पवित्र बाइबल

गिलाद में छुटकारे की प्रतीक्षा

उन दिनों की बात है, जब न्यायी एक के बाद एक आते और जाते रहते थे, मानो पहाड़ी नालों का पानी, बरसात में भर जाता और गर्मी में सूख जाता। तोला, और फिर याईर, तेईस वर्षों तक उन्होंने इस्त्राएल का न्याय किया। शांति के ये दिन इतने साधारण थे कि लोगों की स्मृति से धुंधलाकर मिट गए, जैसे रेत पर पैरों के निशान मिट जाते हैं। याईर के तीस गधे, उसके तीस बेटे, उसकी महिमा—ये सब किस्से बनकर रह गए, पर उस गहरी बात को, जिस पर सब कुछ टिका था, लोग भूलने लगे।

और फिर, जैसे कोई बीमार शरीर दवा का असर उतरने पर फिर से बीमारी की गिरफ्त में आ जाता है, वैसे ही इस्त्राएल ने फिर वही पुराने रास्ते पकड़ लिए। यहोवा की आँखों से ओझल होकर, वे बालों की पूजा में लग गए। पर यह बस शुरुआत थी। असुरों के देवता, सीदोनियों के देवता, मोआब के देवता, अम्मोनियों के देवता, पलिश्तियों के देवता—एक के बाद एक, उन्होंने सभी को झुकना शुरू कर दिया। मानो भूखा आदमी जूठन बीन रहा हो, उन्होंने हर उस टुकड़े को पकड़ लिया जो उनके अपने परमेश्वर से इनकार करता था।

यहोवा का क्रोध, जो धीमी आग की तरह सुलगता है, भड़क उठा। उसने उन्हें अम्मोनियों और पलिश्तियों के हाथों बेच दिया। और यह बिकना कोई दूर की घटना नहीं थी। अम्मोनियों ने गिलाद में, जो यरदन के पार का इलाका था, डेरा जमा लिया। उन्होंने बस यूँ ही दबाव नहीं डाला; उन्होंने साल दर साल, निर्दयता से सताया। वे खेतों में लहलहाती फसल को, जिस पर किसानों की आँखों में चमक थी, जलाकर राख कर देते। वे गाँवों में घुसते, और जो कुछ भी हाथ लगता, लूट लेते। महिलाओं और बच्चों की चीखें हवा में गूँजतीं। यहूदा, बिन्यामीन, और एप्रैम के लोग भी अब उस साँस लेने वाली ज़ंजीर को महसूस करने लगे थे जो उनके चारों ओर कसती जा रही थी। अठारह लंबे वर्षों तक, इस्त्राएलियों का जीवन दहशत और अपमान का एक लंबा दिन बन गया, जिसमें सूरज डूबता ही नहीं था।

तब, एक प्रकार की हड्डी टूटने की पीड़ा के साथ, उनकी आत्मा में कुछ हिला। उनकी पुकार, यहोवा की ओर उठी। “हम ने तुझे छोड़ दिया है,” वे चिल्लाए, “हम ने अपने परमेश्वर को छोड़कर बालों की उपासना की है।”

परन्तु उस दिन यहोवा का उत्तर उनके कानों में एक ठंडी, कठोर सच्चाई की तरह पड़ा। वह उनकी पीड़ा से अछूता नहीं था, पर वह उनकी सुविधा की भेंट भी नहीं चढ़ने वाला था। उसने उनसे कहा, “क्या मैंने तुम्हें मिस्रियों से, एमोरियों से, अम्मोनियों से, और पलिश्तियों से नहीं बचाया? जब तुमने मुझे दुःख दिया, तो मैंने तुम्हें छुड़ाया। पर तुमने मुझे फिर छोड़ दिया, और दूसरे देवताओं की उपासना की। इसलिए अब मैं तुम्हें फिर नहीं छुड़ाऊँगा। जाओ, उन्हीं देवताओं को पुकारो जिन्हें तुमने चुना है। देखो, वे तुम्हारे कष्ट के समय तुम्हें बचा पाते हैं या नहीं।”

ये शब्द एक खुली हथेली के तमाचे की तरह थे। इस्त्राएल के लोगों ने अपना चेहरा झुका लिया। उनकी आवाज़ में अब गिड़गिड़ाहट नहीं, बल्कि एक खालीपन था। “हम ने पाप किया है,” उन्होंने कहा, “तू हम पर जो कुछ भी चाहे कर, केवल आज हमें बचा ले।”

और फिर, एक कदम और उठाया, जो केवल होठों की बात नहीं थी। उन्होंने अपने बीच से विदेशी देवताओं को, सचमुच हटा दिया। उन मूर्तियों को, जिनके सामने वे झुके थे, तोड़ा, नष्ट किया, दफन किया। और वे यहोवा की सेवा करने लगे। यह कोई भव्य, नाटकीय प्रदर्शन नहीं था। यह एक टूटे हुए लोगों का साधारण, दर्द भरा फिरना था।

उनका दुःख, उनका खालीपन, यहोवा के सामने एक गूँज की तरह उठा। वह उनकी पीड़ा से विचलित हो उठा। गिलाद में अम्मोनियों ने अपना छावनी डेरा डाल रखा था, और उनकी सेना इकट्ठी हो रही थी। संकट अब सिर पर खड़ा था, बिलकुल सामने। इस्त्राएलियों ने भी अपने सैनिक एकत्र किए, और मिफ्पा में डेरा डाला। पर उनके मन में एक प्रश्न था, जो तलवार से भी भारी था: “हमारा सेनापति कौन होगा? वह कौन है जो हमें इस लड़ाई में ले जाएगा?”

हवा में डर और प्रतीक्षा का भारीपन छाया हुआ था। न्यायियों का यह दौर, यह दसवाँ अध्याय, एक ऐसे प्रश्न पर समाप्त होता है जिसका उत्तर अभी दूर है। लोग मिफ्पा में इकट्ठे हैं, उन्होंने अपने हृदय बदले हैं, पर दुश्मन अब भी वहीं खड़ा है, यरदन के पार। छुटकारे का वादा अभी बाकी है। उनकी आँखें अब अपने बीच उस व्यक्ति को तलाश रही हैं, जो परमेश्वर के हाथ में एक औजार बन सके। और गिलाद की भूमि पर, शाम का सूरज लहू के रंग जैसा लाल होकर डूब रहा था, युद्ध और अनुग्रह, दोनों की प्रतीक्षा में।

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