वह शाम सरदीस के पुराने बाजार में ऐसे उतरी जैसे कोई थका हुआ पंछी पेड़ की सबसे निचली डाल पर बैठ जाए। हवा में जले हुए तेल और सड़े हुए फलों की गंध थी। मैं, यूहन्ना, एक खंडहर हो चुके मंदिर के साये में बैठा था। समुद्र के किनारे पतमुस की चट्टानों पर जो दर्शन देखे थे, उनकी आग अभी भी मन में धधक रही थी। पर यहाँ? यहाँ तो सब कुछ मुरझाया हुआ था। पत्थरों के बीच उग आई घास, टूटी दीवारों पर लगे जालों में फँसी धूल—सब कुछ जैसे कह रहा था कि जीवन यहाँ से बहुत पहले चला गया।
तभी आवाज़ आई। वह आवाज़ न तो आकाश से आई, न धरती से। वह मन के भीतर से उभरी, पर इतनी स्पष्ट कि जैसे कोई पास खड़ा फुसफुसा रहा हो। “सरदीस की कलीसिया के अगुवे के नाम लिख।” मैंने काँपते हाथों से खाली चर्मपत्र सामने रखा। आवाज़ में कोमलता थी, पर दृढ़ता भी। “तू जीता हुआ नाम रखता है, पर तू मरा हुआ है।”
ये शब्द हवा में लटक गए। मैंने देखा—सामने एक बूढ़ा व्यापारी अपनी दुकान पर बैठा, माथे पर पसीना पोंछ रहा था। उसकी दुकान में रेशम के थान, सोने-चाँदी के गहने, हर तरह की भौतिक समृद्धि थी। पर उसकी आँखें खाली थीं। उसने एक युवा लड़के को डाँटा, जो शायद उसका बेटा था, “जल्दी कर, दरवाज़ा बंद कर। आज भी कोई आया नहीं।” लड़के ने कहा, “पिता, परमेश्वर के भवन में आज प्रार्थना की घंटी बजी ही नहीं।” बूढ़े ने हँसकर कहा, “प्रार्थना? उससे पेट भरता है क्या?” और फिर वह गिनती में लग गया—सिक्के, माल, लाभ। पर उसकी आत्मा का बहीखाता पूरी तरह खाली था। यही थी सरदीस की तस्वीर—बाहर से नाम, अंदर से मृत्यु।
आवाज़ फिर आई: “जाग। जो बचा है, उसे मजबूत कर। मैंने तेरे कामों को अपने परमेश्वर के सामने पूरा नहीं पाया।” मैंने लिखा। स्याही सूख रही थी, पर शब्दों का भार बढ़ता जा रहा था।
अगला पड़ाव फिलदिलफिया था। वहाँ की कलीसिया के बारे में शब्द बिल्कुल अलग थे। “देख, मैंने तेरे सामने एक खुला द्वार रखा है, जिसे कोई बंद नहीं कर सकता।” मैंने एक छोटी-सी झोंपड़ी देखी, जहाँ कुछ लोग इकट्ठे थे। उनके कपड़े फटे हुए थे, चेहरे पर कुपोषण के चिह्न। बाहर, यहूदी आराधनालय के कुछ लोग उन्हें डरा रहे थे। पर अंदर, एक स्त्री, जिसके हाथ में सिर्फ एक टूटी हुई रोटी थी, प्रार्थना कर रही थी: “हे प्रभु, तू ही हमारी शक्ति है।” उनकी आँखों में भय नहीं, एक अद्भुत विश्वास था। वे दुनिया की नज़र में कमज़ोर थे, पर उनके पास वह ‘कुंजी’ थी, जो सचमुच के दरवाज़े खोल सकती थी।
