उस रात नींद टूटी तो फिर आई ही नहीं। कहाँ आती, जब शरीर के हर जोड़ में दर्द धँसा हुआ था, और मन उससे कहीं ज्यादा टूटा हुआ था। मैंने अपने खाट के पास पड़े एक टुकड़े खजूर की लकड़ी को टेक लगाकर बैठने की कोशिश की। झोंपड़ी के बाहर, अँधेरा इतना सघन था मानो काली ऊन के गट्ठर रखे हों। हवा चल रही थी, और रेगिस्तान की रेत खनखना कर मेरी चौखट तक आ रही थी।
मेरे मन में वही प्रश्न घूम रहा था, जो इन दिनों सताता ही रहता—परमेश्वर के सामने मनुष्य का न्याय कैसे ठिकाने लगे? क्या सचमुच कोई निर्दोष उसके सामने खरा उतर सकता है? मैंने अपना मुँह छिपा लिया, जैसे उस महान सत्ता का तेज सामने हो। सच तो यह है, अगर वह किसी से वाद-विवाद करने भी बैठे, तो भी मनुष्य उसके एक हजार में से एक प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता।
मैं अपने भीतर बोल रहा था, मानो एलीफाज और बिलदद से नहीं, बल्कि उन असंख्य तारों से पूछ रहा हूँ, जो उस अँधेरे आकाश में कीलों की तरह ठुके हुए थे।
“वह क्या नहीं कर सकता? वह पहाड़ों को, बिना किसी चेतावनी के, उनकी जगह से हटा देता है। उसके क्रोध में वे डगमगा जाते हैं। वह पृथ्वी को उसके स्थान से हिला देता है, और उसके खंभे काँप उठते हैं। वह सूर्य से कहता है, और वह नहीं निकलता; और तारों पर मुहर लगा देता है।”
मेरी आँखें बंद हो गईं, और मन की आँखों के सामने वह दृश्य तैरने लगा—वह अकेला आकाशों को फैला रहा है, और समुद्र की लहरों पर पैर रखकर चल रहा है। वह सप्तऋषि, ओरायन, मृगशीर्ष के नक्षत्र बनाता है, और दक्षिण के गुप्त कक्षों में कार्य करता है। यह सब कितना विराट है, कितना अबूझ। और मैं? मैं तो धूल में बैठा एक व्यक्ति हूँ, जिसके शरीर पर फोड़े भर गए हैं।
“वह मेरे पास से गुजरता है, और मैं उसे देख नहीं पाता। वह आगे निकल जाता है, पर मैं उसे पहचान नहीं पाता। वह छीन लेता है—कौन उसे रोक सकता है? कौन उसे कह सकता है, ‘तू क्या कर रहा है?’”
मैंने अपने हाथों को देखा—जो कभी मजबूत और कर्मठ थे, अब कांपते रहते हैं। ईश्वर का हाथ, वह जो राहब के बड़े समुद्री जन्तुओं को भी मनोरंजन के लिए बनाता है, वह मुझ पर भारी है। अगर वह मुझे दबोचने आए, तो मैं क्या जवाब दूँगा? क्या मैं उसे चुनौती देने जाऊँगा? भले ही मैं निर्दोष हूँ, मेरा अपना मुख ही मुझे दोषी ठहरा देगा। भले ही मैं निष्कलंक हूँ, वह मुझे टेढ़ा सिद्ध कर देगा।
निर्दोष भी दोषी ठहराया जाता है। यही तो विडम्बना है। दुष्टों का राजा शत्रुओं को उनके हाथ सौंप देता है, और न्यायाधीशों के चेहरे वह अँधेरे में छिपा देता है। अगर ऐसा है, तो मेरी सफाई का क्या मोल?
