दोपहर की झुलसा देने वाली धूप थी, जो मोआब के उन विस्तृत मैदानों पर पसरी हुई थी। हवा में धूल के महीन कण तैर रहे थे, और दूर जॉर्डन नदी की रेखा धुंधली सी दिखाई दे रही थी। लोग इकट्ठा थे – युवा, बूढ़े, बच्चे, स्त्रियाँ – उम्र और अनुभव से भारी हो चुके मूसा के चारों ओर एक विशाल, अधीर मंडली। उनके चेहरे पर यात्रा की थकान थी, पर आशा की एक चिंगारी भी। वादा किया हुआ देश अब सामने था, बस नदी पार करना बाकी था।
मूसा ने अपनी लाठी को ज़मीन पर टिकाया और धीरे से एक लंबी सांस ली। उनकी आवाज़, जो शक्ति से भरी पर श्रद्धा से कांपती हुई सी लग रही थी, चुप्पी को चीरते हुए फैलने लगी।
“सुनो, हे इस्राएल। आज के दिन मैं तुम्हें उन विधियों और नियमों की बात करूंगा जिन पर चलकर तुम जीवित रहोगे। वे तुम्हारी समझ में आ जाएं, इसलिए उन पर मन लगाकर सुनो।”
एक जवान लड़का, जिसके हाथ में ऊंट की रस्सी थी, बैठे-बैठे सीधा हो गया। एक वृद्धा ने, जिसके चेहरे पर रेगिस्तान की हवा और सालों की पीड़ा की झुर्रियां थीं, अपनी आंखें बंद कर लीं, मानो केवल कानों से ही सब कुछ ग्रहण करना चाहती हो।
“होरेब के उस दिन को याद करो,” मूसा की आवाज़ गहरी और दूर तक जाने वाली थी। “वह दिन जब तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने आग के बीच से तुमसे बात की थी। तुमने उसका कोई रूप नहीं देखा, केवल एक आवाज़ सुनी थी। उसने अपनी वाचा, दस आज्ञाएं तुम्हें सुनाईं, और उन्हें पत्थर की दो तख्तियों पर लिख दिया।”
उस पल का स्मरण करते ही भीड़ में एक सिसकी सी दौड़ गई। बुज़ुर्गों ने सिर हिलाया, उनकी आंखों में वह भय, वह विस्मय तैर गया जो आग के उस पर्वत पर महसूस किया था। मूसा ने जारी रखा, “उस समय तुम्हारा मन कितना डर गया था! तुमने कहा था, ‘हमारा परमेश्वर यहोवा अपनी महिमा और अपना भारीपन हमें दिखाए, और हम उसकी आवाज सुनें; परन्तु यह भारी आग हम फिर न देखें, कहीं ऐसा न हो कि हम मर जाएं।’ और परमेश्वर ने तुम्हारी यह बात मान ली।”
उन्होंने अपनी नजर भीड़ के चेहरों पर घुमाई, हर एक को, मानो अपनी बात सीधे उनके हृदय तक पहुंचाना चाहते हों। “अब सावधान हो जाओ, और अपने प्राणों को अच्छी तरह बचाए रखो। ऐसा न हो कि भूलकर तुम उस वाचा को भुला दो जो तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने तुम्हारे साथ बांधी है। उसके लिए कोई मूर्ति, कोई रूप-रंग गढ़ने का प्रयास मत करना। न पुरुष का, न स्त्री का, न किसी जानवर का, न आकाश के पक्षी का, न भूमि पर रेंगने वाले जन्तु का, न पानी में रहने वाले जीव का।”
उनकी आवाज़ अब और भी गंभीर हो गई, एक पिता की चेतावनी की तरह जो संकट को भांप रहा हो। “और जब तुम आकाश की ओर देखो, और सूरज, चांद, तारों को, आकाश के सारे गण को देखो, तो फंसकर उनके आगे झुकने और उनकी उपासना करने के लिए ललचाए जाना मत। तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने उन्हें पृथ्वी के सब लोगों के लिए ठहराया है। पर तुम्हें तो उसने निकाल लिया, तुम उसकी अपनी प्रजा बने।”
एक माँ ने अपने छोटे बच्चे को, जो धूप में झूलने लगा था, और पास खींच लिया। मूसा ने देखा और उनके चेहरे पर एक करुणामय दर्द उभर आया। “तुम्हारे बच्चे, और तुम्हारे बच्चों के बच्चे… जब वे बूढ़े हो जाएं, और देश में बुराई करके अपने परमेश्वर यहोवा के साथ द्रोह करें, और उसकी दृष्टि में बुरा काम करें… तब वे शीघ्र ही देश से नष्ट हो जाएंगे। तुम आकाश और पृथ्वी को साक्षी करके आज के दिन यह जान लो कि तुम निश्चय नष्ट हो जाओगे।”
चारों ओर गहरी सन्नाटा छा गया। केवल दूर से आती हुई एक पक्षी की चीं-चीं की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मूसा ने अपनी बात को थोड़ा नरम किया, पर उसमें वही दृढ़ता थी। “पर यहोवा तुम्हारा परमेश्वर दयालु है। यदि तुम उसे ढूंढो, अपने सारे मन और सारे प्राण से उसकी खोज करो, तो तुम उसे पा लोगे। कष्ट के समय जब ये सारी बातें तुझ पर आ पड़ेंगी, अंत के दिनों में यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरेगा और उसकी बात मानेगा – क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा दयालु परमेश्वर है – वह तुझे न छोड़ेगा, न नष्ट करेगा, और न तेरे पूर्वजों से बांधी हुई वाचा को भूल जाएगा।”
उन्होंने अपना हाथ आकाश की ओर उठाया। “आज के दिन तुम्हारे सामने जीवन और मरण, भलाई और बुराई रखी है। इसलिए जीवन को चुन लो, ताकि तुम और तुम्हारी सन्तान जीवित रहो। अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम रखो, उसकी सुनो, और उससे लगे रहो। क्योंकि वही तुम्हारा जीवन है।”
इतना कहकर मूसा चुप हो गए। उनकी सांसें थोड़ी भारी थीं। उनकी आंखें, जिन्होंने फिरौन के दरबार की भव्यता से लेकर लाल सागर के विभाजन तक, और होरेब की ज्वाला से लेकर इस विस्तृत मैदान तक सब देखा था, अब नए विश्वास और पुराने दुःख से भरी हुई थीं। उन्होंने जान लिया था कि वे इस नदी को पार नहीं कर पाएंगे। पर उन्होंने जो कुछ कह दिया था, वह शब्द हवा में नहीं, हर सुनने वाले के हृदय में अंकित हो चुके थे। सूरज ढलने लगा था, और मोआब के मैदानों पर लंबी-लंबी छायाएं पसर रही थीं। एक विरासत सौंप दी गई थी। अब चुनाव उन लोगों का था, जो वादे के किनारे पर खड़े थे।