पर सबसे कठिन शब्द लौदीकिया के लिए थे। “तू न न ता है, न ठंडा; काश तू या तो ठंडा होता, या ता।” मैंने एक विशाल नगर देखा—चौड़ी सड़कें, संगमरमर के महल, काले पानी के स्रोतों से निकलते गर्म झरने। एक मकान में धनी व्यापारी अपने मेहमानों को दिखा रहा था: “यह देखो, यह कपड़ा सिर्फ लौदीकिया में बनता है। यह शहतूत की पत्तियों से रंगा हुआ काला ऊन! और यह सोने की अशर्फियाँ! हमें किसी चीज़ की कमी नहीं।” उसकी पत्नी ने एक आईना उठाया, जिसमें उसे अपना चेहरा दिखाई दिया—संतुष्ट, मोटा, आँखों में एक सूनापन। वह बोली, “सच, हम अमीर हैं, हमें कुछ नहीं चाहिए।” पर आवाज़ गूँजी: “तू अभागा, और दीन, और कंगाल, और अन्धा, और नंगा है।”
मैंने देखा कि वह काले ऊन का वस्त्र पहने हुए है, पर आत्मा के लिहाज़ से नंगा है। उसके हाथ सोने से भरे हैं, पर परमेश्वर की नज़र में वह कंगाल है। वह शहतूत की बनी दवाई से अपनी आँखें मल रहा है, पर वह अंधा है, क्योंकि उसने मसीह को नहीं देखा। यह तस्वीर थी आत्म-मुग्धता की, आराम से सो जाने की।
फिर वह प्रसिद्ध वाक्य आया: “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ।” मैंने उस व्यापारी के घर का दरवाज़ा देखा—सोने और हाथीदाँत से जड़ा हुआ, भव्य। और उस दरवाज़े के बाहर, एक साधारण-सा व्यक्ति खड़ा था। उसके हाथों में निशान थे। वह खटखटा रहा था। भीतर से आवाज़ आई, “कौन है?” पर दरवाज़ा नहीं खुला। वे इतने व्यस्त थे अपनी दावत में, अपनी समृद्धि की गिनती में, कि उस खटखटाहट को सुन ही नहीं पा रहे थे। वह व्यक्ति वहीं खड़ा रहा। उसकी आँखों में उदासी नहीं, एक अदम्य प्रेम था। वह जानता था कि अगर एक भी व्यक्ति उस दरवाज़े को खोलेगा, तो वह भीतर आएगा, और उसके साथ भोजन करेगा।
मैंने अंतिम शब्द लिखे: “जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।” मेरी कलम रुक गई। रात गहरा चुकी थी। सरदीस के खंडहरों में एक उल्लू बोला। दूर, फिलदिलफिया की झोंपड़ी में दीये की लौ अभी भी टिमटिमा रही थी। और लौदीकिया के महलों से हँसी और नाच के स्वर आ रहे थे।
मैंने चर्मपत्र को लपेटा। यह सिर्फ सात कलीसियाओं के नाम पत्र नहीं थे। यह हर उस मनुष्य का चित्र था, जो या तो अपनी आत्मा को मरा हुआ समझकर जी रहा है, या थोड़े से विश्वास पर दृढ़ होकर खड़ा है, या फिर अपनी झूठी संपन्नता में इतना मग्न है कि द्वार पर खड़े प्रेम की खटखटाहट सुन ही नहीं पा रहा।
आखिरी बात याद आई: “जो जय पाए, उसे मैं… अपने सिंहासन पर अपने साथ बैठने दूँगा।” मैंने आँखें बंद कीं। उस सिंहासन का दर्शन फिर से आँखों के सामने तैर गया—वह ज्योति, वह मेघ, वह इंद्रधनुष। और मैं समझ गया कि यह जय, यह विजय, कोई युद्ध में मिलने वाली विजय नहीं है। यह तो सरदीस की मृत्यु में जागने की, फिलदिलफिया की थोड़ी सी शक्ति पर टिके रहने की, और लौदीकिया के ठंडे-गर्म दरवाज़े को खोलने की विजय है।
हवा ने खंडहर के पत्थरों से एक सिसकी-सी उठाई। मैंने चर्मपत्र को अपने वस्त्र के भीतर छुपा लिया। जो लिखा जाना था, लिख दिया गया था। अब बस इंतज़ार था उस सुबह का, जब कौन क्या सुनता है।