मैं तो अपने ही से घृणा करने लगा हूँ। मैं अपने दिनों से विरक्त हो गया हूँ। फिर भी, एक सवाल और है—अगर मैं अपने आप को धर्मी भी मान लूँ, और उसे पुकारूँ, तो क्या वह मेरी सुनेंगे? मैं उन्हें बुलाऊँ, और उत्तर दें, ऐसा मैं विश्वास नहीं करता। वह तो आँधी में मुझे कुचल देगा, और बिना कारण ही मेरे घाव बढ़ा देगा।
वह मुझे साँस लेने भी नहीं देता, बल्कि कड़वाहटों से मेरा पेट भर देता है। अगर बल की बात है, तो देखो, वह प्रबल है। अगर न्याय की, तो कौन मुझे न्याय के लिए बुलवा सकता है?
मैं चाहे कितना भी धर्मी क्यों न बन जाऊँ, मेरा अपना मुख मुझे दोषी ठहराएगा। चाहे मैं निष्कलंक हूँ, वह मुझे कुटिल दिखा देगा। मैं निर्दोष हूँ—पर अपने प्राण से भी मैं निश्चिंत नहीं। अपने जीवन से मैं घृणा करता हूँ।
यह सब एक सा ही है। इसलिए मैं कहता हूँ—वह निर्दोष और दोषी, दोनों को वह नाश करता है। अचानक आई विपत्ति से वह निर्दोषों का भी उपहास करता है। पृथ्वी दुष्टों के हाथ में सौंप दी जाती है, और उसके न्यायाधीशों के चेहरे वह ढँक देता है। अगर वही नहीं, तो और कौन?
मेरी साँसे अब भी तेज चल रही थीं, जैसे दौड़कर आया हूँ। मैंने अपना सिर घुटनों पर रख लिया। बाहर, पहली किरण ने अँधेरे को धीरे से grey रंग में बदलना शुरू किया था। उसी क्षण एक विचार कौंधा—पर क्या मैं उसे कुछ कह सकता हूँ? क्या शब्द चुनूँ? अगर मैं निर्दोष हूँ भी, तो क्या मेरी वाणी ही मुझे दोषी नहीं ठहरा देगी?
डर लगता है। उसके सामने मैं अपना हाथ नहीं उठा सकता। अगर मैं उसे पुकारूं, और उसने उत्तर भी दिया, तो भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि उसने मेरी बात सुनी है। क्योंकि वह तो आँधी में मुझे कुचल देगा, और बिना कारण ही मेरे घाव बढ़ा देगा।
वह मुझे साँस लेने भी नहीं देता, बल्कि कड़वाहटों से भर देता है। अगर बल की बात करूँ, तो वह सबसे प्रबल। अगर न्याय की, तो कौन मुझे न्यायालय में खड़ा करवा सकता है?
मैं चाहे कितना भी धर्मी क्यों न बन जाऊँ, मेरा अपना मुख ही मुझे दोषी ठहराएगा। मैं निष्कलंक हूँ, पर वह मुझे टेढ़ा करार दे देगा।
मैं निर्दोष हूँ। पर मैं अपने आप को नहीं जानता। मैं अपने जीवन से घृणा करता हूँ।
इसलिए मैं कहता हूँ—वह निर्दोष और दुष्ट, दोनों को नाश करता है। जब अचानक विपत्ति आती है, वह निर्दोषों का भी उपहास करता है। पृथ्वी दुष्टों के हाथ में दे दी जाती है, और उसके न्यायाधीशों के चेहरे वह ढँक देता है। अगर वही नहीं, तो फिर कौन?
सुबह होने आई थी। एक पतली-सी धूप ने झोंपड़ी के प्रवेश पर पड़ी रेत को सोने जैसा चमका दिया। मेरा दर्द वैसा ही था। प्रश्न वैसे ही थे। पर उस रात के अँधेरे में, अय्यूब ने एक बात तो समझ ली थी—ईश्वर के सामने मनुष्य का मुकदमा लड़ना, उस आँधी से बहस करने जैसा है, जो अपने साथ रेत के ढेर और पहाड़ों के टुकड़े उड़ा लाती है। वह चुप हो गया। बस, आँखें खोले, उस उजाले को देखता रहा, जो बढ़ता जा रहा था, और जिसमें उसका अपना अँधेरा, और भी गहरा दिखाई दे रहा था।




