वह सुबह ठंडी थी, पर सूरज की किरणें तम्बू के श्वेत शिखर को छूने लगी थीं। शिमोन ने अपनी भेड़ों के बाड़े की ओर देखा। कई दिनों से उसके मन में एक बात घर कर गई थी – परमेश्वर के सामने शांति का, संतुष्टि का एक भेंट चढ़ाने की इच्छा। उसकी पत्नी एलिसेबा ने पिछले महीने एक लंबी बीमारी से उबरकर अब खुद चलना शुरू कर दिया था। यह कोई मन्नत नहीं थी, बस हृदय से उमड़ा आभार था, एक गहरी शांति की लालसा थी जिसे वह बाँटना चाहता था।
उसने अपने दो बेटों को साथ लिया और भेड़ों के बीच चला गया। उसकी नज़र एक स्वस्थ, दाढ़ी वाले मेढ़े पर पड़ी। उसकी आँखें शांत थीं, कोमल। शिमोन ने उसे अलग कर लिया। “यही है,” उसने धीरे से कहा। बेटों ने पूछा कि क्यों, तो उसने समझाया, “क्योंकि यह उत्तम है। और जो उत्तम है, वही उसके लिए योग्य है जिसने हमें यह सब दिया।”
निवास स्थान के द्वार तक का रास्ता लंबा लग रहा था। मेढ़े की गर्दन पर हाथ फेरते हुए शिमोन चल रहा था। वह उसे सिर्फ एक पशु नहीं समझता था; वह उस आभार का प्रतीक था जो शब्दों से बड़ा था। तम्बू के पास पहुँचते ही दृश्य बदल गया। वहाँ का वातावरण गंभीर था, पवित्रता से गूँजता हुआ। धुआँ और कुछ विशेष सुगंध हवा में तैर रही थी। लोग थे, हर एक के हाथ में कोई न कोई भेंट, हर एक के चेहरे पर एक अलग भाव – पश्चाताप, आनंद, समर्पण।
शिमोन ने अपना मेढ़ा याजक के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। याजक की आँखों में एक अनुभवी शांति थी। उसने शिमोन से पूछा, “यह शांति की भेंट है?” शिमोन ने सिर हिलाया। “हाँ, मेरे परिवार की ओर से।” प्रक्रिया शुरू हुई। शिमोन ने स्वयं ही मेढ़े के सिर पर हाथ रखा। उस पल उसे लगा जैसे उसका सारा आभार, उसकी कृतज्ञता, उस सृष्टि के साथ एक होकर वहाँ प्रवाहित हो रही है। फिर उसने ही उसका वध किया।
खून को याजक ने सावधानी से वेदी के चारों ओर छिड़क दिया। फिर काम शुरू हुआ चमड़ी उधेड़ने और अंगों को अलग करने का। यह देखकर शिमोन के बेटे थोड़ा विचलित हुए, पर याजक के हाथों में कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई अपवित्रता नहीं। वह एक क्रम से काम कर रहा था, जैसे कोई पवित्र कला हो। पेट की चर्बी, गुर्दे, उन पर की चर्बी, और वह मोटा, मुलायम हिस्सा जो जिगर से सटा था – सब कुछ अलग किया गया। ये सबसे उत्तम अंग थे, सबसे घने, सबसे समृद्ध। इन्हें अलग करने का एक निश्चित तरीका था, एक आदर।
याजक ने इन चुने हुए हिस्सों को लेकर वेदी पर रखा। लकड़ी की आग पर उन्हें सुलगाया गया। एक विशिष्ट गंध हवा में फैली – मांस और चर्बी के जलने की, पर उससे इतर भी कुछ। शिमोन को लगा वह गंध उसके आभार की सुगंध बनकर आकाश की ओर उठ रही है। धुआँ सीधा ऊपर उठता हुआ, घुमावदार रेखाएँ बनाता, दोपहर की हवा में विलीन हो रहा था। यह “सुगंधित सुगन्ध” थी, जैसा कि व्यवस्था में कहा गया है – परमेश्वर के लिए प्रसन्न करने वाला भोजन।
बचा हुआ मांस याजक ने शिमोन और उसके परिवार को वापस कर दिया। यही तो शांति बलि का सुन्दर पहलू था – एक हिस्सा परमेश्वर के लिए, एक हिस्सा याजकों के लिए, और एक हिस्सा उसके लिए जो भेंट लाया था, ताकि वह अपने प्रियजनों के साथ बाँटकर खा सके। शिमोन, उसकी पत्नी और बच्चे, सब उसी पवित्र स्थल के पास, एक शांत कोने में बैठ गए। उन्होंने उस पकाए हुए मांस को आपस में बाँटा। एलिसेबा ने कहा भी, “यह केवल भोजन नहीं लग रहा।”
और सच में, वह साधारण भोजन नहीं था। हर कौर के साथ शिमोन को वह पल याद आ रहा था – उसके हाथ जब पशु के सिर पर थे, वह जुड़ाव, वह समर्पण। यह भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं था; यह एक संधि थी, एक प्रतिज्ञा थी शांति की। उनके बीच बैठे, हँसते, बातें करते हुए, शिमोन ने महसूस किया कि जो शांति उसने ढूँढ़ी थी, वह केवल उसके और परमेश्वर के बीच ही नहीं थी। वह उसकी पत्नी के चेहरे पर थी, उसके बेटों की चंचल आँखों में थी, और उस हवा में भी थी जो अब केवल धुएँ की नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की सुगंध लेकर आई थी। वेदी से उठता धुआँ और उनकी साझा की हुई रोटी – दोनों एक ही प्रार्थना के दो रूप लग रहे थे।




