाबान ने ठंडे स्वर में कहा, “हमारे यहाँ यह रीति नहीं कि छोटी बेटी की शादी बड़ी से पहले कर दी जाए। इस सप्ताह लेआ के साथ बिताओ। फिर हम तुझे राहेल भी दे देंगे, बशर्ते तू मेरे यहाँ और सात साल काम करे।”
याकूब के पास कोई चारा नहीं था। उसने सहमति दे दी। एक सप्ताह बाद, राहेल भी उसकी पत्नी बन गई। पर याकूब को लेआ से प्रेम नहीं था। वह केवल राहेल से प्रेम करता था। परमेश्वर ने देखा कि लेआ अप्रिय है, तो उसने उसके गर्भ खोल दिए। राहेल बाँझ रही। और यूँ शुरू हुआ वह संघर्ष—दो बहनों के बीच, एक पति के लिए, संतान के लिए। लेआ ने पुत्रों को जन्म दिया: रूबेन, शिमोन, लेवी, यहूदा। हर बच्चे के जन्म पर वह आशा करती कि अब याकूब उसे प्रेम करेगा। पर याकूब का हृदय राहेल के पास ही बना रहा।
राहेल ने याकूब से कहा, “मुझे बच्चा दे, नहीं तो मैं मर जाऊँगी।”
याकूब का गुस्सा राहेल पर भड़क उठा। “क्या मैं परमेश्वर हूँ? क्या मैं हूँ जो तेरे गर्भ को रोके हुए है?”
राहेल ने वह किया जो उस ज़माने में प्रथा थी। उसने अपनी दासी बिल्हा याकूब को दे दी, ताकि उसके घुटनों पर बच्चे पैदा हों और वह उनसे अपना घर बना सके। बिल्हा के दो पुत्र हुए। लेआ ने, जब वह बच्चे पैदा करना बंद हो गई, तो अपनी दासी जिल्पा याकूब को दे दी। उसके भी दो पुत्र हुए। फिर लेआ ने खुद एक और पुत्र, और एक पुत्री दीना को जन्म दिया।
आखिरकार, परमेश्वर ने राहेल की याद की। उसने उसके गर्भ खोले। राहेल ने एक पुत्र को जन्म दिया और कहा, “परमेश्वर ने मेरा अपमान दूर किया है।” उसने उसका नाम यूसुफ रखा, और कहा, “क्या परमेश्वर मुझे एक और पुत्र देगा?”
याकूब ने अब चौदह साल लाबान के यहाँ काम कर लिए थे। सात साल राहेल के लिए, और सात साल इन दोनों बहनों और उनकी दासियों के लिए। उसके घर में अब ग्यारह पुत्र और एक पुत्री थी। पर उसका हृदय अशांत था। लाबान का व्यवहार बदल गया था। वह याकूब को अब वह नहीं समझता था जो पहले था। और याकूब जानता था कि अब वह समय आ गया है जब उसे अपने पूर्वजों के देश, वादा किए हुए देश की ओर लौटना होगा। पर यह एक और कहानी का आरंभ था।
उस हरान के मैदान में, एक कुएँ के पास जहाँ एक आदमी ने प्यार के लिए सात साल की कसम खाई थी, वहाँ अब धोखे, प्रेम, ईर्ष्या और आशीष के बीज बोए जा चुके थे। एक कुल बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, जो टेढ़ी-मेढ़ी, काँटों भरी राह पर चलते हुए भी, एक ऐसे वादे की ओर बढ़ रही थी जिसका पूरा होना अभी दूर, बहुत दूर था।




